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महाकुंभः कल्पवास का दिलो-दिमाग पर होता सही असर

Wed, 16 Jan 2013 08:12 AM IST
अविनाशी श्रीवास्तव/इलाहाबाद
अविनाशी श्रीवास्तव/इलाहाबाद Updated Wed, 16 Jan 2013 08:12 AM IST
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kalpwas effects on heart and mind positively

कल्पवास का धार्मिक और आध्यात्मिक महात्म्य तो है ही, वैज्ञानिकों का दावा है कि दिल और दिमाग पर इसका बड़ा ही सकारात्मक प्रभाव पड़ता है। कल्पवास करने वाले हजारों श्रद्धालुओं पर अध्ययन के बाद वैज्ञानिकों ने पुष्टि की है कि सभी नियमों का पालन करने वाले कल्पवासियों की सेहत सुधरती है और मानसिक तथा दिल की कमजोरियां दूर होती हैं।

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शारीरिक एवं मानसिक क्षमता में सकारात्मक बदलाव
भारत और ब्रिटेन के 11 मनोवैज्ञानिकों ने लगभग एक हजार कल्पवासियों पर अध्ययन किया है। कल्पवास के पहले, इसके दौरान और बाद में अध्ययन में पाया कि कल्पवासियों के शारीरिक एवं मानसिक क्षमता में काफी सकारात्मक बदलाव हुआ। वह पहले से अधिक सक्रिय हैं तो कल्पवास के बाद सोचने का नजरिया भी काफी सकारात्मक हो चुका है। इस अध्ययन में इलाहाबाद विश्वविद्यालय के सेंटर ऑफ कांग्नेटिव एंड बिहैवरल साइंस (सीबीसीएस) के वैज्ञानिक भी शामिल हैं। मनोवैज्ञानिकों की यह टीम इस साल भी अध्ययन के लिए 21 जनवरी को संगमनगरी पहुंच रही है।
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अध्ययन के तीन मैथड
प्रख्यात मनोवैज्ञानिक यूनिवर्सिटी आफ डूंडी यूके के डॉ. निक हॉपकिन्स, डॉ. स्टीव राइचर, सीबीसीएस के प्रोफेसर नारायणन श्रीनिवासन के नेतृत्व में सामाजिक विज्ञान के इस बड़े प्रोजेक्ट में अध्ययन के तीन मैथड अपनाए गए। पहले प्रयोग में टीम के सदस्यों ने 90 गांवों के एक हजार कल्पवासियों को चुना। पंडों और तीर्थपुरोहितों की मदद से वे उनके गांव गए। कल्पवास के दो महीने से पहले से लेकर दो महीने बाद तक लगातार कल्पवासियों के खानपान, उनके रहन सहन और व्यवहार का अध्ययन किया। तुलनात्मक अध्ययन के लिए वैज्ञानिकों ने कल्पवासियों के 120 पड़ोसियों का भी परीक्षण किया।
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दूसरे मैथड में टीम में शामिल दो एथनोग्राफर डॉ. कविता पांडेय और डॉ. शैल शंकर एक-एक कल्पवासियों के साथ कल्पवास के 15 दिन पहले से लेकर 15 दिन बाद तक साथ-साथ रहे। इस दौरान उन्होंने उनकी हर गतिविधि का अध्ययन किया। इसी क्रम में तीसरे मैथड में मेला क्षेत्र में ही प्रयोगशाला बनाकर अध्ययन किया गया। तीनों ही मैथड में कल्पवासियों की गतिविधि, हावभाव और सोच में चौंकाने वाले परिणाम देखने को मिले।

रिसर्च डायरेक्टर डॉ. श्रुति तिवारी ने बताया कि मनोविज्ञान की दृष्टि से निर्धारित स्केल पर कल्पवासियों में स्वास्थ्य और दिमागी रूप से बड़ा बदलाव देखने को मिला। कई के अंदर का चिड़चिड़ापन बिल्कुल दूर था। यह अध्ययन अमेरिका के प्रतिष्ठित जरनल ‘प्लॉस वन’ में प्रकाशित भी हो चुका है। श्रुति ने बताया कि इन बदलावों के पीछे के कुछ कारण भी तलाशे गए हैं, शेष पर काम चल रहा है।

मेले की ध्वनि का भी होता है असर
मेला क्षेत्र में होने वाले शोर का भी अपना एक मनोविज्ञान है। इतना शोर लगातार एक महीने तक बाहर सुनने को मिले तो इसका नकारात्मक प्रभाव पड़ेगा लेकिन कल्पवासियों तथा अन्य श्रद्धालुओं पर इसका उल्टा असर देखने को मिला है। श्रुति ने बताया कि कल्पवासियों को मेले की ध्वनि सुनाई गई तो उसके प्रति उनका अधिक अटेंशन रहा लेकिन उसी आवाज को जब रेलवे स्टेशन या अन्य स्थान का बताकर सुनाया गया तो उनकी सोच बदल गई और वे उस ध्वनि को अधिक देर तक नहीं सुन सके। श्रुति ने बताया कि इस व्यवहार और सोच पर अभी शोध किया जा रहा है।


सबसे बड़े सामाजिक अध्ययन का दावा
वैज्ञानिक इस शोध को भारत में सबसे बड़ा सामाजिक अध्ययन बता रहे हैं। यह दुनिया का सबसे बड़ा मेला तो है ही, खर्च की दृष्टि से भी इसे सबसे बड़ा प्रोजेक्ट बताया जा रहा है। इसके अलावा गिने-चुने सामाजिक अध्ययनों में ही तीन मेथड अपनाए गए हैं। इसी क्रम में इलाहाबाद विश्वविद्यालय में 25 जनवरी को होने वाली शैक्षिक संगोष्ठि में भारत के जाने-माने मनोविज्ञानी जुट रहे हैं। इसमें अध्ययन की जानकारी देने के अलावा आगे के रिसर्च और संभावनाओं पर भी चर्चा की जाएगी।

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