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‘सुट्टा’ पर सीओपीडी का ‘झपट्टा’
अमर उजाला ब्यूरो
Updated Wed, 16 Nov 2016 12:45 AM IST
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health news
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युवाओं के बीच स्टेटस सिंबल बन चुका सिगरेट पीने का शौक उन्हें सीओपीडी जैसी गंभीर बीमारी की चपेट में ला रहा है। आम तौर पर यह बीमारी 40 साल के बाद शुरू होती है लेकिन चेन स्मोकर्स को इस उम्र से पहले ही सीओपीडी अपना शिकार बना रही है।
क्रॉनिक ऑब्सट्रक्टिव पुलमुनौरी डिसीज (सीओपीडी) अस्थमा से खतरनाक बीमारी है। यह बीमारी होने से सांस नली में सिकुड़न व सूजन आ सकती है। जो भविष्य में फेफड़ों को स्थाई रूप में क्षतिग्रस्त कर सकती है। सीओपीडी दो प्रकार का होता है। पहला क्रानिक ब्रांकाइटिस और दूसरा एमफीसीमा। क्रानिक ब्रांकाइटिस से सामान्यत: एक लंबे वक्त तक रोगी को खांसी व बलगम की शिकायत रहती है। एमफीसीमा में एक अर्से बाद रोगी के फेफड़े क्षतिग्रस्त हो जाते हैं। सीओपीडी का मुख्य कारण धूम्रपान है। अगर रोगी इस लत को नहीं छोड़ते हैं तो बीमारी गंभीर रूप अख्तियार कर लेती है। विशेषज्ञों की मानें तो मौजूदा समय में युवाओं में बढ़े धूम्रपान के क्रेज ने इस बीमारी को और पांव पसारने का मौका दे दिया है।
हर दस सेकेंड में होती एक मौत
डब्ल्यूएचओ की एक रिपोर्ट के मुताबिक भारत में हर दस सेकेंड में सीओपीडी से ग्रसित रोगी की मौत हो जाती है। देश में हर साल सीओपीडी रोगियों की मरने की संख्या पांच लाख है।
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यह भी हैं बीमारी के कारण
- धूल धुआं और प्रदूषित माहौल में काफी समय तक रहने से भी रोग का जोखिम बढ़ जाता है।
- जो महिलाएं ग्रामीण या अन्य क्षेत्रों में चूल्हे पर खाना बनाती हैं, उनमें सीओपीडी से ग्रस्त होने के मामले ज्यादा बढ़ जाते हैं।
- जो लोग रासायनिक संयत्रों में या ऐसे कर्मस्थलों में कार्य करते हैं, जहां नुकसानदेह गैस है। ऐसे में सीओपीडी का जोखिम बढ़ा सकता है।
यह हैं लक्षण
- लंबे समय तक खांसी न ठीक हो रही हो, बलगम का बनना, सांस फूलना या सांस लेने में परेशानी
ऐसे करें बचाव
-डॉक्टर से परामर्श ले इनफ्लूएंजा व न्यूमोकोफल वैक्सीन लगवाएं, धूम्रपान न करें और धूम्रपान करने वाले से दूर रहें, धूल-धुआं और प्रदूषित माहौल से बचें
फेफड़े के टिश्यूज क्षतिग्रस्त होने के कारण सीओपीडी का मरीज ठीक से सांस नहीं ले पाता है। रोगी की सूक्ष्म सांस नलियां खुली नहीं रहती हैं। आगे चलकर यह समस्या बहुत बढ़ जाती है। युवाओं में बढ़ी धूम्रपान की लत से उन्हें यह बीमारी अपनी चपेट में ले सकती है।
डॉ. मधुर्मय शास्त्री, मेडिकल कॉलेज चेस्ट रोग विभागाध्यक्ष
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क्रॉनिक ऑब्सट्रक्टिव पुलमुनौरी डिसीज (सीओपीडी) अस्थमा से खतरनाक बीमारी है। यह बीमारी होने से सांस नली में सिकुड़न व सूजन आ सकती है। जो भविष्य में फेफड़ों को स्थाई रूप में क्षतिग्रस्त कर सकती है। सीओपीडी दो प्रकार का होता है। पहला क्रानिक ब्रांकाइटिस और दूसरा एमफीसीमा। क्रानिक ब्रांकाइटिस से सामान्यत: एक लंबे वक्त तक रोगी को खांसी व बलगम की शिकायत रहती है। एमफीसीमा में एक अर्से बाद रोगी के फेफड़े क्षतिग्रस्त हो जाते हैं। सीओपीडी का मुख्य कारण धूम्रपान है। अगर रोगी इस लत को नहीं छोड़ते हैं तो बीमारी गंभीर रूप अख्तियार कर लेती है। विशेषज्ञों की मानें तो मौजूदा समय में युवाओं में बढ़े धूम्रपान के क्रेज ने इस बीमारी को और पांव पसारने का मौका दे दिया है।
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हर दस सेकेंड में होती एक मौत
डब्ल्यूएचओ की एक रिपोर्ट के मुताबिक भारत में हर दस सेकेंड में सीओपीडी से ग्रसित रोगी की मौत हो जाती है। देश में हर साल सीओपीडी रोगियों की मरने की संख्या पांच लाख है।
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यह भी हैं बीमारी के कारण
- धूल धुआं और प्रदूषित माहौल में काफी समय तक रहने से भी रोग का जोखिम बढ़ जाता है।
- जो महिलाएं ग्रामीण या अन्य क्षेत्रों में चूल्हे पर खाना बनाती हैं, उनमें सीओपीडी से ग्रस्त होने के मामले ज्यादा बढ़ जाते हैं।
- जो लोग रासायनिक संयत्रों में या ऐसे कर्मस्थलों में कार्य करते हैं, जहां नुकसानदेह गैस है। ऐसे में सीओपीडी का जोखिम बढ़ा सकता है।
यह हैं लक्षण
- लंबे समय तक खांसी न ठीक हो रही हो, बलगम का बनना, सांस फूलना या सांस लेने में परेशानी
ऐसे करें बचाव
-डॉक्टर से परामर्श ले इनफ्लूएंजा व न्यूमोकोफल वैक्सीन लगवाएं, धूम्रपान न करें और धूम्रपान करने वाले से दूर रहें, धूल-धुआं और प्रदूषित माहौल से बचें
फेफड़े के टिश्यूज क्षतिग्रस्त होने के कारण सीओपीडी का मरीज ठीक से सांस नहीं ले पाता है। रोगी की सूक्ष्म सांस नलियां खुली नहीं रहती हैं। आगे चलकर यह समस्या बहुत बढ़ जाती है। युवाओं में बढ़ी धूम्रपान की लत से उन्हें यह बीमारी अपनी चपेट में ले सकती है।
डॉ. मधुर्मय शास्त्री, मेडिकल कॉलेज चेस्ट रोग विभागाध्यक्ष