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कोरोना ने झांसी से बहुत कुछ छीन लिया सरकार, मदद की है दरकार
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कोरोना ने झांसी से बहुत कुछ छीन लिया सरकार, मदद की है दरकार
झांसी। कोरोना वायरस के संक्रमण ने झांसी की धरती पर बड़ी ही बेरहमी के साथ हमला बोला है। इस महामारी ने तमाम परिवारों को उजाड़ दिया है। किसी का सुहाग छीन लिया तो किसी के सिर से मां-बाप का साया उठ गया। संक्रमण ने लोगों को कभी न भुला पाने वाले जख्म दिए हैं। जिले में अब तक 525 संक्रमित काल के गाल में समा चुके हैं। मौत का सिलसिला लगातार जारी बना हुआ है। ये बीमारी झांसी को गहरे जख्म दे गई। लोगों को मुख्यमंत्री से मदद की दरकार है।
कोरोना वायरस के संक्रमण की दूसरी लहर झांसी पर कहर बनकर टूटी। अप्रैल की शुरुआत के साथ ही इस महामारी ने अपना तांडव दिखाना शुरू कर दिया था। पूरा अप्रैल माह हाहाकार और दहशत के बीच बीता। हर ओर मातम नजर आया। इसका अंदाजा इससे लगाया जा सकता है कि अप्रैल में जिले के 15,745 लोगों को इस महामारी ने अपने चपेट में लिया। जबकि, 96 संक्रमितों की जिंदगी छीनी। मई में भी इसका कहर जारी है। हालांकि, पिछले कुछ दिनों के दरम्यान नए मरीजों के मिलने की संख्या में कमी जरूर आई है। लेकिन, मौत का ग्राफ तेजी से आगे बढ़ रहा है। इसका अंदाजा इससे लगाया जा सकता है कि अप्रैल माह के 22 दिनों में ही जिले में 255 लोग अपनी जान गंवा चुके हैं तथा 9,295 लोगों को ये महामारी अपनी जकड़ में ले चुकी है। ये सिर्फ मौत के आंकड़े भर नहीं, बल्कि तमाम परिवारों की तबाही की इबारतें हैं। किसी परिवार का मुखिया चला गया तो किसी ने अपने नौजवान बच्चे को तड़प-तड़प कर मरते देखा। एक ही परिवार के कई-कई लोगों की अर्थियां उठीं। पिता की अर्थी को लड़कियां कंधा देते नजर आईं। पहली बार शमशान घाटों में भी शवदाह के लिए जगह की कमी देखी गई।
कोरोना काल में ये रहा झांसी का हाल
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- जिले के 35,811 लोग आ चुके हैं संक्रमण की चपेट में। इनमें से 25,040 मरीज अप्रैल और मई माह में सामने आए।
- संक्रमण की चपेट में आने से 525 लोगों की हो चुकी है मौत। इनमें से 351 की जान अप्रैल और मई माह में गई।
- एक अदद ऑक्सीजन सिलिंडर के लिए लोगों को ऑक्सीजन प्लांटों के बाहर जमा देखा।
- रेमडेसिविर इंजेक्शन के लिए अफसरों की चौखट पर मरीज के परिजनों को गिड़गिड़ाते हुए देखा। एक हजार रुपये कीमत का रेमडेसिविर इंजेक्शन मजबूरी में लोगों ने एक लाख रुपये तक में खरीदा।
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- मरीजों की सांसें थमती रहीं और परिजन वेंटिलेटर के लिए यहां-वहां दौड़ लगाते रहे।
- अस्पताल में पलंग हासिल करने के लिए लोग भटकते रहे।
- तमाम लोगों ने कर्ज लेकर कराया निजी अस्पतालों में अपना इलाज।
- अब भी 1551 मरीज जूझ रहे हैं महामारी से।
- अब भी गांव-गांव में जड़ें जमाए हुए है संक्रमण।
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झांसी। कोरोना वायरस के संक्रमण ने झांसी की धरती पर बड़ी ही बेरहमी के साथ हमला बोला है। इस महामारी ने तमाम परिवारों को उजाड़ दिया है। किसी का सुहाग छीन लिया तो किसी के सिर से मां-बाप का साया उठ गया। संक्रमण ने लोगों को कभी न भुला पाने वाले जख्म दिए हैं। जिले में अब तक 525 संक्रमित काल के गाल में समा चुके हैं। मौत का सिलसिला लगातार जारी बना हुआ है। ये बीमारी झांसी को गहरे जख्म दे गई। लोगों को मुख्यमंत्री से मदद की दरकार है।
कोरोना वायरस के संक्रमण की दूसरी लहर झांसी पर कहर बनकर टूटी। अप्रैल की शुरुआत के साथ ही इस महामारी ने अपना तांडव दिखाना शुरू कर दिया था। पूरा अप्रैल माह हाहाकार और दहशत के बीच बीता। हर ओर मातम नजर आया। इसका अंदाजा इससे लगाया जा सकता है कि अप्रैल में जिले के 15,745 लोगों को इस महामारी ने अपने चपेट में लिया। जबकि, 96 संक्रमितों की जिंदगी छीनी। मई में भी इसका कहर जारी है। हालांकि, पिछले कुछ दिनों के दरम्यान नए मरीजों के मिलने की संख्या में कमी जरूर आई है। लेकिन, मौत का ग्राफ तेजी से आगे बढ़ रहा है। इसका अंदाजा इससे लगाया जा सकता है कि अप्रैल माह के 22 दिनों में ही जिले में 255 लोग अपनी जान गंवा चुके हैं तथा 9,295 लोगों को ये महामारी अपनी जकड़ में ले चुकी है। ये सिर्फ मौत के आंकड़े भर नहीं, बल्कि तमाम परिवारों की तबाही की इबारतें हैं। किसी परिवार का मुखिया चला गया तो किसी ने अपने नौजवान बच्चे को तड़प-तड़प कर मरते देखा। एक ही परिवार के कई-कई लोगों की अर्थियां उठीं। पिता की अर्थी को लड़कियां कंधा देते नजर आईं। पहली बार शमशान घाटों में भी शवदाह के लिए जगह की कमी देखी गई।
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कोरोना काल में ये रहा झांसी का हाल
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- जिले के 35,811 लोग आ चुके हैं संक्रमण की चपेट में। इनमें से 25,040 मरीज अप्रैल और मई माह में सामने आए।
- संक्रमण की चपेट में आने से 525 लोगों की हो चुकी है मौत। इनमें से 351 की जान अप्रैल और मई माह में गई।
- एक अदद ऑक्सीजन सिलिंडर के लिए लोगों को ऑक्सीजन प्लांटों के बाहर जमा देखा।
- रेमडेसिविर इंजेक्शन के लिए अफसरों की चौखट पर मरीज के परिजनों को गिड़गिड़ाते हुए देखा। एक हजार रुपये कीमत का रेमडेसिविर इंजेक्शन मजबूरी में लोगों ने एक लाख रुपये तक में खरीदा।
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- मरीजों की सांसें थमती रहीं और परिजन वेंटिलेटर के लिए यहां-वहां दौड़ लगाते रहे।
- अस्पताल में पलंग हासिल करने के लिए लोग भटकते रहे।
- तमाम लोगों ने कर्ज लेकर कराया निजी अस्पतालों में अपना इलाज।
- अब भी 1551 मरीज जूझ रहे हैं महामारी से।
- अब भी गांव-गांव में जड़ें जमाए हुए है संक्रमण।