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रेल पटरियों की सुरक्षा में लगे होमगार्ड
Jhansi
Updated Sat, 06 Jan 2018 01:32 AM IST
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- फोटो : demo
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कोहरे में रेलवे पटरियों की निगरानी और सुरक्षा के लिए रात में पेट्रोलमैन के साथ होमगार्डों की भी ड्यूटी लगाई जा रही हैं। मंडल में अभी 63 होमगार्ड लगाए गए हैं। जिन रेलखंडों में होमगार्डों की व्यवस्था नहीं है, वहां ठेकेदार के कर्मचारी पेट्रोलमैन के साथ भेजे जा रहे हैं।
सर्दी में पटरियां सिकुड़ती और गर्मियों में फैलती हैं। इससे रेल फ्रैक्चर (पटरी का चटकना या टूटना) होने की संभावना बनी रहती है। इस कारण रेल प्रशासन सर्दियों में रात और गर्मियों मेें दिन में पटरियों की निगरानी पर विशेष ध्यान देता है, ताकि कोई दुर्घटना नहीं हो सके। वैसे पटरियों की निगरानी के लिए रात में डबल ट्रैक पर दो पेट्रोलमैन की एक साथ दो किलोमीटर तक और सिंगल ट्रैक पर चार किलोमीटर तक ड्यूटी लगती हैं। मगर, मंडल में पेट्रोलमैन की कमी के कारण इस बार होमगार्ड और ठेकेदार के कर्मचारियों का भी सहारा लिया जा रहा है। पेट्रोलमैन के साथ होमगार्ड या ठेकेदार के कर्मचारी भेजा जा रहा है, ताकि दो लोगों के रहने से उनमें डर न रहे और पटरियों की निगरानी भी पूरी तरह होती रहे।
रेलवे ने अभी होमगार्ड विभाग से 63 जवानों को लिया है, जिनमें दतिया से तालबेहट खंड के बीच 30, झांसी से हरपालपुर के बीच 13 और झांसी से पिरौना के बीच 19 होमगार्ड लगाए गए हैं। इनकी ड्यूटी रात 12 बजे से सुबह आठ बजे रहती है। बदले में रेलवे प्रतिदिन के हिसाब से होमगार्ड को 385 रुपये का भुगतान कर रहा है। प्रभारी जनसंपर्क अधिकारी नीरज भटनागर ने बताया कि सुरक्षा की दृष्टि से यह कदम उठाया गया है।
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ये देना पड़ता है ध्यान
सर्दी में पटरियां सिकुड़ती और गर्मियों में फैलती हैं। इससे रेल फ्रैक्चर (पटरी का चटकना या टूटना) होने की संभावना बनी रहती है। पटरी के बीच दरार आने को ही उसका चटकना कहते है। दरार बढ़ जाने पर ट्रेन किसी भी समय दुर्घटनाग्रस्त हो सकती है।
पटरियों के नीचे डले रहने वाले सीमेंट के खंभों को स्लीपर कहते हैं। स्लीपर के ऊपर पटरियां एक निश्चित दूरी पर कसी रहती हैं, जिससे पटरियां आगे-पीछे न हो।
ढीली चाबियां
स्लीपर से पटरियां चाबियों से कसी रहती हैं। चाबी ढीली होने पर पटरी और स्लीपर के बीच कसाव कम हो सकता है। यहीं कारण है कि दिन में पटरियों की निगरानी करने वाले गैंगमैन चाबियों को हथौड़े से ठोंक कर उनकी जांच करते रहते हैं।
ज्वाइंट वेल्डिंग
दो पटरियां जिस स्थान पर जुड़ी रहती हैं उसे ज्वाइंट वेल्डिंग कहते है। ज्वाइंट वेल्डिंग कहीं खुल न जाए, इसका ध्यान भी पेट्रोलिंग के दौरान रखना पड़ता है।
क्रासिंग प्वाइंट
एक पटरी से दूसरी पटरी पर जब ट्रेन आगे बढ़ती है तो उस स्थान को क्रासिंग प्वाइंट कहते है। क्रासिंग प्वाइंट पहियों के पटरी से उतरने की संभावना रहती हैं, इस कारण प्वाइंट पर ट्रेनों को धीमी गति से गुजारा जाता है।
यह भी जानिए
इंजीनियरिंग विभाग से रेल पथ निरीक्षक, ट्रैकमैन, कीमैन, ट्रॉली मैन, गेटमैन, पेट्रोल मैन आते हैं। यह सभी कर्मचारी ट्रेन ऑपरेशन (गाड़ी संचालन) से जुड़े हैं। दरअसल, रेल पटरियों (ट्रैक) के रखरखाव का काम रेल पथ निरीक्षक के नेतृत्व में होता हैं। ट्रैकमैन, कीमैन और गेटमैन रेल पथ निरीक्षक के अधीन काम करते हैं।
1300 कर्मचारियों की कमी
झांसी रेल मंडल में किलोमीटर के हिसाब से कम से कम पांच हजार ट्रैकमैनों की आवश्यकता हैं, जबकि 3670 ही तैनात हैं। ट्रैकमैन को कीमैन, पेट्रोल मैन और गेटमैन का काम भी करना पड़ता हैं।
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सर्दी में पटरियां सिकुड़ती और गर्मियों में फैलती हैं। इससे रेल फ्रैक्चर (पटरी का चटकना या टूटना) होने की संभावना बनी रहती है। इस कारण रेल प्रशासन सर्दियों में रात और गर्मियों मेें दिन में पटरियों की निगरानी पर विशेष ध्यान देता है, ताकि कोई दुर्घटना नहीं हो सके। वैसे पटरियों की निगरानी के लिए रात में डबल ट्रैक पर दो पेट्रोलमैन की एक साथ दो किलोमीटर तक और सिंगल ट्रैक पर चार किलोमीटर तक ड्यूटी लगती हैं। मगर, मंडल में पेट्रोलमैन की कमी के कारण इस बार होमगार्ड और ठेकेदार के कर्मचारियों का भी सहारा लिया जा रहा है। पेट्रोलमैन के साथ होमगार्ड या ठेकेदार के कर्मचारी भेजा जा रहा है, ताकि दो लोगों के रहने से उनमें डर न रहे और पटरियों की निगरानी भी पूरी तरह होती रहे।
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रेलवे ने अभी होमगार्ड विभाग से 63 जवानों को लिया है, जिनमें दतिया से तालबेहट खंड के बीच 30, झांसी से हरपालपुर के बीच 13 और झांसी से पिरौना के बीच 19 होमगार्ड लगाए गए हैं। इनकी ड्यूटी रात 12 बजे से सुबह आठ बजे रहती है। बदले में रेलवे प्रतिदिन के हिसाब से होमगार्ड को 385 रुपये का भुगतान कर रहा है। प्रभारी जनसंपर्क अधिकारी नीरज भटनागर ने बताया कि सुरक्षा की दृष्टि से यह कदम उठाया गया है।
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ये देना पड़ता है ध्यान
सर्दी में पटरियां सिकुड़ती और गर्मियों में फैलती हैं। इससे रेल फ्रैक्चर (पटरी का चटकना या टूटना) होने की संभावना बनी रहती है। पटरी के बीच दरार आने को ही उसका चटकना कहते है। दरार बढ़ जाने पर ट्रेन किसी भी समय दुर्घटनाग्रस्त हो सकती है।
पटरियों के नीचे डले रहने वाले सीमेंट के खंभों को स्लीपर कहते हैं। स्लीपर के ऊपर पटरियां एक निश्चित दूरी पर कसी रहती हैं, जिससे पटरियां आगे-पीछे न हो।
ढीली चाबियां
स्लीपर से पटरियां चाबियों से कसी रहती हैं। चाबी ढीली होने पर पटरी और स्लीपर के बीच कसाव कम हो सकता है। यहीं कारण है कि दिन में पटरियों की निगरानी करने वाले गैंगमैन चाबियों को हथौड़े से ठोंक कर उनकी जांच करते रहते हैं।
ज्वाइंट वेल्डिंग
दो पटरियां जिस स्थान पर जुड़ी रहती हैं उसे ज्वाइंट वेल्डिंग कहते है। ज्वाइंट वेल्डिंग कहीं खुल न जाए, इसका ध्यान भी पेट्रोलिंग के दौरान रखना पड़ता है।
क्रासिंग प्वाइंट
एक पटरी से दूसरी पटरी पर जब ट्रेन आगे बढ़ती है तो उस स्थान को क्रासिंग प्वाइंट कहते है। क्रासिंग प्वाइंट पहियों के पटरी से उतरने की संभावना रहती हैं, इस कारण प्वाइंट पर ट्रेनों को धीमी गति से गुजारा जाता है।
यह भी जानिए
इंजीनियरिंग विभाग से रेल पथ निरीक्षक, ट्रैकमैन, कीमैन, ट्रॉली मैन, गेटमैन, पेट्रोल मैन आते हैं। यह सभी कर्मचारी ट्रेन ऑपरेशन (गाड़ी संचालन) से जुड़े हैं। दरअसल, रेल पटरियों (ट्रैक) के रखरखाव का काम रेल पथ निरीक्षक के नेतृत्व में होता हैं। ट्रैकमैन, कीमैन और गेटमैन रेल पथ निरीक्षक के अधीन काम करते हैं।
1300 कर्मचारियों की कमी
झांसी रेल मंडल में किलोमीटर के हिसाब से कम से कम पांच हजार ट्रैकमैनों की आवश्यकता हैं, जबकि 3670 ही तैनात हैं। ट्रैकमैन को कीमैन, पेट्रोल मैन और गेटमैन का काम भी करना पड़ता हैं।