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फेको मशीन के नाम पर तीन साल तक लंबी लंबी फेंकते रहे अफसर
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झांसी। सरकारी व्यवस्था का बुरा हाल देखना है तो जिला अस्पताल आइए। यहां पर 2019 से फेको मशीन ( मोतियाबिंद का आपरेशन करने वाली मशीन) नहीं सुधर पाई है। जबकि अफसर हर बार मशीन को लेकर बड़ी बड़ी बातें करते रहे। कभी लखनऊ से इंजीनियर बुलाने की बात कही गई तो कभी शासन स्तर से जल्द ही बजट जारी होने के दावे हुए। लेकिन मशीन आज भी नहीं सुधरी। बताया जाता है कि मशीन को सही कराने के लिए शासन स्तर से बजट जारी हो गया था लेकिन उसे किसी दूसरे मद में खर्च कर दिया गया।
जिला अस्पताल में रोजाना 60 से 70 मरीजों के मोतियाबिंद के ऑपरेशन होते हैं। मोतियाबिंद के ऑपरेशन दो तरह से होते हैं। एक फेको और दूसरा बिना फेको विधि के। फेको विधि से ऑपरेशन कराने पर 2.8 मिलीमीटर का ही छोटा चीरा लगता है। इसके अलावा फोल्डेबल लेंस डाला जाता है। ऐसे में जल्दी घाव भर जाता है और मरीज सामान्य जीवन जीने लगता है। जबकि, बिना फेको विधि से ऑपरेशन करने पर छह से साढ़े छह मिलीमीटर का चीरा लगता है। ऐसे में अधिकांश मरीज फेको विधि से ही ऑपरेशन कराते हैं।
एक लाख में सुधरनी है
बताया गया कि मशीन को सुधारने में एक लाख रुपये के आसपास खर्च आ सकता है। मगर बड़ी समस्या ये आएगी कि जब एक बार मशीन को सुधारने के लिए बजट भेजा जा चुका है तो फिर दोबारा कैसे मिलेगा?
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ये हैं मोतियाबिंद के लक्षण
- बढ़ती उम्र के साथ नजर कम होना।
- धुंधलापन बढ़ता जाना।
- चश्मे का नंबर जल्दी-जल्दी बदलना।
- दिन के समय कम दिखना, रात या अंधेरे में ज्यादा दिखना।
- एक ही वस्तु कई-कई दिखाई देना।
हाल ही में मुझे चार्ज मिला है। सोमवार को इस बारे में पता करूंगा कि आखिर क्यों इतने समय में फेको मशीन नहीं ठीक हो पाई है। - डॉ. आरके सचान, सीएमएस, जिला अस्पताल।
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जिला अस्पताल में रोजाना 60 से 70 मरीजों के मोतियाबिंद के ऑपरेशन होते हैं। मोतियाबिंद के ऑपरेशन दो तरह से होते हैं। एक फेको और दूसरा बिना फेको विधि के। फेको विधि से ऑपरेशन कराने पर 2.8 मिलीमीटर का ही छोटा चीरा लगता है। इसके अलावा फोल्डेबल लेंस डाला जाता है। ऐसे में जल्दी घाव भर जाता है और मरीज सामान्य जीवन जीने लगता है। जबकि, बिना फेको विधि से ऑपरेशन करने पर छह से साढ़े छह मिलीमीटर का चीरा लगता है। ऐसे में अधिकांश मरीज फेको विधि से ही ऑपरेशन कराते हैं।
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एक लाख में सुधरनी है
बताया गया कि मशीन को सुधारने में एक लाख रुपये के आसपास खर्च आ सकता है। मगर बड़ी समस्या ये आएगी कि जब एक बार मशीन को सुधारने के लिए बजट भेजा जा चुका है तो फिर दोबारा कैसे मिलेगा?
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ये हैं मोतियाबिंद के लक्षण
- बढ़ती उम्र के साथ नजर कम होना।
- धुंधलापन बढ़ता जाना।
- चश्मे का नंबर जल्दी-जल्दी बदलना।
- दिन के समय कम दिखना, रात या अंधेरे में ज्यादा दिखना।
- एक ही वस्तु कई-कई दिखाई देना।
हाल ही में मुझे चार्ज मिला है। सोमवार को इस बारे में पता करूंगा कि आखिर क्यों इतने समय में फेको मशीन नहीं ठीक हो पाई है। - डॉ. आरके सचान, सीएमएस, जिला अस्पताल।