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Jhansi News: नवंबर के मध्य तक करें चने की बोआई, उन्नत किस्मों से बढ़ाएं उत्पादन

Fri, 06 Nov 2026 01:39 AM IST
Jhansi Bureau झांसी ब्यूरो
Updated Fri, 06 Nov 2026 01:39 AM IST
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Sow chickpeas by mid-November; increase production using improved varieties.
झांसी। बुंदेलखंड के किसानों के लिए चने की बोआई का अनुकूल समय चल रहा है। कृषि वैज्ञानिकों ने किसानों को नवंबर के मध्य तक बोआई पूरी करने की सलाह दी है। रानी लक्ष्मीबाई केंद्रीय कृषि विश्वविद्यालय के आनुवंशिकी एवं पादप प्रजनन विभाग के वैज्ञानिक डॉ. जितेंद्र तिवारी ने कहा कि उन्नत किस्मों के चयन, बीजोपचार और संतुलित उर्वरक प्रबंधन से चने की पैदावार बढ़ाई जा सकती है।
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डॉ. तिवारी के अनुसार, बुंदेलखंड में मार, काबर, परवा और राकर प्रमुख मिट्टियां हैं। इनमें नमी धारण करने की अच्छी क्षमता के कारण मार और काबर मिट्टी चने की खेती के लिए विशेष रूप से उपयुक्त हैं। उचित जल निकास वाली परवा मिट्टी में भी अच्छी पैदावार ली जा सकती है। मार मिट्टी में जलभराव से बचना जरूरी है, जबकि राकर मिट्टी में नमी संरक्षण पर विशेष ध्यान देना चाहिए।
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उन्होंने बताया कि किसान मिट्टी और स्थानीय जलवायु के अनुसार किस्मों का चयन करें। उन्नत किस्मों में पूसा चना मानव उकठा रोग प्रतिरोधी है। इसकी संभावित उपज 20 से 25 क्विंटल प्रति हेक्टेयर है। पूसा पार्वती की उपज क्षमता 20 से 22 क्विंटल प्रति हेक्टेयर है। यह किस्म यांत्रिक कटाई के लिए भी उपयुक्त है। इंदिरा चना-1 से 15 से 18 क्विंटल प्रति हेक्टेयर तक उपज मिल सकती है।
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काबुली चने की खेती करने वाले किसान पूसा-3022, कंचन और माधव किस्मों का चयन कर सकते हैं। कंचन की संभावित उपज 18 से 20 क्विंटल और माधव की 14 से 22 क्विंटल प्रति हेक्टेयर है। माधव किस्म 130 से 135 दिन में पककर तैयार हो जाती है। बीजोपचार के बाद करें बोआई चने की बोआई नवंबर के मध्य तक कर लेना लाभकारी रहता है। देसी चने के लिए 75 से 80 किलोग्राम और बड़े दाने वाले काबुली चने के लिए 80 से 100 किलोग्राम बीज प्रति हेक्टेयर की जरूरत होती है। बोआई से पहले बीज को अनुशंसित फफूंदनाशी या ट्राइकोडर्मा से उपचारित करें। इसके बाद राइजोबियम और पीएसबी जैव उर्वरक से बीजोपचार करना लाभकारी है। सीड ड्रिल से 30 से 45 सेंटीमीटर कतार दूरी पर बोआई करने से पौधों का समुचित विकास होता है।


नमी संरक्षण और जल निकास पर दें ध्यान
बुंदेलखंड में वर्षा आधारित और सीमित सिंचाई वाली परिस्थितियों को देखते हुए खेत में नमी बनाए रखना जरूरी है। मिट्टी परीक्षण के आधार पर उर्वरकों का प्रयोग करें। सामान्यतः प्रति हेक्टेयर 20 से 25 किलोग्राम नाइट्रोजन, 40 से 60 किलोग्राम फास्फोरस (पी₂ओ₅) और 20 किलोग्राम सल्फर की जरूरत होती है। सिंचाई की सुविधा होने पर फूल आने और फलियां बनने की अवस्था में आवश्यकतानुसार हल्की सिंचाई करें। उकठा और जड़ सड़न रोग से बचाव के लिए रोग प्रतिरोधी किस्मों, बीजोपचार, फसल चक्र और उचित जल निकास की व्यवस्था अपनाएं।
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