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इबादत का इतिहास समेटे हैं शहर की मस्जिदें

Mon, 11 Jun 2018 01:01 AM IST
amarujala
amarujala Updated Mon, 11 Jun 2018 01:01 AM IST
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ebadat ka itihas samete he masjide
masjid, jhansi news - फोटो : amar ujala, jhansi news
मस्जिद नवाब
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यह मस्जिद शहर में बिसात खाना और अलीगोल के नजदीक है। मस्जिद के संरक्षक हाजी मोहम्मद अय्यूब अंसारी ने बताया कि 1857 की गदर से पहले आबाद की गई थी। इस मस्जिद का निर्माण नवाब नुसरत अली जंग ने कराया था। नवाब नुसरत अली जंग यहां नमाज अदा करते थे। तब शहर की आबादी कम होने की वजह से नमाजियों की संख्या भी कम होती थी। तब कुछ परिवारों को इस में किराएदारोें के  रूप में काबिज किया गया था जो काफी समय रहते रहे। पर नमाजियों की संख्या को देखते हुए किराएदारों से खाली कराकर मस्जिद का विस्तार किया गया। आज यह मस्जिद भव्य रूप में दिखाई देती है। इस मस्जिद में लगभग 400 नमाजी एक साथ नमाज अदा करते हैं।  

जामा मस्जिद
मस्जिद के इमाम मौलाना मोहम्मद हाशिम ने बताया कि उसी वक्त से इस मस्जिद को शहर की जामा मस्जिद कहा जाता है। शाहजहां ने इस मस्जिद में सोने का पत्र लगाया था, जो वर्र्र्षों तक लगा रहा और वक्त के साथ टूटते-झड़ते खत्म हो गया। महारानी लक्ष्मीबाई के समय में उनके सैनिक यहां नमाज अदा करने आते थे। यह मस्जिद मुुस्लिम आबादी के बीच मुहल्ला सराय में है। आज इस मस्जिद में नमाज के साथ-साथ मदरसा भी संचालित होता है, जिसमें बच्चों को शिक्षा दी जाती है। इस मस्जिद में लगभग 600 नमाजी एक साथ नमाज अदा कर सकते हैं।
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मस्जिद बिसाती बाजार
यह मस्जिद शहर के बीचाेंबीच बिसाती बाजार में स्थित है। मस्जिद के इमाम मौलाना आमिल ने बताया कि इस मस्जिद को ब्रिटिश शासन काल में बनवाया गया था। पीलीभीत निवासी हाजी किफायतुल्लाह खान अंग्रेजों के समय में ठेकेदारी का काम करते थे। एक दिन हाजी किफायतुल्लाह खान यहां से गुजर रहे थे उसी वक्त नमाज का वक्त हुआ। तब वहां पर आसपास कोई मस्जिद नहीं थी। जिस जगह पर आज बिसाती बाजार मस्जिद है, तब वहां एक टीला था। तब उन्होंने उसी टीले पर नमाज अदा की और उस टीले के मालिक से मिलकर उस टीले को खरीद कर मस्जिद का निर्माण कराया। आज इस मस्जिद में एक बड़ा मदरसा संचालित हो रहा है, जिसमें 200 बच्चे   दीनी शिक्षा प्राप्त कर रहे हैं।    
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शिया मस्जिद
यह मस्जिद शहर की नई बस्ती इलाके में स्थित है, जो शिया समुदाय का ईदगाह भी है। मस्जिद के मौअज्जिन मोहम्मद खलील ने बताया कि इस मस्जिद में सुन्नी समुदाय के लोग भी पांच वक्त की नमाज अदा करने आते हैं। जुमा की नमाज दोनों ही समुदाय के लोग बारी-बारी से अदा करते हैं। इसके अलावा शिया लोग ईद और बकरीद की नमाज अदा करते हैं। इस मस्जिद में शिया और सुन्नी समाज के दोनों ही लोग बारी-बारी से नमाज अदा करते हैं। इस मस्जिद की दो चाभी हैं, दोनों ही समुदाय के पास एक-एक चाभी रहती है। इसमें आपस में कोई मतभेद नहीं है। इस मस्जिद का निर्माण भी सन् 1857 के पूर्व नवाब नुसरत अली जंग ने कराया था।
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