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Kannauj News: मां की परवरिश से बनीं ''अफसर बिटिया''
Sun, 15 Oct 2023 12:20 AM IST
कानपुर ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, कन्नौज
संवाद न्यूज एजेंसी, कन्नौज
Updated Sun, 15 Oct 2023 12:20 AM IST
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कन्नौज। हिम्मत करने वालों की हार नहीं होती...इन पंक्तियों को चरितार्थ करना आसान नहीं होता है। मेहनत और लगन के बूते हौंसलों की उड़ान भरने वाले ही इसे आसान बना लेते हैं। जिले में पहली बार परिवहन विभाग की महिला अधिकारी यानी एआरटीओ के रूप में तैनाती पाने वाली इज्या तिवारी की कहानी संघर्ष से भरी है। अपने नाम के मुताबिक ही उन्होंने मेहनत की तपस्या से कामयाबी हासिल की है।
मूल रूप से लखनऊ निवासी इज्या तिवारी एआरटीओ बनने से पहले सरकारी बैंक में सेवा दे चुकी हैं। उसी दौरान सरकारी सेवा में जाने का ख्याल आया तो जतन से तैयारी की और फिर पहली ही कोशिश में एआरटीओ बन गईं। पहली पोस्टिंग कन्नौज में ही हुई। यहां इस पद पर भी इससे पहले कोई महिला अधिकारी नहीं थी। पहली ही नौकरी की पहली पोस्टिंग में पहली अधिकारी बनने का गौरव भी नसीब से ही मिलता है। हालांकि यहां तक पहुंचना इतना आसान भी नहीं रहा। सिर्फ 12 साल की छोटी सी उम्र में सिर से पिता का साया उठने के बाद उनकी परवरिश मां ने की। मां की इकलौती संतान होने के बावजूद उनका बचपन संघर्ष में बीता। वह बताती हैं कि अपनी पढ़ाई के दौरान ही उन्होंने बच्चों को ट्यूशन भी पढ़ाया। संघर्ष के दौरान कभी भी हिम्मत नहीं हारी।
परेशानी हो या कामयाबी, महिला-पुरुष में नहीं करतीं भेदभाव
एआरटीओ बनकर परिवहन विभाग की जिम्मेदारी निभा रहीं इज्या तिवारी कहती हैं कि वह महिला हैं, यह अलग विषय है। मुश्किलों का सामना करके पहचान बनाई है। परेशानी हो या कामयाबी, यह किसी के साथ भेदभाव नहीं करतीं। महिला हो या पुरुष दोनों की जिंदगी सामना करते हुए ही गुजरती है। घर की दहलीज लांघकर कुछ बनने की चाहत रखने वाली युवती या महिला को संघर्ष का सामना करना आना चाहिए। इसी मुश्किल रास्ते से होकर ही कामयाबी मिलती है।
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मेरे लिए मां ही देवी
पिता के निधन के बाद बचपन से ही मां के साए में परवरिश पाने वाली इज्या तिवारी बताती हैं कि मां ने कभी भी कमजोर होने का अहसास नहीं होने दिया। हर कदम पर राह दिखाई, हौसला बढ़ाया। वह कहती हैं कि उनके जीवन में देवी तो उनकी मां ही हैं।
एआरटीओ की नौकरी में कई चुनौतियां
इज्या तिवारी के मुताबिक महिला होने के नाते एआरटीओ की जिम्मेदारी को निभाना काफी चुनौतियां भरा काम है। गाड़ियों की चेकिंग के दौरान दिन या रात का ख्याल नहीं करना पड़ता है। कभी कहीं हादसा होने पर मौके पर पहुंचकर ही मामले की जानकारी करके उसी के मुताबिक आगे की कार्रवाई करनी होती है। सीधे जनता से जुड़ाव होता है। दफ्तर से लेकर सड़क तक पर हर वर्ग के लोगों से सामना होता है। महिला होने के नाते कभी-कभी यह मुश्किल भरा होता है, लेकिन सहयोगी की मदद, वरिष्ठ अधिकारियों के सहयोग और आपसी सूझबूझ से हर मुश्किल को पार करना आसान हो जाता है।
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मूल रूप से लखनऊ निवासी इज्या तिवारी एआरटीओ बनने से पहले सरकारी बैंक में सेवा दे चुकी हैं। उसी दौरान सरकारी सेवा में जाने का ख्याल आया तो जतन से तैयारी की और फिर पहली ही कोशिश में एआरटीओ बन गईं। पहली पोस्टिंग कन्नौज में ही हुई। यहां इस पद पर भी इससे पहले कोई महिला अधिकारी नहीं थी। पहली ही नौकरी की पहली पोस्टिंग में पहली अधिकारी बनने का गौरव भी नसीब से ही मिलता है। हालांकि यहां तक पहुंचना इतना आसान भी नहीं रहा। सिर्फ 12 साल की छोटी सी उम्र में सिर से पिता का साया उठने के बाद उनकी परवरिश मां ने की। मां की इकलौती संतान होने के बावजूद उनका बचपन संघर्ष में बीता। वह बताती हैं कि अपनी पढ़ाई के दौरान ही उन्होंने बच्चों को ट्यूशन भी पढ़ाया। संघर्ष के दौरान कभी भी हिम्मत नहीं हारी।
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परेशानी हो या कामयाबी, महिला-पुरुष में नहीं करतीं भेदभाव
एआरटीओ बनकर परिवहन विभाग की जिम्मेदारी निभा रहीं इज्या तिवारी कहती हैं कि वह महिला हैं, यह अलग विषय है। मुश्किलों का सामना करके पहचान बनाई है। परेशानी हो या कामयाबी, यह किसी के साथ भेदभाव नहीं करतीं। महिला हो या पुरुष दोनों की जिंदगी सामना करते हुए ही गुजरती है। घर की दहलीज लांघकर कुछ बनने की चाहत रखने वाली युवती या महिला को संघर्ष का सामना करना आना चाहिए। इसी मुश्किल रास्ते से होकर ही कामयाबी मिलती है।
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मेरे लिए मां ही देवी
पिता के निधन के बाद बचपन से ही मां के साए में परवरिश पाने वाली इज्या तिवारी बताती हैं कि मां ने कभी भी कमजोर होने का अहसास नहीं होने दिया। हर कदम पर राह दिखाई, हौसला बढ़ाया। वह कहती हैं कि उनके जीवन में देवी तो उनकी मां ही हैं।
एआरटीओ की नौकरी में कई चुनौतियां
इज्या तिवारी के मुताबिक महिला होने के नाते एआरटीओ की जिम्मेदारी को निभाना काफी चुनौतियां भरा काम है। गाड़ियों की चेकिंग के दौरान दिन या रात का ख्याल नहीं करना पड़ता है। कभी कहीं हादसा होने पर मौके पर पहुंचकर ही मामले की जानकारी करके उसी के मुताबिक आगे की कार्रवाई करनी होती है। सीधे जनता से जुड़ाव होता है। दफ्तर से लेकर सड़क तक पर हर वर्ग के लोगों से सामना होता है। महिला होने के नाते कभी-कभी यह मुश्किल भरा होता है, लेकिन सहयोगी की मदद, वरिष्ठ अधिकारियों के सहयोग और आपसी सूझबूझ से हर मुश्किल को पार करना आसान हो जाता है।