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कम पानी और कम जमीन पर उगाएं हरा चारा
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झांसी। बुंदेलखंड में पानी की कमी को देखते हुए भारतीय चरागाह एवं चारा अनुसंधान संस्थान (ग्रासलैंड) ने हरा चारा उत्पादन करने की नई तकनीकी वाष्पीकृत शीतल हाइड्रोपोनिक पद्धति विकसित की हैै। चारा उगाने के लिए बांस की सहायता से सात परतों वाली रैक का निर्माण करके नोजल की सहायता लेकर फव्वारा पद्धति से बार-बार उसी पानी का उपयोग कर सकते हैं। इस पर 50 हजार रुपये का खर्च आता है।
मुख्य अन्वेषक प्रधान वैज्ञानिक डा. संजय कुमार सिंह ने बताया कि हाइड्रोपोनिक पद्धति से मक्का, ज्वार, बाजरा से चारे का उत्पादन कर सकते हैं। उदाहरण के लिए मक्के के बीज को साफ - सुथरा करके 1.5 प्रतिशत सोडियम हाइपोक्लोराइड के घोल में आधा घंटा भिगोकर उपचारित करते हैं। इसके बाद बीज को 12 से 16 घंटे के लिए पानी में भिगो देते हैं, फिर बीज को छानकर जूट की बोरी में गट्ठर बनाकर 24 घंटे के लिए छाया में रख देते हैं। इससे बीज अंकुरित हो जाते हैं। बाद में इसे हाइड्रोपोनिक रैक में रख देते हैं। सिंचाई के लिए दिन में चार बार चार- चार घंटे के अंतराल पर एक-एक मिनट के लिए फव्वारा चलाते हैं। सात से आठ दिन में हरा चारा प्राप्त हो जाता है। यह चारा प्रोटीनयुक्त तथा पशुओं के लिए पाचक होता है। इससे पशुओं के दूध में बढ़ोतरी होती है। इस तकनीक में पानी की खपत बहुत कम हो जाती है और दो लीटर पानी में प्रति किलोग्राम चारा उत्पादन होता है, जबकि खुले खेत में एक किलोग्राम चारा उत्पादन के लिए 50 से 60 लीटर पानी की जरूरत होती है।
उन्होंने कहा कि किसान ग्रासलैंड का भ्रमण करके पूरी जानकारी प्राप्त कर सकते हैं और कुशल मिस्त्री की सहायता से अपने घर के पास और पशु बाड़े के पास हाइड्रोपोनिक संरचना का निर्माण करा सकते हैं।
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मुख्य अन्वेषक प्रधान वैज्ञानिक डा. संजय कुमार सिंह ने बताया कि हाइड्रोपोनिक पद्धति से मक्का, ज्वार, बाजरा से चारे का उत्पादन कर सकते हैं। उदाहरण के लिए मक्के के बीज को साफ - सुथरा करके 1.5 प्रतिशत सोडियम हाइपोक्लोराइड के घोल में आधा घंटा भिगोकर उपचारित करते हैं। इसके बाद बीज को 12 से 16 घंटे के लिए पानी में भिगो देते हैं, फिर बीज को छानकर जूट की बोरी में गट्ठर बनाकर 24 घंटे के लिए छाया में रख देते हैं। इससे बीज अंकुरित हो जाते हैं। बाद में इसे हाइड्रोपोनिक रैक में रख देते हैं। सिंचाई के लिए दिन में चार बार चार- चार घंटे के अंतराल पर एक-एक मिनट के लिए फव्वारा चलाते हैं। सात से आठ दिन में हरा चारा प्राप्त हो जाता है। यह चारा प्रोटीनयुक्त तथा पशुओं के लिए पाचक होता है। इससे पशुओं के दूध में बढ़ोतरी होती है। इस तकनीक में पानी की खपत बहुत कम हो जाती है और दो लीटर पानी में प्रति किलोग्राम चारा उत्पादन होता है, जबकि खुले खेत में एक किलोग्राम चारा उत्पादन के लिए 50 से 60 लीटर पानी की जरूरत होती है।
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उन्होंने कहा कि किसान ग्रासलैंड का भ्रमण करके पूरी जानकारी प्राप्त कर सकते हैं और कुशल मिस्त्री की सहायता से अपने घर के पास और पशु बाड़े के पास हाइड्रोपोनिक संरचना का निर्माण करा सकते हैं।
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