यहां 167 सालों से लग रहा ‘आशिकों का मेला’

गौरव शुक्ला, अमर उजाला, कानपुर Updated Sun, 15 Jan 2017 02:42 PM IST
167 years lovers fair in banda
आशिकों का मेला
प्रेमिका को पाने के लिए सूत की रस्सी पर चलकर नदी पार करते समय जान गंवा बैठे जवां नटबली की याद में एक बार फिर ‘आशिकों का मेला’ तैयार है। बांदा की सीमा पर केन नदी और भूरागढ़ दुर्ग के बीच बने प्राचीन मंदिर दो प्रेमियों की याद दिलाते हैं। प्रेमी-प्रेमिका इस 167 साल पुराने मेले का बेसब्री से इंतजार करते हैं। ऐसा कहा जाता है कि महोबा के सुगिरा का रहने वाला नोने अर्जुन सिंह भूरागढ़ दुर्ग का किलेदार था। यहां से कुछ किलोमीटर दूर सरबई (मध्य प्रदेश) गांव है। वहां नट जाति के लोग आबाद थे। अक्सर करतब दिखाने और कामकाज के लिए नट भूरागढ़ आते थे। किले में काम करने वाले एक युवा नट से किलेदार की बेटी को प्यार हो गया। नोने अर्जुन सिंह को इसका पता चला तो उसने प्रेमी युवा नट से यह शर्त रख दी कि सूत की रस्सी पर चलकर नदी पार कर किले में आए। अगर ऐसा कर लेगा तो वह अपनी बेटी से उसकी शादी कर देगा। नट ने शर्त मान ली। और फिर...
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रस्सी पर चलते हुए नदी पार कर ली

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