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कोच मरम्मत कारखाने का आधे से ज्यादा काम निजी हाथों में

Thu, 19 Sep 2019 01:54 AM IST
Jhansi Bureau झांसी ब्यूरो
Updated Thu, 19 Sep 2019 01:54 AM IST
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koch marmmat karkhane ka aade se jyada kam niji hanto me
झांसी स्थित कोच मरम्मत कारखाना। - फोटो : REPORTERS
कोच मरम्मत कारखाने का आधे से ज्यादा काम निजी हाथों में
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झांसी। रेलवे अपनी मंशा के अनुरूप कोच मरम्मत कारखाने को धीरे- धीरे निजीकरण की तरफ ले जा रही है। इन दिनों कारखाने के आधे से ज्यादा काम आउट सोर्स (ठेकेदारी) के कर्मचारी ही कर रहे हैं। ऐसे में कोच पूर्ण गुणवत्ता के साथ निकल रहे हैं, इस पर सवाल खड़े हो रहे हैं। पता हो इस कारखाने के लिए 993 पदों पर कर्मचारियों की नियुक्ति होनी थी। मगर, यहां तीन सौ बीस कर्मचारी ही स्थायी तैनात हैं।
रेलवे वर्कशॉप के निकट महावीरन स्क्रैप यार्ड में बहुराष्ट्रीय कंपनी एलएनटी द्वारा 117 करोड़ की लागत से कोच मरम्मत कारखाने (सवारी डिब्बा) का निर्माण 31 अक्तूबर 2014 में किया गया था। इस कारखाने में 12 साले से ज्यादा पुराने कोचों को नया बनाने (मिड लाइफ रिहेबिलिटेशन) का काम होता है। रेलवे बोर्ड ने कारखाने को 250 कोच सालाना तैयार करने का लक्ष्य दिया है। कारखाने में लिफ्टिंग शॉप, स्ट्रिपिंग शॉप, बॉडी शॉप, पेंट शॉप, फर्निशिंग शॉप, कार पेंट्री शॉप, बोगी शॉप, एयर ब्रेक लैब, कंप्रेसर रूम, ट्रांसपोर्ट शॉप, ईटीएल शॉप, ट्रेवर्सर, कोच वाशिंग पिट, शेल कंपोनेंट शॉप, ग्रिट ब्लास्टिंग प्लांट, पेंट बूथ प्लांट व फाइनल शॉप स्थापित किए गए हैं। उक्त लक्ष्य के हिसाब से कारखाने में अलग-अलग कैडर के 993 कर्मचारियों की आवश्यकता है। मगर स्थायी स्टाफ 320 का ही है। बाकी स्टाफ की पूर्ति ठेकेदार के प्राइवेट कर्मचारियों से की जा रही है।
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इन दिनों स्ट्रिपिंग शॉप, बॉडी शॉप, पेंट शॉप, एयर ब्रेक शॉप समेत आधे से ज्यादा शॉप में प्राइवेट कर्मचारी काम कर रहे हैं। उनकी निगरानी के लिए जरूर रेलवे ने अपने सुपरवाइजर लगा रखे हैं। ईटीएल और लिफ्टिंग शॉप को निजी हाथों में देने की तैयारी चल रही है। इस कारण अभी 10 से 12 कोच ही महीने में पुराने से नए बन पा रहे हैं। लेकिन अब कारखाने को कोचों के पीओएच का भी काम सौंप दिया गया है।
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रेलवे बोर्ड की गाइड लाइन पर ही काम चल रहा है। दूसरे देशों में भी ऐसा ही हो रहा है। आउट सोर्स कर्मचारियों की निगरानी के लिए सुपरवाइजर लगाए गए हैं। अगर काम में कोई खामी पायी जाती है तो उसके लिए सुपरवाइजर जिम्मेदार होंगे। गुणवत्ता के साथ कोई समझौता नहीं किया जा रहा है।
अजीत कुमार सिंह, मुख्य जनसंपर्क अधिकारी।
पीओएच पर ज्यादा जोर
ट्रेनों में लगने वाले नए कोचों की 24 महीने और पुराने कोचों में 18 महीने में पीरियोडिक ओवर हालिंग (पीओएच) की जाती है। पीओएच में कोच के अंदर के पुराने पार्ट्स बदलने, तकनीकी खामियां दूर करने और टूट फूट के काम को दुरुस्त किया जाता है, ताकि कोच अपटूडेट बने रहें। एक कोच का पीओएच करने में कम से कम 15 दिन का वक्त लगता है। देश के अन्य वर्कशाप में जो कोच पीओएच के लिए जाते हैं, उन्हें खराब पार्ट को उसी स्तर पर सुधार कर तैयार कर दिया जाता है, जबकि झांसी कारखाने में तैयार होने वाले कोचों में बायो टॉयलेट लगाए जा रहे हैं।

जिम्मेदारी कम और मोटा वेतन का भी नहीं झंझट
रेलवे के लिए आउट सोर्स पर काम कराना फायदे का सौदा साबित हो रहा है। इसमें वक्त पर काम पूरा कराने की जिम्मेदारी ठेकेदार की होती है। मोटा वेतन भी नहीं देना पड़ रहा है। कर्मचारी की जिंदगी भर की जिम्मेदारी भी नहीं लेनी पड़ती है। कर्मचारी यूनियन से जुड़कर नेतागिरी न करने लगे, इसका भी डर नहीं रहता है।
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