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पेट भर खाने को तरस रहा स्वतंत्रता संग्राम सेनानी का बुजुर्ग बेटा...तंगहाली ऐसी कि थम नहीं रहे आंसू

Sat, 02 Jul 2022 11:48 PM IST
Jhansi Bureau झांसी ब्यूरो
Updated Sat, 02 Jul 2022 11:48 PM IST
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The elderly son of a freedom fighter longing to eat a full stomach ... the plight is such that the tears are not stopping
झांसी। वर्षों से मैने मनपसंद खाना नहीं खाया। मन करता है किलो भर आम-खरबूजा खरीदकर पेट भरकर खाऊं, लेकिन जेब में इतने पैसे नहीं होते, खाने के लिए मन तरस जाता है। साइकिल पंचर हो जाती है तो आटो-टेंपो के 10 रुपये बचाने के लिए घर से पैदल पांच किलोमीटर चलकर जेल चौराहे तक नौकरी पर जाता हूं। डरता हूं कि ये छोटी सी नौकरी भी चली गई तो भूखे पेट सोना पड़ेगा...। स्मार्ट सिटी में कदम रख चुकी झांसी में पेट भर खाने के लिए तरस रहा ये बुजुर्ग कोई और नहीं शहर के जाने-माने स्वतंत्रता संग्राम सेनानी स्वर्गीय सीताराम आजाद का बेटा राजगुरु आजाद है।
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शहर के मुकरयाना मोहल्ले की तंग गली में छोटे से किराए के मकान में मुफलिसी के दिन काट रहे राजगुरु जिस तंगहाली में जी रहे हैं उसे देखकर कोई भी अपने आंसू नहीं रोक सकता...।उम्र के 63वें पड़ाव में वह दो वक्त की रोटी के लिए एक दुकान में चौकीदारी करने को मजबूर हैं। राजगुरु पिछले तीन वर्षों से वृद्धावस्था पेंशन के लिए सैकड़ों बार नेताओं और अधिकारियों के चक्कर लगाकर थक चुके हैं पर पेंशन मिलना तो दूर, किसी नेता या अधिकारी को उनकी सुध लेने की फुर्सत भी नहीं है। राजगुरु बताते हैं कि चौकीदारी की नौकरी में उन्हें मात्र छह हजार रुपये मिलते हैं। एक महीना वेतन न मिले तो भूखे पेट सोने की नौबत आ जाती है। कोरोना काल में वह कई दिनों तक भूखे पेट सोए हैं।
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पत्नी और जुड़वां बच्चों की अंत्येष्टि के लिए नहीं थे पैसे
झांसी। राजगुरु बताते हैं कि वह पढ़े-लिखे नहीं हैं इसलिए कोई अच्छी नौकरी नहीं मिल पाई। उनकी पत्नी रामकुमारी जब जुड़वां बच्चों को जन्म देने के साथ ही परलोक सिधार गईं और कुछ ही समय बाद जुड़वां बच्चों की भी मौत हो गई तो उनके पास अंत्येष्टि के लिए तक पैसे नहीं थे। जैसे-तैसे उधार लेकर तीनों का अंतिम संस्कार किया। कुछ साल बाद उनका 11 साल का बेटा और तीन साल की बेटी की भी मौत हो गई। अब इकलौती बेटी कल्पना के अलावा उनका कोई नहीं है। बुढ़ापे में वह दामाद संतोष और बेटी के साथ ही रहते हैं। दामाद भी किसी तरह से घर में सिलाई का काम करके गृहस्थी चलाता है। इसलिए वह अपना पूरा वेतन (छह हजार) दामाद को ही दे देते हैं। इससे तीन हजार रुपये मकान का किराया और एक हजार रुपये बिजली का बिल जाता है।
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चूल्हे में कपड़ा जलाकर बनता है खाना, नातिनों की पढ़ाई के लिए पाई-पाई बचाते हैं
झांसी। राजगुरु की बेटी कल्पना की दो बेटियां हैं। बड़ी मुस्कान 10वीं की और छोटी वंशिका चौथी कक्षा में पढ़ती है। वंशिका बताती है कि पापा और नाना कई बार उन दोनों की फीस समय से नहीं दे पाते हैं। घर में सिलिंडर खत्म हो जाए तो कई दिनों तक चूल्हे में सिलाई से बचा कपड़ा और लकड़ी जलाकर खाना बनता है। राजगुुरु बताते हैं कि दोनों बच्चियां पढ़-लिखकर सक्षम हो जाएं इसलिए वह पाई-पाई बचाते हैं। अभी राशन से गेहूं-चावल मिल जाता है तो जैसे-तैसे गृहस्थी चल रही है।

सीताराम आजाद ने गांधी जी के साथ लड़ी थी नमक आंदोलन की लड़ाई
झांसी। स्वंतत्रता सेनानी सीताराम आजाद का जन्म झांसी में वर्ष 1919 में हुआ था। एक बार चंद्रशेखर आजाद से मिलकर वह बहुत प्रभावित हुए और आजादी की लड़ाई में शामिल हो गए। गांधी जी के नमक आंदोलन में उन्होंने देश के लिए लड़ाई लड़ी। 1942 से 1944 तक सात बार जेल भी गए। राजगुरु बताते हैं कि पिता सीताराम को सरकार से 25-26 हजार पेंशन मिलती थी। वर्ष 1990 में उनकी मौत के बाद मां रामरति को पेंशन मिलती रही। मां की मौत के बाद वह तीन भाई बचे। भाई लल्लूराम होमगार्ड में थे। वर्ष 1990 में कर्फ्यू के दौरान पथराव में उनकी मौत हो गई थी। छोटा भाई ग्वालियर में रहता है। माता-पिता की मौत के बाद नौकरी न होने पर वर्षों उन्होंने जवा की रोटी खाकर दिन बिताए गुजारे हैं।
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