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Jhansi News: जलविहार में सबसे आगे विराजमान रहते हैं गूदर बादशाह
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संवाद न्यूज एजेंसी
मऊरानीपुर। बुंदेलखंड के प्रसिद्ध जलविहार महोत्सव में द्वादशी के दिन श्री गूदर बादशाह भगवान का देव विमान सबसे आगे निकलता है। पुरानी बैलाई स्थित यह अति प्राचीन सिद्ध पीठ करीब 303 वर्ष पुराना है। इसकी महिमा और परंपरा अलौकिक है।
लगभग 103 वर्ष पूर्व गायों के एकत्र होने से यह स्थान ''गौधरा'' कहलाया, जो बाद में ''गूदर'' हो गया। मंदिर में श्री राम-जानकी जी का दिव्य दरबार है, जहां श्रीराम को ''बादशाह'' कहा जाता है। इससे यह स्थल ''गूदर बादशाह'' नाम से विख्यात हुआ। संवत 1699 में मुगल शासक औरंगजेब ने मंदिर तोड़ने का आदेश दिया। तत्कालीन महंत ने मूर्तियों को गुप्त तहखाने ''डारिया'' में सुरक्षित रखा। बाद में चित्रकूट के संत लाल बाबा को स्वप्न में दर्शन हुए। उन्होंने नगरवासियों के सहयोग से मंदिर का जीर्णोद्धार कराकर प्रभु को पुन: प्रतिष्ठित कराया।
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परंपरा का निर्वहन
ब्रिटिश हुकूमत के दौरान हैजा फैलने पर अंग्रेज प्रशासन ने देव विमानों पर प्रतिबंध लगाया। महंत केशवदास ने आदेश ठुकराकर श्री गूदर बादशाह का विमान सबसे पहले निकाला। उन्हें जेल हुई, पर भगवान ने थानेदार को स्वप्न में चेताया। इससे पुलिस ने महंत को ससम्मान रिहा किया। इसी साहस के कारण आज भी जलविहार मेले में श्री गूदर बादशाह को सबसे आगे विमान निकालने का प्रथम अधिकार प्राप्त है। कोविड महामारी के दो वर्षों में भी धार्मिक नियमों का पालन करते हुए भगवान का विहार कराया गया। समाजसेवी लक्ष्मीनारायण खरे उर्फ बब्बू खरे वर्तमान में इस प्राचीन पीठ की व्यवस्था देख रहे हैं। हर वर्ष हजारों श्रद्धालु प्रभु के दर्शन को उमड़ते हैं।
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मऊरानीपुर। बुंदेलखंड के प्रसिद्ध जलविहार महोत्सव में द्वादशी के दिन श्री गूदर बादशाह भगवान का देव विमान सबसे आगे निकलता है। पुरानी बैलाई स्थित यह अति प्राचीन सिद्ध पीठ करीब 303 वर्ष पुराना है। इसकी महिमा और परंपरा अलौकिक है।
लगभग 103 वर्ष पूर्व गायों के एकत्र होने से यह स्थान ''गौधरा'' कहलाया, जो बाद में ''गूदर'' हो गया। मंदिर में श्री राम-जानकी जी का दिव्य दरबार है, जहां श्रीराम को ''बादशाह'' कहा जाता है। इससे यह स्थल ''गूदर बादशाह'' नाम से विख्यात हुआ। संवत 1699 में मुगल शासक औरंगजेब ने मंदिर तोड़ने का आदेश दिया। तत्कालीन महंत ने मूर्तियों को गुप्त तहखाने ''डारिया'' में सुरक्षित रखा। बाद में चित्रकूट के संत लाल बाबा को स्वप्न में दर्शन हुए। उन्होंने नगरवासियों के सहयोग से मंदिर का जीर्णोद्धार कराकर प्रभु को पुन: प्रतिष्ठित कराया।
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परंपरा का निर्वहन
ब्रिटिश हुकूमत के दौरान हैजा फैलने पर अंग्रेज प्रशासन ने देव विमानों पर प्रतिबंध लगाया। महंत केशवदास ने आदेश ठुकराकर श्री गूदर बादशाह का विमान सबसे पहले निकाला। उन्हें जेल हुई, पर भगवान ने थानेदार को स्वप्न में चेताया। इससे पुलिस ने महंत को ससम्मान रिहा किया। इसी साहस के कारण आज भी जलविहार मेले में श्री गूदर बादशाह को सबसे आगे विमान निकालने का प्रथम अधिकार प्राप्त है। कोविड महामारी के दो वर्षों में भी धार्मिक नियमों का पालन करते हुए भगवान का विहार कराया गया। समाजसेवी लक्ष्मीनारायण खरे उर्फ बब्बू खरे वर्तमान में इस प्राचीन पीठ की व्यवस्था देख रहे हैं। हर वर्ष हजारों श्रद्धालु प्रभु के दर्शन को उमड़ते हैं।
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