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पहले बनाए मास्क, अब की चार हजार स्कू्ल ड्रेस की सिलाई
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झांसी। स्वयं सहायता समूह की महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाने व रोजगार मुहैया कराने के लिए सरकार द्वारा जिले के प्राथमिक व उच्च प्राथमिक स्कूलों के बच्चों की ड्रेस की सिलाई का आदेश जारी किया गया था। जिसके तहत समूह की महिलाओं ने जुलाई माह से अब दिन रात मेहनत कर जिले के 75 स्कूलों के लगभग 4000 बच्चों की ड्रेस को तैयार कर स्कूलों के सुपुर्द कर दिया है। हालांकि, कोरोना काल में इन महिलाओं ने फेस मास्क भी तैयार कर वितरित किए थे।
जिले में राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन से संबद्ध महिला स्वयं सहायता समूह की संख्या लगभग 350 है। जिसमें से सिलाई संबंधी कार्य करने वाले सक्रिय समूह की संख्या 80 है। समूह को सरकार द्वारा सरकारी स्कूली बच्चों की ड्रेस की सिलाई का जिम्मा मिलते ही समूह की महिलाएं तुरंत ही हरकत में आईं व स्कूलों में जाकर बच्चों का नाप लिया। महिलाओं को स्कूलों द्वारा जुलाई माह में कपड़ा दिया गया था। कपड़ा मिलते ही सिलाई का कार्य शुरू किया था। महिलाओं द्वारा कड़ी मेहनत कर दो माह के भीतर ही चार हजार से अधिक स्कूली ड्रेस को तैयार किया गया है। विद्यालयों द्वारा ड्रेस को तैयार करने के एवज में समूह को 90 रुपये प्रति ड्रेस के हिसाब से भुगतान किया जाता है। इस संबंध में नगरीय विकास अभिकरण की (डूडा) जिला परियोजना अधिकारी संगीता सिंह ने बताया की समूह की महिलाओं द्वारा अब तक लगभग चार हजार से अधिक स्कूली ड्रेस को तैयार कर स्कूल प्रबंधकों के सुपुर्द कर दिया है।
स्कूली बच्चों की सिलाई का काम मिलते ही सभी महिलाओं ने काम को जल्द ही निपटाने के लिए दिन रात मेहनत की है। सिलाई का कार्य समय रहते ही पूरा कर लिया गया है।
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राखी जोशी, वॉलिंटियर
सभी सदस्यों की बराबरी की भागीदारी रही है। विद्यालयों से कपड़ा मिलते ही सिलाई का काम में जुट गए थे। कार्य करने में काफी खुशी हो रही है।
सपना, सीआरपी
काम करने पर महिलाएं आत्मनिर्भर हैं। सरकार द्वारा आदेश मिलते ही समूह की सदस्य अपने कार्य को अंजाम देने के लिए काफी उत्साहित हो गई थीं।
कुसुम पंडा, सीआरपी
मेहनत करने के लिए समूह की सभी महिलाएं हमेशा से आगे रही हैं। किसी भी तरह का कार्य मिलते ही सभी सदस्य कार्य को अंतिम पायदान पर पहुंचाने के लिए आतुर रहती हैं।
सरोज यादव, सीआरपी
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जिले में राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन से संबद्ध महिला स्वयं सहायता समूह की संख्या लगभग 350 है। जिसमें से सिलाई संबंधी कार्य करने वाले सक्रिय समूह की संख्या 80 है। समूह को सरकार द्वारा सरकारी स्कूली बच्चों की ड्रेस की सिलाई का जिम्मा मिलते ही समूह की महिलाएं तुरंत ही हरकत में आईं व स्कूलों में जाकर बच्चों का नाप लिया। महिलाओं को स्कूलों द्वारा जुलाई माह में कपड़ा दिया गया था। कपड़ा मिलते ही सिलाई का कार्य शुरू किया था। महिलाओं द्वारा कड़ी मेहनत कर दो माह के भीतर ही चार हजार से अधिक स्कूली ड्रेस को तैयार किया गया है। विद्यालयों द्वारा ड्रेस को तैयार करने के एवज में समूह को 90 रुपये प्रति ड्रेस के हिसाब से भुगतान किया जाता है। इस संबंध में नगरीय विकास अभिकरण की (डूडा) जिला परियोजना अधिकारी संगीता सिंह ने बताया की समूह की महिलाओं द्वारा अब तक लगभग चार हजार से अधिक स्कूली ड्रेस को तैयार कर स्कूल प्रबंधकों के सुपुर्द कर दिया है।
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स्कूली बच्चों की सिलाई का काम मिलते ही सभी महिलाओं ने काम को जल्द ही निपटाने के लिए दिन रात मेहनत की है। सिलाई का कार्य समय रहते ही पूरा कर लिया गया है।
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राखी जोशी, वॉलिंटियर
सभी सदस्यों की बराबरी की भागीदारी रही है। विद्यालयों से कपड़ा मिलते ही सिलाई का काम में जुट गए थे। कार्य करने में काफी खुशी हो रही है।
सपना, सीआरपी
काम करने पर महिलाएं आत्मनिर्भर हैं। सरकार द्वारा आदेश मिलते ही समूह की सदस्य अपने कार्य को अंजाम देने के लिए काफी उत्साहित हो गई थीं।
कुसुम पंडा, सीआरपी
मेहनत करने के लिए समूह की सभी महिलाएं हमेशा से आगे रही हैं। किसी भी तरह का कार्य मिलते ही सभी सदस्य कार्य को अंतिम पायदान पर पहुंचाने के लिए आतुर रहती हैं।
सरोज यादव, सीआरपी