फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   Uttar Pradesh ›   Jhansi News ›   MO twinge of drought

फाग में सूखे की टीस

Tue, 22 Mar 2016 01:01 AM IST
अमर उजाला ब्यूरो
अमर उजाला ब्यूरो Updated Tue, 22 Mar 2016 01:01 AM IST
विज्ञापन
MO twinge of drought
jhansi hindi news - फोटो : demopic
विकास सनाड्य
विज्ञापन

झांसी। वसंत ऋतु के अंतिम पड़ाव पर पहुंचने के साथ ही बुंदेलखंड के गांव-गांव में फाग गूंजने लगती हैं। पूरे फाल्गुन मास में लोकगीतों के जरिए होली का उत्सव मनाया जाता है, लेकिन इस बार गाई जा रही फाग में उल्लास नहीं है, बल्कि इसमें सूखे से बदहाल खेत-खलिहान और किसानों का दर्द झलक रहा है।

‘गोम, चना, जुनई, बाजरा, खेत भरे अरहर सों, नीली-नीली अलसी फूली, पीली-पीली सरसों, चलो तुम उन गांवन की ओर- चलो तुम उन गांवन की ओर’, फाल्गुन में गाई जाने वाली फाग के यह बोल हैं, जिसमें फलती-फूलती खेती की झलक देखने को मिलती है, लेकिन लगातार कुदरत के कोप का शिकार बन रहे बुंदेलखंड में अब फागों में भी उमंग नहीं बची है। खेत-खलिहान सूने पड़े हैं और अन्नदाताओं के हाथ खाली हैं। फागों में भी प्रकृति की इस त्रासदी की झलक देखने को मिल रही है।
विज्ञापन


कलाकार इस दर्द को फागों में कुछ यूं बयां कर रहे हैं ‘जो जी रोज रंज में रह रओ, कोऊ कछु नहीं कह रओ, मारे-मारे इत उत फिर रये, कोऊ बांह नहीं गे रओ, बोल कुबोल सबई के सुन रहे, कोऊ संग नहीं दे रओ, ईसुर भये गली के पथरा, डलो ठोकरें सह रओ’। कलाकार इस तरह की फागों के माध्यम से वर्तमान हालात की तस्वीर पेश कर रहे हैं। साथ ही शासन-प्रशासन के किसानों की सहायता के बड़े-बड़े दावों पर तंज भी कस रहे हैं।
विज्ञापन
विज्ञापन


फाग गायक गौरीशंकर सिरवइयां के अनुसार फाल्गुन मास में खेत सरसों के पीले फूलों की चादर ओड़ लेते हैं। गेहूं की तैयार बालियों को देख-देखकर किसान फूले नहीं समाते हैं। ऐसे में फाग में स्वत: ही उमंग के रंग घुल जाते हैं, लेकिन इस बार यह बात कहां? अधिकांश खेतों में बुवाई तक नहीं हुई। जहां थोड़ी बहुत जमीन पर बुवाई हुई भी है, तो वहां भी फसल की स्थिति ठीक नहीं है। ऐसे में गले से उल्लास की जगह टीस निकल रही है। पं. सरजू शरण पाठक का कहना है कि फाल्गुन मास किसानों की महीनों की मेहनत का परिणाम लेकर आता है। इसी खुशी में ग्रामीण फागोत्सव मनाते हैं, लेकिन इस बार ऐसा कुछ भी नहीं है। न फसल है और न उत्सव है। ऐसे में फाग से फाल्गुन की मस्ती गायब है।


गौरतलब है कि पिछले रबी सीजन में जहां ओलावृष्टि/अतिवृष्टि ने किसानों की मेहनत पर पानी फेर दिया था। अकेले झांसी जिले में ही फसलों को 3.57 अरब रुपये का नुकसान हुआ था। इसके बाद खरीफ सूखे की भेंट चढ़ गया। जबकि, इस रबी सीजन पर भी सूखे की काली छाया है। स्थिति यह है कि पानी की कमी से जिले के 55 फीसदी खेतों में रबी की बुवाई तक नहीं हो पाई है। खेत-खलिहान सूने पड़े हुए हैं और किसानों के हाथ खाली हैं।
विज्ञापन
विज्ञापन

रहें हर खबर से अपडेट, डाउनलोड करें Android Hindi News App, iOS Hindi News App और Amarujala Hindi News APP अपने मोबाइल पे|
Get all India News in Hindi related to live update of politics, sports, entertainment, technology and education etc. Stay updated with us for all breaking news from India News and more news in Hindi.

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

AU ऐप में पढ़ें

Followed