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तापमान बढ़ा तो मुफ्त किसानों को देने लगे आलू
कन्नौज
Updated Fri, 16 Dec 2016 12:25 AM IST
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ट्रैक्टर में भरकर अपने गांव जानवरों को खिलाने के लिए ले आलू ले जाता किसान
- फोटो : अमर उजाला
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तापमान बढ़ने के साथ ही शीतगृह मालिक किसानों को मुफ्त में आलू उठा ले जाने की सलाह दे रहे हैं। कोल्ड मालिकों की ओर से चैंबर से आलू निकलवा दिए जाने के बाद किसान उसे उठा ले जा रहे हैं। किसानों का कहना है कि वह गांव में ले जाकर गरीबों को मुफ्त में बांटेंगे और जानवरों को भी खिलाएंगे।
कन्नौज में चालू हालत में 105 शीतगृहों में आलू भंडारित हुआ। नोटबंदी के बाद से पुराने आलू के भाव औंधे मुंह गिर गए है। शीतगृहों से आलू की निकासी नवंबर के प्रथम सप्ताह तक हर हाल में करा दी जाती है, लेकिन इस बार नोटबंदी के चलते निकासी की तिथि 30 दिसंबर कर दी गई। शीतगृह स्वामी अब तक किसानों का पूरा सहयोग कर रहे थे, लेकिन 11 दिसंबर से 15 तक तापमान 27.02 तक अधिकतम पहुंच चुका है। तापमान के बढ़ने से बोरियों में रखा आलू सड़ने लगा। ऐसे में शीतगृह मालिकों ने आलू बाहर निकलवा दिया है। जिला मुख्यालय से करीब पांच किलोमीटर की परिधि में करीब एक दर्जन कोल्ड स्टोरों का लगभग यही हाल है।
बछइया गांव निवासी दिनेश यादव शीतगृह में रखा आलू अपने ट्रैक्टर पर लादकर ले जा रहे थे। जब उनसे इस आलू के उपयोग के बारे में पूछा गया तो उनका कहना था कि वह आलू गांव में कुछ गरीब परिवार हैं, उनमें वितरण करा देंगे। यदि नहीं लिया गया तो वह अपने जानवरों को खिलाने के काम लाएंगे। कहा कि काफी मेहनत के बाद यह उत्पादन मिलता है। इस नोटबंदी ने सारे अरमानों पर पानी फेर दिया। इस बार आलू की लगाई सहित तमाम कार्य उधारी पर ही चल रहे है। साहूकारों का काफी कर्ज हो गया है।
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कन्नौज में चालू हालत में 105 शीतगृहों में आलू भंडारित हुआ। नोटबंदी के बाद से पुराने आलू के भाव औंधे मुंह गिर गए है। शीतगृहों से आलू की निकासी नवंबर के प्रथम सप्ताह तक हर हाल में करा दी जाती है, लेकिन इस बार नोटबंदी के चलते निकासी की तिथि 30 दिसंबर कर दी गई। शीतगृह स्वामी अब तक किसानों का पूरा सहयोग कर रहे थे, लेकिन 11 दिसंबर से 15 तक तापमान 27.02 तक अधिकतम पहुंच चुका है। तापमान के बढ़ने से बोरियों में रखा आलू सड़ने लगा। ऐसे में शीतगृह मालिकों ने आलू बाहर निकलवा दिया है। जिला मुख्यालय से करीब पांच किलोमीटर की परिधि में करीब एक दर्जन कोल्ड स्टोरों का लगभग यही हाल है।
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बछइया गांव निवासी दिनेश यादव शीतगृह में रखा आलू अपने ट्रैक्टर पर लादकर ले जा रहे थे। जब उनसे इस आलू के उपयोग के बारे में पूछा गया तो उनका कहना था कि वह आलू गांव में कुछ गरीब परिवार हैं, उनमें वितरण करा देंगे। यदि नहीं लिया गया तो वह अपने जानवरों को खिलाने के काम लाएंगे। कहा कि काफी मेहनत के बाद यह उत्पादन मिलता है। इस नोटबंदी ने सारे अरमानों पर पानी फेर दिया। इस बार आलू की लगाई सहित तमाम कार्य उधारी पर ही चल रहे है। साहूकारों का काफी कर्ज हो गया है।
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