{"_id":"61c23307ee395055e61f866a","slug":"woman-farmer-draws-new-line-selling-earthworm-fertilizer-in-outside-districts-jhansi-news-jhs211458165","type":"story","status":"publish","title_hn":"महिला किसान ने खींची नई लकीर, बाहर के जिलों में बेच रहीं केंचुआ खाद","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
महिला किसान ने खींची नई लकीर, बाहर के जिलों में बेच रहीं केंचुआ खाद
विज्ञापन
ग्राम गणेश गढ़ में कैचुआ की खाद।
झांसी। रासायनिक खाद के अंधाधुंध प्रयोग से कम हो रही जमीन की उर्वरा शक्ति को केंचुआ की परंपरागत खाद डालकर उत्पादकता बढ़ाने के लिए ग्राम गनेशगढ़ की महिला किसान रूपा पत्नी वीर सिंह निरंतर प्रयास कर रही हैं। उनकी मेहनत का ही परिणाम है कि जहां किसान पहले जैविक खाद (वर्मी कंपोस्ट) का नाममात्र का प्रयोग करते थे, अब साठ क्विंटल तक उपयोग कर रहे हैं। यही नहीं, झांसी के अलावा आसपास के अन्य जिलों में भी वर्मी कंपोस्ट (केंचुआ की खाद) को बेचा जा रहा है। केंचुआ खेत की जमीन को भुरभुरा बनाता है, जिससे खेत में हवा पर्याप्त पहुंचती है और पौधे अधिक वृद्धि करते हैं।
बबीना ब्लाक के ग्राम रक्सा के पास गनेशगढ़ में रहने वाली किसान रूपा देवी का कहना है कि गांव में सिंचाई के संसाधन नहीं हैं। वर्षा आधारित खेती होती है। पानी के संरक्षण के लिए खेत तालाब योजनांतर्गत काम चल रहा है। इन्होंने कृषि विकास योजना के अंतर्गत गांव में 2015-16 में जैविक खेती शुरू की। लेकिन, शुरुआत में इन्हें वर्मी कंपोस्ट के लिए केंचुआ नहीं मिले। जैसे-तैसे एक किलोग्राम केंचुआ का इंतजाम हुआ।
इसके बाद उन्होंने केंचुआ पर ही काम शुरू कर दिया। इसके बाद इन्होंने पीछे मुड़कर नहीं देखा। मात्र पांच साल में ही किसान रूपा की पहचान केंचुआ खाद के बड़े उत्पादकों में हो गई है। इनके यहां तैयार केंचुआ की खाद छह से साढ़े छह रुपये प्रति किलोग्राम तक बिक रही है। केंचुआ की खाद लेने के लिए जिले के किसान तो आते ही हैं, आसपास के ललितपुर, हमीरपुर और जालौन जिले के किसान भी केंचुआ की खाद लेने के लिए ग्राम गनेशगढ़ तक आ रहे हैं। इससे तीन लाख रुपये सालाना तक की आय हो रही है।
विज्ञापन
उप कृषि निदेशक के के सिंह ने बताया कि जैविक खेती के लिए किसानों को प्रशिक्षण देने का काम भी महिला किसान रूपा देवी कर रही हैं।
रासायनिक खादाें के प्रयोग से किसान ऊब गए हैं। अब जैविक खेती अपना रहे हैं। इसके लिए केंचुआ की खाद की जरूरत होती है। केंचुआ 15 फिट गहराई तक मिट्टी को भुरभुरा बना देता है। इससे खेत में पानी सोखने की क्षमता बढ़ जाती है, जो खेती का उत्पादन बढ़ाने में सहायता करती है। - किसान रूपा देवी पत्नी वीर सिंह, ग्राम गनेश गढ़, रक्सा जिला झांसी
विज्ञापन
बबीना ब्लाक के ग्राम रक्सा के पास गनेशगढ़ में रहने वाली किसान रूपा देवी का कहना है कि गांव में सिंचाई के संसाधन नहीं हैं। वर्षा आधारित खेती होती है। पानी के संरक्षण के लिए खेत तालाब योजनांतर्गत काम चल रहा है। इन्होंने कृषि विकास योजना के अंतर्गत गांव में 2015-16 में जैविक खेती शुरू की। लेकिन, शुरुआत में इन्हें वर्मी कंपोस्ट के लिए केंचुआ नहीं मिले। जैसे-तैसे एक किलोग्राम केंचुआ का इंतजाम हुआ।
विज्ञापन
इसके बाद उन्होंने केंचुआ पर ही काम शुरू कर दिया। इसके बाद इन्होंने पीछे मुड़कर नहीं देखा। मात्र पांच साल में ही किसान रूपा की पहचान केंचुआ खाद के बड़े उत्पादकों में हो गई है। इनके यहां तैयार केंचुआ की खाद छह से साढ़े छह रुपये प्रति किलोग्राम तक बिक रही है। केंचुआ की खाद लेने के लिए जिले के किसान तो आते ही हैं, आसपास के ललितपुर, हमीरपुर और जालौन जिले के किसान भी केंचुआ की खाद लेने के लिए ग्राम गनेशगढ़ तक आ रहे हैं। इससे तीन लाख रुपये सालाना तक की आय हो रही है।
विज्ञापन
उप कृषि निदेशक के के सिंह ने बताया कि जैविक खेती के लिए किसानों को प्रशिक्षण देने का काम भी महिला किसान रूपा देवी कर रही हैं।
रासायनिक खादाें के प्रयोग से किसान ऊब गए हैं। अब जैविक खेती अपना रहे हैं। इसके लिए केंचुआ की खाद की जरूरत होती है। केंचुआ 15 फिट गहराई तक मिट्टी को भुरभुरा बना देता है। इससे खेत में पानी सोखने की क्षमता बढ़ जाती है, जो खेती का उत्पादन बढ़ाने में सहायता करती है। - किसान रूपा देवी पत्नी वीर सिंह, ग्राम गनेश गढ़, रक्सा जिला झांसी