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Jhansi News: ये कैसा इलाज, बीमारी ठीक करने के नाम पर बच्चों को दे रहे दाग
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झांसी। मासूम के शरीर पर बार-बार चुभतीं गर्म सलाखें। चीख सुनकर भी न परिजनों का दिल पिघलता है न ओझाओं पर कोई असर होता है। ये हालात हैं बुंदेलखंड के आदिवासी और पिछड़े इलाकों के। यहां आज भी निमोनिया जैसी बीमारी ठीक करने के नाम पर दगना प्रथा की चपेट में आकर न जाने कितने बच्चे आए दिन दर्द से कराहते और कांप उठते हैं। झांसी मेडिकल कॉलेज में ही ऐसे दस से ज्यादा मामले सामने आ चुके हैं।
असल में तीन दिन पहले मध्य प्रदेश के शहडोल में अंधविश्वास से जुड़ा रोंगटे खड़े कर देने वाला मामला सामने आया है। यहां तीन महीने की बच्ची को बीमारी ठीक करने के नाम पर गर्म सलाखों से 51 बार दागा गया। बच्ची की हालत नाजुक हो गई तो उसे शहडोल मेडिकल कॉलेज में भर्ती कराया गया। मगर ये कुप्रथा का कोई पहला मामला नहीं है। उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश के पिछड़े इलाकों खासकर बुंदेलखंड में कई दशकों से ये कुप्रथा प्रचलित है।
समाजशास्त्रियों का कहना है कि बच्चे का स्वभाव गुस्सैल होने या फिर बीमार होने पर परिजन अस्पताल ले जाने के बजाए ओझा आदि के पास लेकर तंत्र-मंत्र से इलाज कराते हैं। बीमार छोटे बच्चों को अमानवीय तरीके से गर्म सलाखों से दागा जाता है। इससे बच्चा दर्द से कराह उठता है और उसकी चीख निकल जाती है। इससे कई बच्चों की तबीयत और बिगड़ जाती है, तब परिजन अस्पताल लेकर पहुंचते हैं।
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वहीं, मेडिकल कॉलेज के बाल रोग विभाग के चिकित्सकों का कहना है कि पिछले दिनों में सलाखों से दागे गए दस से ज्यादा बच्चे भर्ती हो चुके हैं। किसी के पांच तो किसी के आठ निशान बने हुए थे। इसकी उम्र चार महीने से लेकर एक साल तक थी। ज्यादातर निमोनिया से पीड़ित थे। इनमें एक-दो बच्चों की स्थिति ज्यादा गंभीर होने पर वेंटिलेटर पर भर्ती करना पड़ा। हालांकि, सभी बच्चों की जान बचा ली गई।
ये हैं निमोनिया के लक्षण
- खांसी आना
- जुकाम होना
- सांस तेज चलना
- बच्चे का दूध न पीना
- सुस्त रहना
केस-1
पेट पर बने थे अर्द्ध चंद्रमा के सात निशान
आठ माह पहले मेडिकल कॉलेज में डबरा निवासी छह महीने का बच्चा भर्ती हुआ। उसके पेट पर गर्म सलाखों से दागे गए अर्द्ध चंद्रमा के सात निशान बने थे। वह निमोनिया पीड़ित था। करीब पांच दिन तक भर्ती रहने के बाद वह ठीक हुआ।
केस-2
चार दिन वेंटिलेटर पर रहा, तब बची जान
जालौन के एक गांव के बच्चे के शरीर पर गर्म सलाखों से दागे गए गोल-गोल पांच निशान थे। जब वह मेडिकल कॉलेज लाया गया तो ऑक्सीजन लेवल 75 फीसदी पहुंच गया। डॉक्टरों ने चार दिन वेंटिलेटर पर भर्ती रखा, तब जान बच सकी।
केस-3
टीकमगढ़ क्षेत्र के बड़ागांव धसान से एक दस साल के बालक को मेडिकल कॉलेज में लाया गया था। उसकी पीठ पर भी दस निशान थे। उसे पीठ पर दागा गया था। जब चिकित्सकों ने पूछा तो परिवार वालों ने बताया कि निमोनिया हो गया था और एक ओझा ने उसे दागा था। लेकिन निमोनिया ठीक नहीं हुआ।
वर्जन..
रोग प्रतिरोधक क्षमता कमजोर होने से बच्चे वायरल संक्रमण की चपेट में आ जाते हैं। बार-बार संक्रमण होने से कई बच्चों को निमोनिया हो जाता है। दगना कुप्रथा के शिकार बच्चे मेडिकल कॉलेज में भर्ती हो चुके हैं। एक-दो को वेंटिलेटर पर भर्ती करना पड़ा। सभी की जान बचा ली गई। गर्म सलाखों से दागने पर संक्रमण फैलने से बच्चे की जान भी जा सकती है। ऐसे में लोग इस अंधविश्वास में न पड़ें। - डॉ. ओमशंकर चौरसिया, बाल रोग विभागाध्यक्ष, मेडिकल कॉलेज।
यूपी व बुंदेलखंड के आदिवासी और पिछड़े इलाकों में दगना कुप्रथा ज्यादा प्रचलित है। महोबा में मेरा गांव है, वहां पर भी इस तरह की कुप्रथा है। जागरूकता बढ़ने से ये कम हुई है मगर समाप्त नहीं। लोगों में अंधविश्वास है कि ओझा आदि के पास बच्चे को ले जाकर गर्म सलाखें पेट में दगवाने से वह ठीक हो जाएगी। कुछ परिजन बच्चे के चिड़चिड़े या गुस्सैल स्वभाव में परिवर्तन कराने के लिए भी ऐसा करवाते हैं। - डॉ. सुरेंद्र नारायण, असिस्टेंट प्रोफेसर, समाजशास्त्र विभाग, बीकेडी।
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असल में तीन दिन पहले मध्य प्रदेश के शहडोल में अंधविश्वास से जुड़ा रोंगटे खड़े कर देने वाला मामला सामने आया है। यहां तीन महीने की बच्ची को बीमारी ठीक करने के नाम पर गर्म सलाखों से 51 बार दागा गया। बच्ची की हालत नाजुक हो गई तो उसे शहडोल मेडिकल कॉलेज में भर्ती कराया गया। मगर ये कुप्रथा का कोई पहला मामला नहीं है। उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश के पिछड़े इलाकों खासकर बुंदेलखंड में कई दशकों से ये कुप्रथा प्रचलित है।
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समाजशास्त्रियों का कहना है कि बच्चे का स्वभाव गुस्सैल होने या फिर बीमार होने पर परिजन अस्पताल ले जाने के बजाए ओझा आदि के पास लेकर तंत्र-मंत्र से इलाज कराते हैं। बीमार छोटे बच्चों को अमानवीय तरीके से गर्म सलाखों से दागा जाता है। इससे बच्चा दर्द से कराह उठता है और उसकी चीख निकल जाती है। इससे कई बच्चों की तबीयत और बिगड़ जाती है, तब परिजन अस्पताल लेकर पहुंचते हैं।
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वहीं, मेडिकल कॉलेज के बाल रोग विभाग के चिकित्सकों का कहना है कि पिछले दिनों में सलाखों से दागे गए दस से ज्यादा बच्चे भर्ती हो चुके हैं। किसी के पांच तो किसी के आठ निशान बने हुए थे। इसकी उम्र चार महीने से लेकर एक साल तक थी। ज्यादातर निमोनिया से पीड़ित थे। इनमें एक-दो बच्चों की स्थिति ज्यादा गंभीर होने पर वेंटिलेटर पर भर्ती करना पड़ा। हालांकि, सभी बच्चों की जान बचा ली गई।
ये हैं निमोनिया के लक्षण
- खांसी आना
- जुकाम होना
- सांस तेज चलना
- बच्चे का दूध न पीना
- सुस्त रहना
केस-1
पेट पर बने थे अर्द्ध चंद्रमा के सात निशान
आठ माह पहले मेडिकल कॉलेज में डबरा निवासी छह महीने का बच्चा भर्ती हुआ। उसके पेट पर गर्म सलाखों से दागे गए अर्द्ध चंद्रमा के सात निशान बने थे। वह निमोनिया पीड़ित था। करीब पांच दिन तक भर्ती रहने के बाद वह ठीक हुआ।
केस-2
चार दिन वेंटिलेटर पर रहा, तब बची जान
जालौन के एक गांव के बच्चे के शरीर पर गर्म सलाखों से दागे गए गोल-गोल पांच निशान थे। जब वह मेडिकल कॉलेज लाया गया तो ऑक्सीजन लेवल 75 फीसदी पहुंच गया। डॉक्टरों ने चार दिन वेंटिलेटर पर भर्ती रखा, तब जान बच सकी।
केस-3
टीकमगढ़ क्षेत्र के बड़ागांव धसान से एक दस साल के बालक को मेडिकल कॉलेज में लाया गया था। उसकी पीठ पर भी दस निशान थे। उसे पीठ पर दागा गया था। जब चिकित्सकों ने पूछा तो परिवार वालों ने बताया कि निमोनिया हो गया था और एक ओझा ने उसे दागा था। लेकिन निमोनिया ठीक नहीं हुआ।
वर्जन..
रोग प्रतिरोधक क्षमता कमजोर होने से बच्चे वायरल संक्रमण की चपेट में आ जाते हैं। बार-बार संक्रमण होने से कई बच्चों को निमोनिया हो जाता है। दगना कुप्रथा के शिकार बच्चे मेडिकल कॉलेज में भर्ती हो चुके हैं। एक-दो को वेंटिलेटर पर भर्ती करना पड़ा। सभी की जान बचा ली गई। गर्म सलाखों से दागने पर संक्रमण फैलने से बच्चे की जान भी जा सकती है। ऐसे में लोग इस अंधविश्वास में न पड़ें। - डॉ. ओमशंकर चौरसिया, बाल रोग विभागाध्यक्ष, मेडिकल कॉलेज।
यूपी व बुंदेलखंड के आदिवासी और पिछड़े इलाकों में दगना कुप्रथा ज्यादा प्रचलित है। महोबा में मेरा गांव है, वहां पर भी इस तरह की कुप्रथा है। जागरूकता बढ़ने से ये कम हुई है मगर समाप्त नहीं। लोगों में अंधविश्वास है कि ओझा आदि के पास बच्चे को ले जाकर गर्म सलाखें पेट में दगवाने से वह ठीक हो जाएगी। कुछ परिजन बच्चे के चिड़चिड़े या गुस्सैल स्वभाव में परिवर्तन कराने के लिए भी ऐसा करवाते हैं। - डॉ. सुरेंद्र नारायण, असिस्टेंट प्रोफेसर, समाजशास्त्र विभाग, बीकेडी।