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गर्मियों में भी पशुओं को मिलेगा हरा चारा
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अजोला की खबर में...... झांसी के किसान सुदर्शन सिंह ने अजोला चारा उगाया।
झांसी। गर्मियों में भी पशुओं को अब हरा चारा मिल सकेगा। झांसी के भारतीय चरागाह और चारा अनुसंधान में वैज्ञानिकों ने कम पानी वाले क्षेत्रों के पशुओं को पोषित करने के लिए अजोला चारे का उत्पादन किया है। कम जगह में गड्ढे के अंदर पानी में काई की तरह तैरने वाला चारा पशुओं को पोषण भी दे रहा है। साथ ही, कम लागत होने से किसानों को भी खासा फायदा मिला है। चारे को पश्चिम बंगाल के साथ प्रदेश के अलीगढ़ और मेरठ समेत तमाम जिलों के किसानों ने अपनाया है।
देश के तमाम स्थानों पर सिंचाई की कमी और भूमि के अभाव के चलते किसान पशुओं को हरा चारा नहीं दे पाते हैं। खासकर गर्मियों के मौसम में पशुओं को हरे चारे की उपलब्धता कराने के लिए चरागाह और चारा अनुसंधान संस्थान के वैज्ञानिकों ने प्रयोग किया। इसके तहत वैज्ञानिकों ने गड्ढे में पानी डालकर अजोला को विक सित किया। संस्थान के प्रधान वैज्ञानिक डॉ. अनूप कुमार दीक्षित ने बताया कि अजोला को वानस्पतिक रूप से छायादार जगह पर गढ्डे में पानी भरकर उगाया गया। गड्ढे में सिल्पोलिन नामक परत बिछाई गई। गड्ढे में तीन किलो भुरभुरी मिट्टी, एक किलो कच्चा गोबर, सात ग्राम सिंगल सुपर फॉस्फेट, 250 ग्राम अजोला कल्चर प्रति वर्ग मीटर मिलाकर 15 से 20 सेंटीमीटर पानी भरा गया।
वैज्ञानिकों ने पाया कि अजोला को गड्ढ़े में लगाने के तीन दिन बाद इसकी मात्रा दोगुनी हो गई और करीब 15 दिन बाद 150 से 200 ग्राम हरा चारा मिलने लगा। पशुओं पर इसका प्रयोग किया गया तो सामने आया कि पशुओं में प्रोटीन, अमीनो एसिड्स, विटामिन, पोटेशियम, कैल्शियम, फ ॉस्फ ोरस, आयरन, बीटा कैरोटीन की मात्रा बढ़ी। संस्थान ने नई तकनीकी का प्रचार किया, तो पश्चिम बंगाल समेत तमाम प्रदेशों के किसान इसे अपनाने लगे। हाल ही में संस्थान को अलीगढ़ और मेरठ से किसानों के ऑर्डर मिले हैं।
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झांसी के किसान का कम हुआ खर्च
संस्थान के समन्वित कृषि प्रणाली परियोजना में शोध कर रहे वैज्ञानिक डॉ. गौरेंद्र गुप्ता ने बताया कि अजोला के खेती को जिले के किसान सुदर्शन सिंह ने अपनाया। इसके बाद उनका पशुपालन पर होने वाला खर्च कम हुआ। सुदर्शन सिंह ने बड़े पैमाने पर इसकी खेती की और प्रतिदिन 25-30 किलोग्राम अजोला चारे के निकासी होने लगी। मुर्गीपालक भी इसका खूब प्रयोग कर रहे हैं।
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ऐसे उगाएं अजोला चारा
संस्थान के निदेशक डॉ. विजय कुमार यादव बताते हैं कि चारे को कम जगह और गडढे में उगाया जाता है। इसे 20-35 डिग्री सेल्सियस तापमान में लगाना चाहिए। अजोला के गड्ढ़े को छायादार जगह पर बनाना चाहिए या गड्ढ़े के ऊपर हरी जाली को लगाना चाहिए। साथ ही प्रतिमाह 20 से 30 प्रतिशत पानी को निकालकर बदल देना चाहिए। पशुपालक इसे पक्के गड्ढे में भी उगा सकते हैं। देश के तमाम किसानों ने इस तकनीक को अपनाकर अपनी किस्मत संवारी है।
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देश के तमाम स्थानों पर सिंचाई की कमी और भूमि के अभाव के चलते किसान पशुओं को हरा चारा नहीं दे पाते हैं। खासकर गर्मियों के मौसम में पशुओं को हरे चारे की उपलब्धता कराने के लिए चरागाह और चारा अनुसंधान संस्थान के वैज्ञानिकों ने प्रयोग किया। इसके तहत वैज्ञानिकों ने गड्ढे में पानी डालकर अजोला को विक सित किया। संस्थान के प्रधान वैज्ञानिक डॉ. अनूप कुमार दीक्षित ने बताया कि अजोला को वानस्पतिक रूप से छायादार जगह पर गढ्डे में पानी भरकर उगाया गया। गड्ढे में सिल्पोलिन नामक परत बिछाई गई। गड्ढे में तीन किलो भुरभुरी मिट्टी, एक किलो कच्चा गोबर, सात ग्राम सिंगल सुपर फॉस्फेट, 250 ग्राम अजोला कल्चर प्रति वर्ग मीटर मिलाकर 15 से 20 सेंटीमीटर पानी भरा गया।
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वैज्ञानिकों ने पाया कि अजोला को गड्ढ़े में लगाने के तीन दिन बाद इसकी मात्रा दोगुनी हो गई और करीब 15 दिन बाद 150 से 200 ग्राम हरा चारा मिलने लगा। पशुओं पर इसका प्रयोग किया गया तो सामने आया कि पशुओं में प्रोटीन, अमीनो एसिड्स, विटामिन, पोटेशियम, कैल्शियम, फ ॉस्फ ोरस, आयरन, बीटा कैरोटीन की मात्रा बढ़ी। संस्थान ने नई तकनीकी का प्रचार किया, तो पश्चिम बंगाल समेत तमाम प्रदेशों के किसान इसे अपनाने लगे। हाल ही में संस्थान को अलीगढ़ और मेरठ से किसानों के ऑर्डर मिले हैं।
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झांसी के किसान का कम हुआ खर्च
संस्थान के समन्वित कृषि प्रणाली परियोजना में शोध कर रहे वैज्ञानिक डॉ. गौरेंद्र गुप्ता ने बताया कि अजोला के खेती को जिले के किसान सुदर्शन सिंह ने अपनाया। इसके बाद उनका पशुपालन पर होने वाला खर्च कम हुआ। सुदर्शन सिंह ने बड़े पैमाने पर इसकी खेती की और प्रतिदिन 25-30 किलोग्राम अजोला चारे के निकासी होने लगी। मुर्गीपालक भी इसका खूब प्रयोग कर रहे हैं।
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ऐसे उगाएं अजोला चारा
संस्थान के निदेशक डॉ. विजय कुमार यादव बताते हैं कि चारे को कम जगह और गडढे में उगाया जाता है। इसे 20-35 डिग्री सेल्सियस तापमान में लगाना चाहिए। अजोला के गड्ढ़े को छायादार जगह पर बनाना चाहिए या गड्ढ़े के ऊपर हरी जाली को लगाना चाहिए। साथ ही प्रतिमाह 20 से 30 प्रतिशत पानी को निकालकर बदल देना चाहिए। पशुपालक इसे पक्के गड्ढे में भी उगा सकते हैं। देश के तमाम किसानों ने इस तकनीक को अपनाकर अपनी किस्मत संवारी है।