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हाल जिला अस्पताल का: डाक्टर तो देख लेंगे लेकिन दवाएं बाहर से ही खरीदनी होगी
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झांसी। मेडिकल कॉलेज की तरह ही जिला अस्पताल का हाल भी बदहाल है। यहां भी इलाज कराना मरीजों के लिए मुसीबत से कम नहीं है। पहले तो इलाज कराने के लिए लंबा इंतजार करना पड़ता है। डॉक्टर को दिखा भी लें तो दवाएं बाहर से लानी पड़ती है। सुबह से आने वाले मरीज देर शाम तक इलाज के लिए अस्पताल में भटकते रहते हैं। हालात यह हैं कि मरीजों को दवाओं की कमी सबसे ज्यादा खलती है। मुफ्त इलाज की आस में पहुंचने वाले मरीजों को बाजार से दवा खरीदनी पड़ रही है। प्रदेश सरकार 16 जिलों में पीपीपी मॉडल पर मेडिकल कॉलेज खोलने जा रही है, लेकिन मौजूदा समय में संचालित हो रहे अस्पतालों की स्थिति ठीक नहीं है। अमर उजाला टीम ने शुक्रवार को जिला अस्पताल पहुंचकर मरीजों से बात की, तो उन्होंने अपनी परेशानी साझा की।
मुफ्त इलाज कराने आए थे, मगर दवा पर खर्च हो गया
पैर में फ्रैक्चर होने पर रक्सा से इलाज कराने आए लक्ष्मीनारायण को अस्पताल में परेशान होना पड़ा। रक्सा से जिला अस्पताल तक कई निजी अस्पताल छोड़ दिए कि मुफ्त इलाज मिल जाएगा, लेकिन यहां तो उनकी जेब पर अधिक बोझ डाल दिया। फ्रैक्चर तो मुफ्त में जुड़ गया, लेकिन उसके बाद करीब नौ सौ रुपये की दवा उन्हें बाजार से खरीदनी पड़ी। हड्डी रोग विशेषज्ञ के यहां सुबह पहुंच गए थे, लेकिन प्लास्टर होते-होते दोपहर हो गई। उन्होंने कहा कि मुफ्त इलाज भारी पड़ गया।
बच्चे को लेकर दोपहर तक भटकते रहे
लकारा गांव के रमाकांत अपने 10 साल के बेटे के हाथ की हड्डी जुड़वाने पहुंचे थे। पहले तो दोनों की कोरोना जांच हुई। इसकी रिपोर्ट आने के बाद पर्चा बनवाने पहुंचे, तो लंबी लाइन लगी हुई थी। करीब पौन घंटे बाद पर्चा बना, तो हड्डी रोग विभाग में भी प्लास्टर कराने के लिए इंतजार करना पड़ा। विभाग तक पहुंचने के लिए ही काफी देर तक भटकते रहे। अस्पताल से आधी दवा मिल गई और आधी दवा बाहर से लेनी पड़ी। जितना खर्च इलाज में नहीं हुआ, उससे ज्यादा दवा में हो गया।
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आधार कार्ड नहीं लाना बना मुसीबत
मऊरानीपुर की नीमा को आंखें दिखानी थीं। जैसे-तैसे पर्चा बनवाकर डॉक्टर के पास पहुंची, तो वहां आधार कार्ड मांग लिया गया। वे आधार कार्ड लाई नहीं थीं, तो वापस कर दिया गया। परेशान होकर यहां-वहां भटकती रहीं। उन्होंने बताया कि 70 किमी दूर से आई हूं। सुबह सात बजे घर से निकल आई थी। अब आधार कार्ड मांग रहे हैं। इससे बढ़िया कहीं प्राइवेट में चली जाती। उन्होंने घर पर संपर्क करके एक मरीज के व्हाट्सएप पर आधार कार्ड मंगवाया, तब इलाज मिल सका।
बहुत इंतजार करना पड़ता है
सदर बाजार तोपखाना निवासी जितेंद्र को फिजीशियन को दिखाना था। कोविड जांच से पर्चा बनवाने में ही उनको एक घंटा लग गया। उन्होंने कहा कि यहां हर काम में इंतजार करना पड़ रहा है। डॉक्टर के केबिन के बाहर लंबी लाइन है। अस्पताल प्रशासन को भीड़ को देखते हुए चिकित्सकों की व्यवस्था करनी चाहिए। भीड़ में कोविड नियमों का भी पालन नहीं किया जा रहा है।
इलाज कराए बिना लौट गईं
रानीपुर से आंखों का इलाज कराने आईं रानी देवी को बिना इलाज कराए लौटना पड़ा। उनके पास भी आधार कार्ड नहीं था। काफी देर तक परेशान रहीं। जब कोई इंतजाम नहीं दिखा तो मायूस होकर चली गईं। उन्होंने कहा कि 80 किमी दूर से इलाज के लिए आई थी। यहां आधार कार्ड मांगा गया है। उसके बिना इलाज नहीं कर रहे हैं। वापस जा रही हूं। कुछ दिन बाद फिर आऊंगीं।
जिला अस्पताल में पर्याप्त दवाएं हैं। बाहर की दवाएं नहीं लिखी जानी चाहिए। मैं लखनऊ से लौट रहा हूं। झांसी पहुंचकर मामले की जांच कराई जाएगी। जहां तक मरीजों के इंतजार करने का सवाल है, तो भीड़ अधिक होने से कई बार मरीजों को दिक्कत होती है। इस व्यवस्था में भी सुधार करने की कोशिश कर रहे हैं।
डॉ. केके गुप्ता, सीएमएस, जिला अस्पताल
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मुफ्त इलाज कराने आए थे, मगर दवा पर खर्च हो गया
पैर में फ्रैक्चर होने पर रक्सा से इलाज कराने आए लक्ष्मीनारायण को अस्पताल में परेशान होना पड़ा। रक्सा से जिला अस्पताल तक कई निजी अस्पताल छोड़ दिए कि मुफ्त इलाज मिल जाएगा, लेकिन यहां तो उनकी जेब पर अधिक बोझ डाल दिया। फ्रैक्चर तो मुफ्त में जुड़ गया, लेकिन उसके बाद करीब नौ सौ रुपये की दवा उन्हें बाजार से खरीदनी पड़ी। हड्डी रोग विशेषज्ञ के यहां सुबह पहुंच गए थे, लेकिन प्लास्टर होते-होते दोपहर हो गई। उन्होंने कहा कि मुफ्त इलाज भारी पड़ गया।
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बच्चे को लेकर दोपहर तक भटकते रहे
लकारा गांव के रमाकांत अपने 10 साल के बेटे के हाथ की हड्डी जुड़वाने पहुंचे थे। पहले तो दोनों की कोरोना जांच हुई। इसकी रिपोर्ट आने के बाद पर्चा बनवाने पहुंचे, तो लंबी लाइन लगी हुई थी। करीब पौन घंटे बाद पर्चा बना, तो हड्डी रोग विभाग में भी प्लास्टर कराने के लिए इंतजार करना पड़ा। विभाग तक पहुंचने के लिए ही काफी देर तक भटकते रहे। अस्पताल से आधी दवा मिल गई और आधी दवा बाहर से लेनी पड़ी। जितना खर्च इलाज में नहीं हुआ, उससे ज्यादा दवा में हो गया।
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आधार कार्ड नहीं लाना बना मुसीबत
मऊरानीपुर की नीमा को आंखें दिखानी थीं। जैसे-तैसे पर्चा बनवाकर डॉक्टर के पास पहुंची, तो वहां आधार कार्ड मांग लिया गया। वे आधार कार्ड लाई नहीं थीं, तो वापस कर दिया गया। परेशान होकर यहां-वहां भटकती रहीं। उन्होंने बताया कि 70 किमी दूर से आई हूं। सुबह सात बजे घर से निकल आई थी। अब आधार कार्ड मांग रहे हैं। इससे बढ़िया कहीं प्राइवेट में चली जाती। उन्होंने घर पर संपर्क करके एक मरीज के व्हाट्सएप पर आधार कार्ड मंगवाया, तब इलाज मिल सका।
बहुत इंतजार करना पड़ता है
सदर बाजार तोपखाना निवासी जितेंद्र को फिजीशियन को दिखाना था। कोविड जांच से पर्चा बनवाने में ही उनको एक घंटा लग गया। उन्होंने कहा कि यहां हर काम में इंतजार करना पड़ रहा है। डॉक्टर के केबिन के बाहर लंबी लाइन है। अस्पताल प्रशासन को भीड़ को देखते हुए चिकित्सकों की व्यवस्था करनी चाहिए। भीड़ में कोविड नियमों का भी पालन नहीं किया जा रहा है।
इलाज कराए बिना लौट गईं
रानीपुर से आंखों का इलाज कराने आईं रानी देवी को बिना इलाज कराए लौटना पड़ा। उनके पास भी आधार कार्ड नहीं था। काफी देर तक परेशान रहीं। जब कोई इंतजाम नहीं दिखा तो मायूस होकर चली गईं। उन्होंने कहा कि 80 किमी दूर से इलाज के लिए आई थी। यहां आधार कार्ड मांगा गया है। उसके बिना इलाज नहीं कर रहे हैं। वापस जा रही हूं। कुछ दिन बाद फिर आऊंगीं।
जिला अस्पताल में पर्याप्त दवाएं हैं। बाहर की दवाएं नहीं लिखी जानी चाहिए। मैं लखनऊ से लौट रहा हूं। झांसी पहुंचकर मामले की जांच कराई जाएगी। जहां तक मरीजों के इंतजार करने का सवाल है, तो भीड़ अधिक होने से कई बार मरीजों को दिक्कत होती है। इस व्यवस्था में भी सुधार करने की कोशिश कर रहे हैं।
डॉ. केके गुप्ता, सीएमएस, जिला अस्पताल