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कच्छ और यूरोप से उड़कर आए हवासील
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लाख बहोसी झील में विचरण करते हवासील।
- फोटो : KANNAUJ
कन्नौज। असम, गुजरात की खाड़ी और पूर्वी यूरोप से उड़कर रोजी पेलिकन (सफेद हवासील) का पक्षी विहार में आगमन हुआ है। विश्व में इस पक्षी को सबसे वजनदार व बड़े आकार का माना जाता है। यह नौ से 15 किलोग्राम तक होते हैं। इतना वजन काफी होने के बावजूद यह तेज उड़ान की क्षमता रखते हैं।
पूर्वी यूरोप और भारत के उत्तर-पश्चिम क्षेत्रों मुख्य रूप से गुजरात की कच्छ खाड़ी और असम के आसपास पाए जाने वाले सफेद हवासील पक्षियों का लाख बहोसी पक्षी विहार इंदरगढ़ में रविवार को स्वागत हुआ है। यह हजारों किलोमीटर उड़ान भरकर प्रजनन व भोजन के लिए शीत ऋतु में दस्तक देते हैं। यह पक्षी प्रवास के दौरान तीन हजार किलोमीटर की ऊंचाई तक वी आकार में उड़ कर यहां आते हैं। प्रजनन और भोजन की वजह से ही इस दुर्लभ पक्षी का दीदार संभव है। इनका मुख्य आहार मछली है। एक से दो किलो तक की मछली को यह झील की तलहटी तक हमला कर एक ही सांस में निगल लेते हैं। पक्षी विहार के कर्मचारी करन सिंह ने बताया कि जनवरी माह में हवासील अक्सर विचरण और प्रजनन करते हैं। इस बार अभी सिर्फ 16 पक्षी आए हैं। यह पक्षी विहार में आने वाले पक्षियों में सबसे बड़े और खूबसूरत होते हैं।
नाक न होने से चोंच से लेते सांस
इन पक्षियों की चोंच लंबी होती है। चोंच का निचला हिस्सा गजे तक थैलीनुमा होता है। इसक ा प्रयोग ये मछली को पकड़ने में करते हैं। ये चोंच को खोलकर पानी में डुबा कर रखते हैं। चोंच की इस थैली में काफी पानी आ जाता है। पानी के साथ मछली आने से यह गर्दन बाहर निकालते हैं। इसके बाद थैली को सिकोड़ते हैं। इससे पानी बाहर आ आता है। यह मछली को निगल जाते हैं। झिल्लीदार पंजों की वजह से यह तैरते हुए ही पानी की सतह से उड़ान भर सकते हैं। इन पक्षियों की नाक नहीं होती। ये चोंच से ही सांस लेते हैं। इससे विश्व में इसे अनोखा पक्षी माना जाता है।
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नर व मादा मिलकर चूजों को पालते
हवासील का प्रजनन फरवरी से अप्रैल तक होता है। ये मिट्टी व तिनके इकट्ठे कर बड़ा घोंसला बनाते हैं। झील के किनारे वाले क्षेत्र में एक साथ कब्जा कर लेते हैं। मादा दो से तीन अंडे देती है। नर व मादा मिलकर चूजों को पालते हैं। प्रजनन के समय नर पक्षी के चेहरे का रंग गुलाबी व मादा का रंग नारंगी जैसा होता है। ये साफ जगह रहना पसंद करते हैं। प्रदूषित झीलों से दूर चले जाते हैं। जमीन में घोंसले होने से इसके अंडों व चूजों को लोमड़ी व गीदड़ खा लेते हैं। पक्षी विहार के कर्मचारियों ने प्रजनन के बाद इनके अंडे सुरक्षित करने की कवायद शुरू कर दी है।
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पूर्वी यूरोप और भारत के उत्तर-पश्चिम क्षेत्रों मुख्य रूप से गुजरात की कच्छ खाड़ी और असम के आसपास पाए जाने वाले सफेद हवासील पक्षियों का लाख बहोसी पक्षी विहार इंदरगढ़ में रविवार को स्वागत हुआ है। यह हजारों किलोमीटर उड़ान भरकर प्रजनन व भोजन के लिए शीत ऋतु में दस्तक देते हैं। यह पक्षी प्रवास के दौरान तीन हजार किलोमीटर की ऊंचाई तक वी आकार में उड़ कर यहां आते हैं। प्रजनन और भोजन की वजह से ही इस दुर्लभ पक्षी का दीदार संभव है। इनका मुख्य आहार मछली है। एक से दो किलो तक की मछली को यह झील की तलहटी तक हमला कर एक ही सांस में निगल लेते हैं। पक्षी विहार के कर्मचारी करन सिंह ने बताया कि जनवरी माह में हवासील अक्सर विचरण और प्रजनन करते हैं। इस बार अभी सिर्फ 16 पक्षी आए हैं। यह पक्षी विहार में आने वाले पक्षियों में सबसे बड़े और खूबसूरत होते हैं।
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नाक न होने से चोंच से लेते सांस
इन पक्षियों की चोंच लंबी होती है। चोंच का निचला हिस्सा गजे तक थैलीनुमा होता है। इसक ा प्रयोग ये मछली को पकड़ने में करते हैं। ये चोंच को खोलकर पानी में डुबा कर रखते हैं। चोंच की इस थैली में काफी पानी आ जाता है। पानी के साथ मछली आने से यह गर्दन बाहर निकालते हैं। इसके बाद थैली को सिकोड़ते हैं। इससे पानी बाहर आ आता है। यह मछली को निगल जाते हैं। झिल्लीदार पंजों की वजह से यह तैरते हुए ही पानी की सतह से उड़ान भर सकते हैं। इन पक्षियों की नाक नहीं होती। ये चोंच से ही सांस लेते हैं। इससे विश्व में इसे अनोखा पक्षी माना जाता है।
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नर व मादा मिलकर चूजों को पालते
हवासील का प्रजनन फरवरी से अप्रैल तक होता है। ये मिट्टी व तिनके इकट्ठे कर बड़ा घोंसला बनाते हैं। झील के किनारे वाले क्षेत्र में एक साथ कब्जा कर लेते हैं। मादा दो से तीन अंडे देती है। नर व मादा मिलकर चूजों को पालते हैं। प्रजनन के समय नर पक्षी के चेहरे का रंग गुलाबी व मादा का रंग नारंगी जैसा होता है। ये साफ जगह रहना पसंद करते हैं। प्रदूषित झीलों से दूर चले जाते हैं। जमीन में घोंसले होने से इसके अंडों व चूजों को लोमड़ी व गीदड़ खा लेते हैं। पक्षी विहार के कर्मचारियों ने प्रजनन के बाद इनके अंडे सुरक्षित करने की कवायद शुरू कर दी है।