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साब! बचाओ हमाये आदमी खौं गुंडा मार रये... हओ, अबईं आऊत, नैक गम तो खाओ

Wed, 28 Oct 2020 12:51 AM IST
Jhansi Bureau झांसी ब्यूरो
Updated Wed, 28 Oct 2020 12:51 AM IST
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Police language
झांसी। ‘कोस-कोस पे पानी बदले, चार कोस पे बानी’, जी हां, विविधताओं से भरे हमारे देश का कुछ ऐसा ही तानाबाना है। प्रदेश के ही अलग-अलग इलाकों की अपनी-अपनी क्षेत्रीय भाषाएं हैं, जो उन इलाके के लोगों के संवाद का अहम जरिया होती हैं। आए दिन यूपी 112 फोन पर पुलिस से भी लोग अपनी क्षेत्रीय भाषा में ही बात करते हैं, लेकिन अक्सर पुलिस समझने में धोखा खा जाती है, ऐसे में स्थिति असहज हो जाती है। लेकिन, आने वाले दिनों में ये स्थिति नहीं रहेगी। पुलिस पीड़ितों से उनकी ही बोली में बात करेगी। मुख्यमंत्री के निर्देश के बाद पुलिस महकमे ने इसकी तैयारी शुरू कर दी है।
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साब! बचाओ हमाये आदमी खौं गुंडा मार रये... झांसी के ककरबई से एक महिला का फोन यूपी- 112 कंट्रोल रूम पहुंचा। ड्यूटी पर मौजूद महिला पुलिसकर्मी एक दम आए इस फोन कॉल पर महिला की बात समझ नहीं पाई। उसने तुरंत पूछा कि आप कहां से बोल रही हैं। तो महिला ने बताया कि वह झांसी के ककरबई से बोल रही है। इसके बाद महिला पुलिसकर्मी ने तुरंत झांसी निवासी अपने सहकर्मी से पीड़ित महिला की बात कराई। उसने बुंदेली भाषा में जवाब दिया हओ, अबईं आऊत, नैक गम तो खाओ। पूरी बात समझ कर उसे समझाया कि पुलिस मदद के लिए पहुंच रही है। आए दिन प्रदेश के कोने-कोने से स्थानीय भाषा में ऐसे फोन कॉल यूपी-112 पर पहुंचते हैं। इनमें अवधी, भोजपुरी, बृज, बुंदेली समेत अन्य भाषाएं बोली जाती हैं। खासतौर पर ग्रामीण अंचलों में क्षेत्रीय भाषाएं ही संवाद का प्रमुख जरिया होती हैं।
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आकस्मिक स्थिति में 112 डायल करने वाले तमाम लोग भी पुलिस से क्षेत्रीय भाषाओं में ही बात करते हैं। अक्सर कंट्रोल रूम में बैठे पुलिस कर्मचारी भाषा समझ नहीं पाते, जिससे पीड़ित को तत्काल मदद नहीं मिल पाती। पुलिस की इस कमी को दूर करने के लिए मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने डायल-112 में फोन करने वाले लोगों से उन्हीं की भाषा में बात करने के निर्देश जारी किए हैं। इसके लिए कंट्रोल रूम में क्षेत्रीय संवाद अधिकारियों की तैनाती की जाएगी। संवाद अधिकारियों को क्षेत्रीय भाषाओं का प्रशिक्षण दिया जाएगा। इसके बाद कॉल करने वाले व्यक्ति जिस भाषा में बात करेगा, उसकी कॉल उसी भाषा के क्षेत्रीय संवाद अधिकारी के पास स्थानांतरित कर दी जाएगी। यानी कि बुंदेली भाषा में बात करने वालों से पुलिस बुंदेली में ही बात करेगी। इससे पुलिस और जनता के बीच संवाद और भी आसान हो जाएगा।
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मराठाओं ने भी अपना ली थी बुंदेली
झांसी। झांसी पर सवा सौ साल से अधिक मराठाओं का शासन रहा। सन 1729 में मराठा सूबेदार नारोशंकर ने झांसी का राज संभाला था, जो अनवरत रूप से पीढ़ी दर पीढ़ी 1858 तक कायम रहा। मराठा शासन काल के दौरान राज्य की प्रमुख भाषा बुंदेली ही रही। राज्य के शासकीय पत्र, संदेश, बीजक आदि सभी बुंदेली में ही लिखे जाते थे। यहां तक कि रानी के विवाह के निमंत्रण पत्र भी बुंदेली भाषा में ही प्रेषित किए गए थे। इसके प्रमाण अभी भी मौजूद हैं।
बुंदेली में रच बस गईं थीं झांसी की रानी
झांसी। वीरांगना महारानी लक्ष्मीबाई का जन्म भले ही महाराष्ट्रीयन परिवार में हुआ था, लेकिन झांसी आने के बाद वे पूरी तरह से बुंदेली में रच बस गईं थीं। वे जनता से आसानी से बुंदेली भाषा में संवाद करती थीं। जनता उन्हें प्यार से बुंदेली में ‘बाईसाब’ कहकर संबोधित करती थी। विदित हो कि बुंदेलखंड के तमाम ग्रामीण इलाकों में अब भी बच्चे मां को ‘बाई’ कहते हैं। उस दौर में ये ज्यादा प्रचलित था। ऐसे में बुंदेली जनता अपनी भाषा में रानी को बाईसाब कहकर मां समान सम्मान देती थी।
लोग पढ़ाई - लिखाई में भले ही खड़ी हिंदी का प्रयोग करते हैं, लेकिन बातचीत क्षेत्रीय भाषा में ही करते हैं। इसमें वे अपने आप को सहज महसूस करते हैं। मुख्यमंत्री के इस निर्देश के बाद लोग आसानी से अपनी बात पुलिस को समझा सकेंगे। साथ ही इससे क्षेत्रीय भाषाओं को भी बढ़ावा मिलेगा।

- हरगोविंद कुशवाहा, उपाध्यक्ष - अंतरराष्ट्रीय बौद्ध शोध संस्थान
डायल - 112 के कंट्रोल रूम में क्षेत्रीय संवाद अधिकारियों की तैनाती की जाएगी। ये अधिकारी फोन करने वाले लोगों से उन्हीं की क्षेत्रीय भाषाओं में बात करेंगे। इससे पुलिस और पब्लिक के बीच संवाद बेहद आसान हो जाएगा। लोग सहजता से अपनी बात पुलिस के समक्ष रख सकेंगे।
- दिनेश कुमार पी., एसएसपी
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