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फोलिक एसिड की कमी से विकसित नहीं हो पाई बच्चे की रीढ़ की हड्डी
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झांसी। गर्भावस्था के दौरान महिला ने फोलिक एसिड की दवाएं नहीं खाईं। बाद में जब बच्चे को जन्म दिया तो उसकी पीठ में नींबू के बराबर उभार था, जो डेढ़ साल में फुटबॉल जितना बढ़ गया। इस कारण बच्चा न करवट ले सकता था और न बैठ पाता है। दिन भर रोता रहता था। झांसी में डॉक्टर ने डॉक्टर ने उसकी सर्जरी की।
छतरपुर निवासी डेढ़ साल के बच्चे को परिजनों ने पहले वहीं के मेडिकल कॉलेज में दिखाया, जहां से उसे जबलपुर रेफर कर दिया गया। झांसी के न्यूरो सर्जन डॉ. नीरज खेड़ा ने बताया कि वहां से बच्चे को दिल्ली रेफर किया गया। बाद में परिजन उसे झांसी ले आए। उन्होंने बताया कि बच्चा मेनिंगोमाइलोसील बीमारी से पीड़ित था। दरअसल, ये जन्मजात रीढ़ की बीमारी है। इसमें रीढ़ की हड्डी विकसित नहीं हो पाती है। पीठ पर फोड़ा जैसा हो जाता है और नसें आपस में चिपककर गुच्छा बना लेती हैं। दिमाग का पानी भी इसी गुच्छे में इकट्ठा होता रहता है। इस बच्चे का ऑपरेशन तो जन्म के दो सप्ताह के अंदर ही हो जाना चाहिए था। देरी की वजह से बच्चे को बहुत तकलीफ थी। वह सो और उठ-बैठ नहीं पाता था। दिन भर बिस्तर पर पड़ा रोता रहता था। कुछ खाता पीता भी नहीं था। कहा कि बच्चे की मां ने गर्भावस्था के दौरान फोलिक एसिड नहीं खाया। अधिकांश इसकी कमी से ही ये बीमारी होती है।
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छतरपुर निवासी डेढ़ साल के बच्चे को परिजनों ने पहले वहीं के मेडिकल कॉलेज में दिखाया, जहां से उसे जबलपुर रेफर कर दिया गया। झांसी के न्यूरो सर्जन डॉ. नीरज खेड़ा ने बताया कि वहां से बच्चे को दिल्ली रेफर किया गया। बाद में परिजन उसे झांसी ले आए। उन्होंने बताया कि बच्चा मेनिंगोमाइलोसील बीमारी से पीड़ित था। दरअसल, ये जन्मजात रीढ़ की बीमारी है। इसमें रीढ़ की हड्डी विकसित नहीं हो पाती है। पीठ पर फोड़ा जैसा हो जाता है और नसें आपस में चिपककर गुच्छा बना लेती हैं। दिमाग का पानी भी इसी गुच्छे में इकट्ठा होता रहता है। इस बच्चे का ऑपरेशन तो जन्म के दो सप्ताह के अंदर ही हो जाना चाहिए था। देरी की वजह से बच्चे को बहुत तकलीफ थी। वह सो और उठ-बैठ नहीं पाता था। दिन भर बिस्तर पर पड़ा रोता रहता था। कुछ खाता पीता भी नहीं था। कहा कि बच्चे की मां ने गर्भावस्था के दौरान फोलिक एसिड नहीं खाया। अधिकांश इसकी कमी से ही ये बीमारी होती है।
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