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देरी से बुआई से दगा दे गया कच्चा आलू
Updated Tue, 04 Dec 2018 12:06 AM IST
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कन्नौज। कच्चे आलू की फसल ने इस बार किसानों को दगा दे दिया है। अक्तूबर में बुआई होने से दिसंबर में खोदाई शुरू हुई। इसी बीच बड़े शहरों के बाजार में पंजाब, बिहार का आलू आ गया, इससे किसानों को फसल के वाजिब दाम नहीं मिल पा रहे हैं। बाजार में मंदी का आलम ये है कि किसानों को प्रति बीघा तीन हजार तक की ही बचत हो पा रही है। अभी और दाम गिरने की आशंका है। इससे किसान कच्चे आलू की खोदाई न करने का मूड बना रहे हैं।
जिले में कच्चे आलू की फसल नवंबर में तैयार हो जाती थी लेकिन इस बार अच्छी बारिश होेने से सितंबर में बुआई नहीं हो पाई। मक्का फसल काटने के बाद किसानों ने खेत तैयार कर अक्तूबर से कच्चे आलू की बुआई शुरू की। उद्यान विभाग से बीज भी नहीं मिल पाया। इससे शीतगृहों से 600 रुपये पैकेट के हिसाब से बीज खरीदकर बुआई की। देरी में बुआई होने खोदाई भी दिसंबर में शुरू हुई। किसानों ने बताया कि इस बार उपज भी कम है। प्रति बीघा 25 से 30 पैकेट आलू ही निकल रहा है।
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बड़े शहरों के बाजार में पंजाब और बिहार का आलू आ जाने से दाम भी 400 रुपये पैकेट तक ही मिल पा रहे हैं। अक्तूबर में खोदाई होने से 600 से 700 रुपये प्रति पैकेट तक दाम मिल जाते थे। जिले में कच्चे आलू की बड़ी मंडी होने से उपज चकरपुर मंडी ले जानी पड़ती है। कम उपज, काम दम मिलने के कारण इस बार किसानों को प्रति बीघा तीन हजार रुपये तक की ही बचत हो पा रही है। बुआई देरी से होने से जिले का नया आलू करीब 25 से 30 दिन देरी से बाजार पहुंचा। पंजाब और बिहार का नया आलू भी आ जाने से दाम में गिरावट आ चुकी है। मंडियों में खूब आलू आ रह है। अगर यही स्थिति रही तो दाम और गिरेंगे। ऐसे में किसानों को कच्ची फसल नहीं खोदनी चाहिए। वह फसल का पकाकर ही खोदें तो फायदा होगा।
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चकरपुर मंडी में कच्चे आलू का भाव 400 रुपये पैकेट (50 किलो) है। छोटा और हल्का दागी आलू व्यापारी 360 से 380 में ही ले रहे हैं। एक बीघे में 25 से 30 पैकेट निकल रहे हैं। अच्छा आलू निकलने पर किसान को एक बीघे में 10 से 12 हजार रुपये मिल रहे हैं। लागत, मंडी शुल्क और भाड़ा निकालने के बाद किसानों के हाथ दो हजार रुपये ही आ रहे हैं।
आलू जिले की मुख्य फसल है। इस बार उद्यान विभाग ने 46200 हेक्टेयर में आलू बुआई का लक्ष्य रखा है। इसमें इस बार करीब 15 फीसदी रकबे में कच्ची फसल की बुआई की गई है। इसके बावजूद जिले में कच्चे आलू की बिक्री के लिए बड़ा बाजार नहीं है। किसानों को कच्चा आलू कानपुर नगर जिले की चकरपुर मंडी जाना होता है। कन्नौज से चकरपुर आलू ले जाने में 1000 से 1500 रुपये तक भाड़ा देना पड़ता है। अगर जिले में ही बाजार उपलब्ध हो जाए तो किसानों का पैसा और समय दोनों बचेगा।
शीतगृहों में अभी भी चार से पांच लाख पैकेट आलू रखा है। दरअसल अच्छे दाम मिलने से किसानों ने निकासी धीमी की। किसानों को 1200 से 1400 रुपये क्विंतल तक दाम मिले, दिवाली पर बिहार और पंजाब का नया आलू बाजार में पुराने के दाम गिर गए। इससे शीतगृहों खाली नहीं हो सके। स्थानीय बाजार में पुराना आलू होने से भी नए के भाव पर असर पड़ रहा है।
जिले में बाजार मिल जाए तो भाड़ा, मजदूरी बचे
चौतराहार के आलू किसान रामकिशोर ने बताया कि इस बार उपज कम है और देरी से बुआई के कारण फसल के दाम भी कम मिल रहे हैं। अगर बाजार नहीं सुधरा तो कच्चा आलू नहीं खोदेंगे। ताहपुर के महेशचंद्र का कहना था कि खाद, सिंचाई से लेकर मजदूर तक महंगी होने से लागत काफी बढ़ गई है। वाजिब दाम न मिलने से नुकसान हो रहा है। माधौनगर के संजय कुमार ने कहा कि बिल्कुल भी फायदा नहीं हो रहा है। बिचपुरवा के राजेंद्र प्रसाद का कहना था कि अगर जिले में ही उपज बिक जाए तो भाड़ा और मजदूरी का खर्च बच जाता।
कच्ची आलू में प्रति बीघा लागत
जोताई 1000 रुपये
बुआई 270 रुपये
यूरिया 310 रुपये
डीएपी 1400 रुपये
पांच पानी 500 रुपये
बीज 3500 रुपये
दवा छिड़काव 500 रुपये
खुदाई 600 रुपये
भाड़ा 960 रुपये
देरी से हुई बुआई, दगा दे गया कच्चे आलू का बाजार
50 से 60 क्विंटल ही मिल रही उपज, 800 रुपये क्विंटल ही मिल रहे दाम
क्रासर
9040 रुपये तक आई प्रति बीघा बुआई में लागत
12000 रुपये तक में बिक रही एक बीघे की आलू
अमर उजाला ब्यूरो
फोटो-18- तालग्राम में आलू की खुदाई करते किसान।