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Jhansi: अब नवजात शिशु पाउडर वाले दूध पर नहीं रहेंगे निर्भर, कुपोषण निदान केंद्र में आ सकती हैं माताएं
Wed, 10 Aug 2022 01:09 AM IST
झांसी ब्यूरो
अमर उजाला नेटवर्क, झांसी
अमर उजाला नेटवर्क, झांसी
Published by: झांसी ब्यूरो
Updated Wed, 10 Aug 2022 01:09 AM IST
सार
केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय और डब्ल्यूएचओ के अनुसार बच्चे को स्तनपान जन्म के एक घंटे के अंदर शुरू करा देना चाहिए। मगर कुछ माताएं शिशुओं को स्तनपान नहीं करा पाती हैं। इसमें कुछ तो ऐसी होती हैं, जिनका बच्चा गंभीर होने पर एसएनसीयू में भर्ती रहता है।
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सांकेतिक तस्वीर
- फोटो : Social Media
विस्तार
अब नवजात शिशु पाउडर वाले दूध पर निर्भर नहीं रहेंगे। दूध न बनने की वजह से कई माताएं शिशु को स्तनपान नहीं करा पाती हैं। ऐसी ही माताओं पर मेडिकल कॉलेज के बाल रोग विभाग ने सप्लीमेंट्री सकलिंग तकनीक का इस्तेमाल किया, जो कि 86 प्रतिशत सफल रहा। इस तकनीक के बाद माताओं में दूध बनाने वाले हार्मोन सक्रिय हो गए और वो अपने शिशु को स्तनपान कराने लगीं।
केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय और डब्ल्यूएचओ के अनुसार बच्चे को स्तनपान जन्म के एक घंटे के अंदर शुरू करा देना चाहिए। मगर कुछ माताएं शिशुओं को स्तनपान नहीं करा पाती हैं। इसमें कुछ तो ऐसी होती हैं, जिनका बच्चा गंभीर होने पर एसएनसीयू में भर्ती रहता है। तो कुछ माताओं का चिंता, तनाव आदि की वजह से दूध निकलना बंद हो जाता है। ऐसे में स्तनपान को बढ़ावा देने के लिए मेडिकल कॉलेज में स्टडी की गई। साल भर तक चली स्टडी में 59 माताओं को शामिल किया गया।
इन सभी के शिशु छह महीने से कम उम्र के थे और जो दूध नहीं पिला पा रही थीं। इन माताओं पर सप्लीमेंट्री सकलिंग टेक्निक (एसएसटी) का प्रयोग हुआ। बाल रोग विभागाध्यक्ष डॉ. ओमशंकर चौरसिया ने बताया कि इस तकनीक में एक ट्यूब का इस्तेमाल किया गया। उसका एक सिरा कटोरी में रखे दूध और दूसरा मां के आंचल पर लगाया जाता है। ट्यूब के जरिए कटोरी का दूध शिशु पीते रहे।
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उन्होंने बताया कि एक से दो सप्ताह तक ऐसा करने पर माताओं में दूध बनाने वाले हार्मोन सक्रिय हो गए। फिर माताएं बच्चे को स्तनपान कराने लगीं। एसएसटी का प्रयोग 51 महिलाओं पर सफल रहा। बाद में फॉलोअप में पता चला कि शिशुओं का वजन भी तेजी से बढ़ रहा है। शोध कार्य में विभागाध्यक्ष के अलावा डॉ. आराधना कनकने, डॉ. अनुज सेठी, डॉ. कंवलप्रीत, डॉ. सपना गुप्ता शामिल रहीं। अंतरराष्ट्रीय जनरल में शोधपत्र प्रकाशन को मंजूरी मिल गई है।
कुपोषण निदान केंद्र में आ सकती हैं माताएं
विभागाध्यक्ष ने बताया कि सप्लीमेंट्री सकलिंग टेक्निक में कोई खर्च नहीं आता है। सिर्फ माताओं को भर्ती रहना पड़ता है। मेडिकल कॉलेज के कुपोषण निदान केंद्र में आकर माताएं इस तकनीक के जरिए स्तनपान शुरू कराने का प्रयास कर सकती हैं।
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केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय और डब्ल्यूएचओ के अनुसार बच्चे को स्तनपान जन्म के एक घंटे के अंदर शुरू करा देना चाहिए। मगर कुछ माताएं शिशुओं को स्तनपान नहीं करा पाती हैं। इसमें कुछ तो ऐसी होती हैं, जिनका बच्चा गंभीर होने पर एसएनसीयू में भर्ती रहता है। तो कुछ माताओं का चिंता, तनाव आदि की वजह से दूध निकलना बंद हो जाता है। ऐसे में स्तनपान को बढ़ावा देने के लिए मेडिकल कॉलेज में स्टडी की गई। साल भर तक चली स्टडी में 59 माताओं को शामिल किया गया।
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इन सभी के शिशु छह महीने से कम उम्र के थे और जो दूध नहीं पिला पा रही थीं। इन माताओं पर सप्लीमेंट्री सकलिंग टेक्निक (एसएसटी) का प्रयोग हुआ। बाल रोग विभागाध्यक्ष डॉ. ओमशंकर चौरसिया ने बताया कि इस तकनीक में एक ट्यूब का इस्तेमाल किया गया। उसका एक सिरा कटोरी में रखे दूध और दूसरा मां के आंचल पर लगाया जाता है। ट्यूब के जरिए कटोरी का दूध शिशु पीते रहे।
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उन्होंने बताया कि एक से दो सप्ताह तक ऐसा करने पर माताओं में दूध बनाने वाले हार्मोन सक्रिय हो गए। फिर माताएं बच्चे को स्तनपान कराने लगीं। एसएसटी का प्रयोग 51 महिलाओं पर सफल रहा। बाद में फॉलोअप में पता चला कि शिशुओं का वजन भी तेजी से बढ़ रहा है। शोध कार्य में विभागाध्यक्ष के अलावा डॉ. आराधना कनकने, डॉ. अनुज सेठी, डॉ. कंवलप्रीत, डॉ. सपना गुप्ता शामिल रहीं। अंतरराष्ट्रीय जनरल में शोधपत्र प्रकाशन को मंजूरी मिल गई है।
कुपोषण निदान केंद्र में आ सकती हैं माताएं
विभागाध्यक्ष ने बताया कि सप्लीमेंट्री सकलिंग टेक्निक में कोई खर्च नहीं आता है। सिर्फ माताओं को भर्ती रहना पड़ता है। मेडिकल कॉलेज के कुपोषण निदान केंद्र में आकर माताएं इस तकनीक के जरिए स्तनपान शुरू कराने का प्रयास कर सकती हैं।