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शमशान की आग नहीं हो रही ठंडी, जगह हुई कम

Thu, 22 Apr 2021 12:55 AM IST
Jhansi Bureau झांसी ब्यूरो
Updated Thu, 22 Apr 2021 12:55 AM IST
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in shamshyan ghat land is short.
झांसी। कोरोना काल में शमशानघाटों की आग ठंडी पड़ने का नाम नहीं ले रही है। हालात ये हैं कि शव जलाने के लिए अब जगह कम पड़ने लगी है। स्थिति का अंदाजा इससे लगाया जा सकता है कि उन्नाव गेट बाहर मुक्तिधाम में चिताओं की जली हुई राख ही इतनी इकट्ठी हो गई कि उसे जेसीबी से हटवाकर जगह बनानी पड़ी। अपने परिजनों के शवों को लेकर आने वालों को श्मशान घाट में जगह तलाशने की जद्दोजहद का सामना करना पड़ रहा है।
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बड़ागांव गेट बाहर मुक्तिधाम में बने शेड में एक साथ अधिकतम 14 चिताएं जलाने का इंतजाम है, हालांकि कभी इसकी नौबत नहीं आई। लेकिन अब कोरोना काल में यहां जगह कम पड़ने लगी है। सोमवार को यहां 23 शवों का अंतिम संस्कार हुआ था। मंगलवार को 22 और बुधवार को यहां 26 चिताएं जलीं। कमोबेश यही हालात श्याम चौपड़ा मुक्तिधाम के हैं। यहां भी लोगों को अंतिम संस्कार के लिए जगह की जुगाड़ बनानी पड़ रही है। इन दोनों ही मुक्तिधामों में कोरोना संक्रमितों के शवों को जलाया जा रहा है। उन्नाव गेट बाहर मुक्तिधाम का हाल भी बदहाल है। यहां बने शेड में एक साथ 11 शवों का अंतिम संस्कार किया जा सकता है। लेकिन, यहां भी जगह कम पड़ने लगी है। हालात ये हैं कि बुधवार को प्लेटफार्म पर 11 शव जल रहे थे, तो नीचे दस चिताएं धधक रहीं थीं। यहां पिछले एक सप्ताह के भीतर राख का अंबार खड़ा हो गया, जिसे पार्षद प्रदीप नगरिया ने नगर निगम की टीम के जरिये जेसीबी की मदद से साफ कराया।
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इलाज न मिलने से हो रहीं मौत
झांसी। स्वास्थ्य अमला कोरोना के मरीजों के इलाज में उलझा हुआ है। निजी अस्पतालों में कोरोना मरीजों का इलाज किया जा रहा है। सभी जगह हाउसफुल की स्थिति है। कोरोना मरीजों को न आसानी से पलंग मिल पा रहे हैं और न ही दवाएं। ऑक्सीजन का भी अकाल है। ऐसे में पहले से जो लोग गंभीर बीमारियों से ग्रसित हैं, उन्हें भी समुचित इलाज नहीं मिल पा रहा है। मरने वालों में ऐसे लोगों की संख्या भी खासी है।
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कफन की दुकानों पर भीड़
झांसी। अंतिम क्रिया का सामान बांस, कफन का कपड़ा व अन्य सामग्री बेचने वाली दुकानों पर भी सुबह से लेकर देर शाम तक भीड़ जमा रहती है। गंदीगर टपरा स्थित अर्थी के बांस की दुकान पर सुबह से लेकर देर शाम तक ग्राहकों का आवागमन बना रहता है, जबकि पहले शाम को बासों की बिक्री नहीं होती थी। इसी तरह पसरट की गली में कफन का कपड़ा और अंतिम क्रिया का अन्य सामान लेने वालों की भी खूब भीड़ जुट रही है।
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