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अब पटरी पर लौटने लगी है जिंदगी
अमर उजाला ब्यूरो
Updated Sun, 25 Dec 2016 01:09 AM IST
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- फोटो : demo
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हजार और पांच सौ के नोट अचानक अमान्य घोषित किए जाने से शहर से सटे ग्रामीण इलाकों में भी लोगों के सामने भारी समस्याएं आ गईं थीं। लेकिन, अब हालात धीरे - धीरे सामान्य होने लगे हैं। कैश की किल्लत कम हो गई है। हालांकि, नोटबंदी से उपजी समस्याएं पूरी तरह से अब भी खत्म नहीं हुई हैं।
दूध के भुगतान में आ रही दिक्कत
झांसी। बड़ागांव ब्लाक का गांव खिरिया पाली शहर से महज सत्रह किलोमीटर की दूरी पर है। गांव के आसपास न तो बैंक शाखा है और न ही कोई एटीएम, ग्रामीणों को नकदी के लिए ग्वालियर रोड तक आना पड़ता है। नोटबंदी से यहां ग्रामीण खासे प्रभावित रहे। इसका असर अब भी बना हुआ है।
गांव के राम मिलन राजपूत ने बताया कि वह शहर में दूध बेचते हैं, लेकिन नोटबंदी के बाद से ग्राहक दूध का आसानी से भुगतान नहीं कर पा रहे हैं। शुरुआत में पंद्रह दिन तो एक पाई भी मुट्ठी में नहीं आई, जबकि इस दरम्यान जानवरों के लिए चारा, खर, भूसी का नकद में इंतजाम करना पड़ा। यह समय बेहद संकट में बीता। हालांकि, अब स्थिति धीरे - धीरे सामान्य हो रही हैं, लेकिन अब तक पूरी तरह से समस्या का समाधान नहीं हो पाया है।
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वहीं, कृषक अतुल ने बताया कि नोटों की कमी की वजह से गांव में कई खेतों में खाद, बीज के संकट की वजह से बुवाई भी नहीं हो पाई। अन्य किसानों ने भी जैसे तैसे बुवाई की। अब सिंचाई के लिए डीजल का इंतजाम करना मुश्किल हो रहा है।
मुश्किल से पटरी पर लौटी जिंदगी
नोटबंदी के बाद अमर उजाला ने शहर से पंद्रह किलोमीटर दूर ग्राम बेहटा में जाकर पड़ताल की। ग्रामीणों ने बताया कि नोटबंदी के बाद से शुरुआत में तो जनजीवन बुरी तरह से प्रभावित हो गया था, परंतु अब जैसे - तैसे हालात सामान्य होने लगे हैं।
किसान लक्ष्मीनारायण ने बताया कि नोटबंदी की घोषणा के बाद शुरूआती एक महीने तक तो भारी परेशानी रही। खेती के लिए खाद-बीज समेत रोजमर्रा की जरूरी सामानों की खरीद के लिए रुपयों का टोटा रहा। जरूरत पड़ने पर रिश्तेदार और जान पहचान वालों से आर्थिक मदद भी लेनी पड़ी, लेकिन अब व्यवस्था सुचारु हो गई है। किसी तरह की समस्या नहीं है।
किसान बलराम ने बताया कि गांव से पंद्रह किमी की दूरी पर पहला एटीएम एसबीआई का है। शुरुआत में हर तीसरे - चौथे दिन पैसा निकालने के लिए शहर तक भागना पड़ता था। घंटों लाइन में खड़ा रहना पड़ता था, परंतु अब स्थिति यह नहीं है। बैंक और एटीएम दोनों जगह से नकदी मिल रही है। पुराने बीज रखे होने की वजह से बुवाई में भी उन्हें ज्यादा परेशानी नहीं हुई।
पहले हुई परेशानी, अब हालात सामान्य
उन्नाव - बालाजी रोड स्थित केशवपुर गांव शहर से एकदम सटा हुआ है। अचानक हुए नोटबंदी के फैसले ने यहां ग्रामीणों को परेशानी में डाल दिया था, परंतु अब स्थिति सामान्य हो चली हैं। हालांकि, नोटबंदी की वजह से पैदा हुईं कुछ दिक्कतें अब भी ग्रामीणों को साल रही हैं।
किसान घनश्याम राजपूत ने बताया कि नोटबंदी की वजह से खाद - बीज की समस्या पैदा हो गई थी। उधार खाद मिल नहीं रही थी और नकदी हाथ में थी नहीं। उधार रुपये लेकर खाद - बीज खरीदना पड़ा था। इससे भारी समस्या पैदा हो गई थी। हालांकि, अब स्थिति सामान्य हो चली है। लोगों के हाथ में काम चलाने भर को नकदी पहुंच गई है।
किसान कमलेश ने बताया कि जरूरत के मुताबिक नकदी की व्यवस्था अब भी नहीं हो पाई है। बैंक से केवल दो हजार रुपये ही मिल रहे हैं। सबसे बड़ी दिक्कत मजदूरों के भुगतान की आ रही है। जैसे - तैसे काम चलाया जा रहा है। उम्मीद है कि जल्द ही स्थितियां सामान्य हो जाएंगी।
खेती पर भी है नोटबंदी का असर
नोटबंदी से पैदा हुई समस्या से बूढ़ा गांव के लोग अब तक पूरी तरह से उबर नहीं पाए हैं। खासतौर पर मजदूरों के भुगतान के लिए उन्हें नकदी की समस्या का सामना करना पड़ रहा है।
बूढ़ा गांव निवासी महेश कुमार प्रजापति ने बताया कि वह मजदूरी करता है। नोट बंदी होने से काम नहीं मिल रहा है। जिनके खेत हैं, वह भी हाथ पर हाथ रखे बैठे हैं। सीमेंट की दुकान करने वाले धर्मेंद्र श्रीवास ने बताया कि गांव के आसपास न कोई एटीएम हैं और न बैंक। बैंक से दो हजार रुपये निकालने के लिए आठ किमी दूर जाना पड़ता है। उनके खेत हैं, खेत पर काम करने के लिए मजदूर भी हैं, मगर उन्हें भुगतान करने को उनके पास मजदूरी नहीं।
भोजला गांव निवासी प्रदीप यादव ने बताया कि खेत गवाही दे रहे हैं कि नोटबंदी का गांवों पर क्या असर है। खेतों में फसल की बुबाई नहीं हो पाई है। उधारी पर बीज और खाद मिली नहीं। काली चरन ने बताया कि नोट बंदी के बाद से काम नहीं मिल रहा है। एक महीने में 15 दिन काम मिला है। ऐसी स्थिति में परिवार का पालन पोषण करने में दिक्कत आ रही है। परचून की दुकान करने वाले जय सिंह यादव ने बताया कि नोट बंदी की वजह से उनकी दुकान ठप हो गई थी, जो धीरे-धीरे रफ्तार पकड़ रही है। अब कितना समय रहेगा, कहा नहीं जा सकता है।
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दूध के भुगतान में आ रही दिक्कत
झांसी। बड़ागांव ब्लाक का गांव खिरिया पाली शहर से महज सत्रह किलोमीटर की दूरी पर है। गांव के आसपास न तो बैंक शाखा है और न ही कोई एटीएम, ग्रामीणों को नकदी के लिए ग्वालियर रोड तक आना पड़ता है। नोटबंदी से यहां ग्रामीण खासे प्रभावित रहे। इसका असर अब भी बना हुआ है।
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गांव के राम मिलन राजपूत ने बताया कि वह शहर में दूध बेचते हैं, लेकिन नोटबंदी के बाद से ग्राहक दूध का आसानी से भुगतान नहीं कर पा रहे हैं। शुरुआत में पंद्रह दिन तो एक पाई भी मुट्ठी में नहीं आई, जबकि इस दरम्यान जानवरों के लिए चारा, खर, भूसी का नकद में इंतजाम करना पड़ा। यह समय बेहद संकट में बीता। हालांकि, अब स्थिति धीरे - धीरे सामान्य हो रही हैं, लेकिन अब तक पूरी तरह से समस्या का समाधान नहीं हो पाया है।
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वहीं, कृषक अतुल ने बताया कि नोटों की कमी की वजह से गांव में कई खेतों में खाद, बीज के संकट की वजह से बुवाई भी नहीं हो पाई। अन्य किसानों ने भी जैसे तैसे बुवाई की। अब सिंचाई के लिए डीजल का इंतजाम करना मुश्किल हो रहा है।
मुश्किल से पटरी पर लौटी जिंदगी
नोटबंदी के बाद अमर उजाला ने शहर से पंद्रह किलोमीटर दूर ग्राम बेहटा में जाकर पड़ताल की। ग्रामीणों ने बताया कि नोटबंदी के बाद से शुरुआत में तो जनजीवन बुरी तरह से प्रभावित हो गया था, परंतु अब जैसे - तैसे हालात सामान्य होने लगे हैं।
किसान लक्ष्मीनारायण ने बताया कि नोटबंदी की घोषणा के बाद शुरूआती एक महीने तक तो भारी परेशानी रही। खेती के लिए खाद-बीज समेत रोजमर्रा की जरूरी सामानों की खरीद के लिए रुपयों का टोटा रहा। जरूरत पड़ने पर रिश्तेदार और जान पहचान वालों से आर्थिक मदद भी लेनी पड़ी, लेकिन अब व्यवस्था सुचारु हो गई है। किसी तरह की समस्या नहीं है।
किसान बलराम ने बताया कि गांव से पंद्रह किमी की दूरी पर पहला एटीएम एसबीआई का है। शुरुआत में हर तीसरे - चौथे दिन पैसा निकालने के लिए शहर तक भागना पड़ता था। घंटों लाइन में खड़ा रहना पड़ता था, परंतु अब स्थिति यह नहीं है। बैंक और एटीएम दोनों जगह से नकदी मिल रही है। पुराने बीज रखे होने की वजह से बुवाई में भी उन्हें ज्यादा परेशानी नहीं हुई।
पहले हुई परेशानी, अब हालात सामान्य
उन्नाव - बालाजी रोड स्थित केशवपुर गांव शहर से एकदम सटा हुआ है। अचानक हुए नोटबंदी के फैसले ने यहां ग्रामीणों को परेशानी में डाल दिया था, परंतु अब स्थिति सामान्य हो चली हैं। हालांकि, नोटबंदी की वजह से पैदा हुईं कुछ दिक्कतें अब भी ग्रामीणों को साल रही हैं।
किसान घनश्याम राजपूत ने बताया कि नोटबंदी की वजह से खाद - बीज की समस्या पैदा हो गई थी। उधार खाद मिल नहीं रही थी और नकदी हाथ में थी नहीं। उधार रुपये लेकर खाद - बीज खरीदना पड़ा था। इससे भारी समस्या पैदा हो गई थी। हालांकि, अब स्थिति सामान्य हो चली है। लोगों के हाथ में काम चलाने भर को नकदी पहुंच गई है।
किसान कमलेश ने बताया कि जरूरत के मुताबिक नकदी की व्यवस्था अब भी नहीं हो पाई है। बैंक से केवल दो हजार रुपये ही मिल रहे हैं। सबसे बड़ी दिक्कत मजदूरों के भुगतान की आ रही है। जैसे - तैसे काम चलाया जा रहा है। उम्मीद है कि जल्द ही स्थितियां सामान्य हो जाएंगी।
खेती पर भी है नोटबंदी का असर
नोटबंदी से पैदा हुई समस्या से बूढ़ा गांव के लोग अब तक पूरी तरह से उबर नहीं पाए हैं। खासतौर पर मजदूरों के भुगतान के लिए उन्हें नकदी की समस्या का सामना करना पड़ रहा है।
बूढ़ा गांव निवासी महेश कुमार प्रजापति ने बताया कि वह मजदूरी करता है। नोट बंदी होने से काम नहीं मिल रहा है। जिनके खेत हैं, वह भी हाथ पर हाथ रखे बैठे हैं। सीमेंट की दुकान करने वाले धर्मेंद्र श्रीवास ने बताया कि गांव के आसपास न कोई एटीएम हैं और न बैंक। बैंक से दो हजार रुपये निकालने के लिए आठ किमी दूर जाना पड़ता है। उनके खेत हैं, खेत पर काम करने के लिए मजदूर भी हैं, मगर उन्हें भुगतान करने को उनके पास मजदूरी नहीं।
भोजला गांव निवासी प्रदीप यादव ने बताया कि खेत गवाही दे रहे हैं कि नोटबंदी का गांवों पर क्या असर है। खेतों में फसल की बुबाई नहीं हो पाई है। उधारी पर बीज और खाद मिली नहीं। काली चरन ने बताया कि नोट बंदी के बाद से काम नहीं मिल रहा है। एक महीने में 15 दिन काम मिला है। ऐसी स्थिति में परिवार का पालन पोषण करने में दिक्कत आ रही है। परचून की दुकान करने वाले जय सिंह यादव ने बताया कि नोट बंदी की वजह से उनकी दुकान ठप हो गई थी, जो धीरे-धीरे रफ्तार पकड़ रही है। अब कितना समय रहेगा, कहा नहीं जा सकता है।