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सारे मनोरथ पूर्ण करने वाला है लहर की देवी मंदिर में स्थापित प्राचीन शिवलिंग
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झांसी। लहरगिर्द मार्ग पर स्थित लहर की देवी मंदिर में विराजित भगवान भोलेनाथ का प्राचीन शिवलिंग सर्व मनोरथ पूर्ण करने वाला है। महाशिवरात्रि पर मंदिर में अभिषेक और आरती की जाएगी। हजारों भक्त भोलेनाथ के दर्शन करेंगे।
ऐसी मान्यता है कि यहां मूर्ति की स्थापना आल्हा ने कराई थी। जब यहां मूर्ति की स्थापना की गई थी तब पहुंज नदी की लहरें यहां तक हिलोरें मारती थीं। इसी कारण से इस मंदिर का नाम लहर की देवी कहा जाने लगा। मंदिर के महंत एवं पुजारी बलराम गिरी महाराज बताते हैं कि यह मंदिर आल्हा के समय का है। इस वक्त यह पूरा क्षेत्र जंगल था।
मंदिर में देवी माता और भगवान भोलेनाथ ही मूर्ति अति प्राचीन है। भोलेनाथ का अरघा (जलरी) अति सुंदर है। एक ऊंचे पत्थर के चबूतरे पर विराजमान शिवजी के शिवलिंग पर धातु का सर्प फन फैलाए खड़ा है। वहीं अरघे के ऊपर भी धातु का एक सर्प लिपटा हुआ है। महंत बलराम गिरी बताते हैं कि मंदिर में कई शहरों के साधु-संतों का आना-जाना रहता है। भोलेनाथ और मां भवानी की विशेष पूजा के लिए साधुओं का एक अलग सिद्ध धूना है। इस धूने (हवन कुंड) पर सिर्फ साधु-संत ही हवन पूजन करते हैं। आम भक्तों के लिए अलग से हवन कुंड बना हुआ है। कई साधु संत मंदिर में धूनी रमाते हैं। यहां भक्त दूर-दूर से दर्शन करने आते हैं।
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मनचाही कामना और संतान प्राप्ति के लिए मंदिर में झूला चढ़ाते हैं भक्त
झांसी। मंदिर में अपनी मुरादें लेकर आने वाले भक्त देवी के दर्शन के साथ-साथ भगवान भोलेनाथ के दर्शन कर मुरादें मांगते हैं। महंत बलराम गिरी महाराज बताते हैं कि मनोकामना पूर्ण होने पर मंदिर में झूला चढ़ाने की परंपरा है। हवन कुंड के पास एक स्थान पर झूले चढ़ाए जाते हैं। मनचाही कामना और संतान प्राप्ति के लिए पूरे जिले से लोग यहां आते हैं।
मंदिर में विराजमान हैं नौ देवता
झांसी। इस मंदिर में नौ देवी-देवताओं की मूर्तियां स्थापित हैं। मंदिर में आने वाले साधु-संतों के लिए भोजन, पानी और विश्राम और हवन-पूजन की अलग से व्यवस्था की गई है। मंदिर परिसर के सामने एक ऊंचे टीले पर भगवान श्रीगणेश, भगवान शनिदेव और हनुमान जी के अलावा भगवान भोलेनाथ की छोटी सी मठिया भी है। यहां भी प्रतिदिन पूजा होती है।
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ऐसी मान्यता है कि यहां मूर्ति की स्थापना आल्हा ने कराई थी। जब यहां मूर्ति की स्थापना की गई थी तब पहुंज नदी की लहरें यहां तक हिलोरें मारती थीं। इसी कारण से इस मंदिर का नाम लहर की देवी कहा जाने लगा। मंदिर के महंत एवं पुजारी बलराम गिरी महाराज बताते हैं कि यह मंदिर आल्हा के समय का है। इस वक्त यह पूरा क्षेत्र जंगल था।
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मंदिर में देवी माता और भगवान भोलेनाथ ही मूर्ति अति प्राचीन है। भोलेनाथ का अरघा (जलरी) अति सुंदर है। एक ऊंचे पत्थर के चबूतरे पर विराजमान शिवजी के शिवलिंग पर धातु का सर्प फन फैलाए खड़ा है। वहीं अरघे के ऊपर भी धातु का एक सर्प लिपटा हुआ है। महंत बलराम गिरी बताते हैं कि मंदिर में कई शहरों के साधु-संतों का आना-जाना रहता है। भोलेनाथ और मां भवानी की विशेष पूजा के लिए साधुओं का एक अलग सिद्ध धूना है। इस धूने (हवन कुंड) पर सिर्फ साधु-संत ही हवन पूजन करते हैं। आम भक्तों के लिए अलग से हवन कुंड बना हुआ है। कई साधु संत मंदिर में धूनी रमाते हैं। यहां भक्त दूर-दूर से दर्शन करने आते हैं।
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मनचाही कामना और संतान प्राप्ति के लिए मंदिर में झूला चढ़ाते हैं भक्त
झांसी। मंदिर में अपनी मुरादें लेकर आने वाले भक्त देवी के दर्शन के साथ-साथ भगवान भोलेनाथ के दर्शन कर मुरादें मांगते हैं। महंत बलराम गिरी महाराज बताते हैं कि मनोकामना पूर्ण होने पर मंदिर में झूला चढ़ाने की परंपरा है। हवन कुंड के पास एक स्थान पर झूले चढ़ाए जाते हैं। मनचाही कामना और संतान प्राप्ति के लिए पूरे जिले से लोग यहां आते हैं।
मंदिर में विराजमान हैं नौ देवता
झांसी। इस मंदिर में नौ देवी-देवताओं की मूर्तियां स्थापित हैं। मंदिर में आने वाले साधु-संतों के लिए भोजन, पानी और विश्राम और हवन-पूजन की अलग से व्यवस्था की गई है। मंदिर परिसर के सामने एक ऊंचे टीले पर भगवान श्रीगणेश, भगवान शनिदेव और हनुमान जी के अलावा भगवान भोलेनाथ की छोटी सी मठिया भी है। यहां भी प्रतिदिन पूजा होती है।