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बुंदेलखंड में है गणेश आराधना की प्राचीन परंपरा
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शिव-पार्वती के साथ कैलाश पर्वत पर गणेश।
- फोटो : REPORTERS
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झांसी। बुंदेलखंड में गौरी पुत्र गणेश की उपासना की परंपरा एक हजार वर्ष से भी अधिक पुरानी है। अति प्राचीन मूर्तियों में भगवान गणेश के विविध रूप देखते हैं। नृत्य करते गणेश, लेखन करते गणेश, कैलाश पर्वत पर भाई कार्तिकेय के साथ खेलते बाल गणेश प्रमुख है। खास बात यह है कि अधिकांश मूर्तियों में उनका प्रिय मूषक कहीं नजर नहीं आता है।
सनातन धर्म में भगवान गणेश की आराधना को हमेशा से ही प्रधानता मिली हुई है। बुंदेलखंड के ललितपुर, बांदा, कालिंजर व झांसी के ग्रामीण इलाकों सहित अन्य स्थानों पर पुरातत्व विभाग को अपनी खोजों में गणेश की अनूठी मूर्तियां प्राप्त हुई हैं। प्रभारी क्षेत्रीय पुरातत्व अधिकारी डॉ. एसके दुबे ने बताया कि मूर्तियों में कई एकल तथा युगल भी है। युगल में उनके साथ रिद्धि सिद्धि नहीं बल्कि विनायकी है। विनायकी का उल्लेख पौराणिक ग्रंथों तथा शिल्प शास्त्र के ग्रंथों में शक्ति के रूप में वर्णित है। प्रतिहार काल, चंदेल युग सहित कई अन्य राजवंशों के समय में बनी मूर्तियां जिनकी संख्या सौ से अधिक है, वो प्राप्त हुई है।
भगवान गणेश की कई अद्भुत प्रतिमाओं में नृत्य गणेश मूर्तियां है। इन मूर्तियों में यझ, देव, अप्सरा वाद्य यंत्रों को बजा रहे हैं। जबकि भगवान गणेश मंत्रमुग्ध होकर नृत्य कर रहे हैं। राजकीय संग्रहालय में नृत्य गणेश की लगभग 4 से 5 मूर्तियां हैं। इनमें से एक मूर्ति 90 के दशक में पेरिस में आयोजित महोत्सव में भी गई थी। संग्रहालय उपनिदेशक आशा पांडे के अनुसार कई विभिन्न रूपों में भगवान गणेश की प्रतिमा संग्रहालय में है।
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सप्त मातृका देवियों के साथ हैं गजानन
बुंदेलखंड में गौरी पुत्र गणेश सप्तमातृका देवियों के साथ भी है। यह देवियां तंत्र शास्त्र से संबंधित हैं। पुरातत्व विभाग के अनुसार कई प्राचीन मंदिर जो ध्वंस हो चुके हैं। उनकी पहचान कि वह किस देवता का मंदिर है। वहां प्राप्त होने वाली गणेश मूर्तियां से ही लगाया जाता है।
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सनातन धर्म में भगवान गणेश की आराधना को हमेशा से ही प्रधानता मिली हुई है। बुंदेलखंड के ललितपुर, बांदा, कालिंजर व झांसी के ग्रामीण इलाकों सहित अन्य स्थानों पर पुरातत्व विभाग को अपनी खोजों में गणेश की अनूठी मूर्तियां प्राप्त हुई हैं। प्रभारी क्षेत्रीय पुरातत्व अधिकारी डॉ. एसके दुबे ने बताया कि मूर्तियों में कई एकल तथा युगल भी है। युगल में उनके साथ रिद्धि सिद्धि नहीं बल्कि विनायकी है। विनायकी का उल्लेख पौराणिक ग्रंथों तथा शिल्प शास्त्र के ग्रंथों में शक्ति के रूप में वर्णित है। प्रतिहार काल, चंदेल युग सहित कई अन्य राजवंशों के समय में बनी मूर्तियां जिनकी संख्या सौ से अधिक है, वो प्राप्त हुई है।
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भगवान गणेश की कई अद्भुत प्रतिमाओं में नृत्य गणेश मूर्तियां है। इन मूर्तियों में यझ, देव, अप्सरा वाद्य यंत्रों को बजा रहे हैं। जबकि भगवान गणेश मंत्रमुग्ध होकर नृत्य कर रहे हैं। राजकीय संग्रहालय में नृत्य गणेश की लगभग 4 से 5 मूर्तियां हैं। इनमें से एक मूर्ति 90 के दशक में पेरिस में आयोजित महोत्सव में भी गई थी। संग्रहालय उपनिदेशक आशा पांडे के अनुसार कई विभिन्न रूपों में भगवान गणेश की प्रतिमा संग्रहालय में है।
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सप्त मातृका देवियों के साथ हैं गजानन
बुंदेलखंड में गौरी पुत्र गणेश सप्तमातृका देवियों के साथ भी है। यह देवियां तंत्र शास्त्र से संबंधित हैं। पुरातत्व विभाग के अनुसार कई प्राचीन मंदिर जो ध्वंस हो चुके हैं। उनकी पहचान कि वह किस देवता का मंदिर है। वहां प्राप्त होने वाली गणेश मूर्तियां से ही लगाया जाता है।

- बाल गणेश खेलते हुए। - फोटो : REPORTERS