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Jhansi News: बबेले की कुटिया में बुना जाता था आजादी के आंदोलन का ताना-बाना
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- भू-दान आंदोलन में कर दी थी अपनी जमीन दान
भास्कर बबेले
बंगरा। आजादी के आंदोलन के दौरान बंगरा में स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों की आवाजाही लगातार बनी रहती थी। यहां क्रांतिकारी गोकुल प्रसाद बबेले की कुटिया में आजादी के आंदोलन का ताना-बाना बुना जाता था। इसी वजह से गोकुल प्रसाद को कई बार जेल भी जाना पड़ा। इतना ही नहीं, आचार्य विनोबा भावे से प्रभावित होकर गोकुल प्रसाद ने अपनी जमीन भी दान की थी।
स्वतंत्रता संग्राम सेनानी गोकुल प्रसाद बबेले बाल्यावस्था में ही आजादी के आंदोलन से जुड़ गए थे। युवावस्था में वह आंदोलन में पूरी तरह से सक्रिय हो गए थे। चंद्रशेखर आजाद के अज्ञातवास के दौरान बबेले की गिनती उनके निकट सहयोगियों में होती थी। वह सातार में चंद्रशेखर आजाद के साथ लंबे समय तक रहे और उनकी गतिविधियों को अंजाम तक पहुंचाने में सहायक सिद्ध हुए।
इतना ही नहीं, उन दिनों में गोकुल प्रसाद बबेले के छोटे से घर को बबेले की कुटिया के नाम से जाना जाने लगा था। यहां अंग्रेजों के विरुद्ध रणनीतियां तैयार की जाती थीं। उनकी कुटिया में महान क्रांतिकारी नारायणदास खरे, स्वामी स्वराज्यानन्द, लालाराम बाजपेई, श्यामलाल साहू, माधव प्रसाद पस्तोर आदि का लगातार आना-जाना बना रहता था।
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अंग्रेजों की नजर में आने के बाद गोकुल प्रसाद को कई बार जेल जाना पड़ा। यहां तक कि अंग्रेजों ने उनके घर की कुर्की तक कर दी थी। इसके बावजूद, उनके कदम पीछे नहीं हटे। भारत छोड़ो आंदोलन में भी उन्होंने सक्रिय भूमिका निभाई।
देश की आजादी के बाद भी वे सामाजिक सरोकारों से लगातार जुड़े रहे। भू-दान आंदोलन से प्रभावित होकर उन्होंने अपनी जमीन जरूरतमंदों को दान कर दी थी। (संवाद)
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भास्कर बबेले
बंगरा। आजादी के आंदोलन के दौरान बंगरा में स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों की आवाजाही लगातार बनी रहती थी। यहां क्रांतिकारी गोकुल प्रसाद बबेले की कुटिया में आजादी के आंदोलन का ताना-बाना बुना जाता था। इसी वजह से गोकुल प्रसाद को कई बार जेल भी जाना पड़ा। इतना ही नहीं, आचार्य विनोबा भावे से प्रभावित होकर गोकुल प्रसाद ने अपनी जमीन भी दान की थी।
स्वतंत्रता संग्राम सेनानी गोकुल प्रसाद बबेले बाल्यावस्था में ही आजादी के आंदोलन से जुड़ गए थे। युवावस्था में वह आंदोलन में पूरी तरह से सक्रिय हो गए थे। चंद्रशेखर आजाद के अज्ञातवास के दौरान बबेले की गिनती उनके निकट सहयोगियों में होती थी। वह सातार में चंद्रशेखर आजाद के साथ लंबे समय तक रहे और उनकी गतिविधियों को अंजाम तक पहुंचाने में सहायक सिद्ध हुए।
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इतना ही नहीं, उन दिनों में गोकुल प्रसाद बबेले के छोटे से घर को बबेले की कुटिया के नाम से जाना जाने लगा था। यहां अंग्रेजों के विरुद्ध रणनीतियां तैयार की जाती थीं। उनकी कुटिया में महान क्रांतिकारी नारायणदास खरे, स्वामी स्वराज्यानन्द, लालाराम बाजपेई, श्यामलाल साहू, माधव प्रसाद पस्तोर आदि का लगातार आना-जाना बना रहता था।
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अंग्रेजों की नजर में आने के बाद गोकुल प्रसाद को कई बार जेल जाना पड़ा। यहां तक कि अंग्रेजों ने उनके घर की कुर्की तक कर दी थी। इसके बावजूद, उनके कदम पीछे नहीं हटे। भारत छोड़ो आंदोलन में भी उन्होंने सक्रिय भूमिका निभाई।
देश की आजादी के बाद भी वे सामाजिक सरोकारों से लगातार जुड़े रहे। भू-दान आंदोलन से प्रभावित होकर उन्होंने अपनी जमीन जरूरतमंदों को दान कर दी थी। (संवाद)