{"_id":"5c0d7335bdec22419975b74d","slug":"change-thinking-for-women-development","type":"story","status":"publish","title_hn":"सोच बदलने से सशक्त होगी नारी","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
सोच बदलने से सशक्त होगी नारी
jhansi
Updated Mon, 10 Dec 2018 01:25 AM IST
विज्ञापन
aprajita 100 miliun smiles
- फोटो : demo
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
अमर उजाला के नारी गरिमा के साझा संकल्प ‘अपराजिता 100 मिलियन स्माइल्स’ के तहत रविवार को ‘महिला सशक्तीकरण’ विषय पर ‘संवाद’ का आयोजन किया गया, जिसमें महिलाओं के प्रति सोच बदलने की आवश्यकता पर बल दिया गया। संवाद में शामिल हुईं महिलाओं ने कहा कि सरकारों की ओर से महिलाओं के लिए कानून तो बहुत बनाए गए हैं, लेकिन ज्यादातर महिलाओं को इनकी जानकारी नहीं है। हर महिला को उसके अधिकार पता हों, ये सुनिश्चित होना चाहिए।
ग्वालियर रोड औद्योगिक क्षेत्र स्थित अमर उजाला कार्यालय में आयोजित संवाद में महिलाओं ने कहा कि महिलाओं को सशक्त बनाने की दिशा में पिछले कुछ वर्षों के दरम्यान कानूनी स्तर पर बहुत काम हुआ है, लेकिन तमाम महिलाओं को संविधान प्रदत्त अधिकारों की जानकारी नहीं है, जिससे वे उनके इस्तेमाल से वंचित रह जाती हैं। महिलाओं को अपने अधिकार पता होंगे, तो वे बेहतरी के लिए उनका इस्तेमाल कर सकेंगे। ऐसे में सरकार और समाज की महिलाओं को उनके अधिकारों के प्रति जागरूक करने की जिम्मेदारी बनती है।
इसके अलावा ये भी निकलकर आया कि महिलाओं को सबसे पहले खुद के प्रति अपना नजरिया बदलना होगा। महिला सशक्त है, ये अहसास उन्हें खुद करना होगा। इससे महिलाओं के आत्मविश्वास में बढ़ोत्तरी होगी, जो प्रगति के लिए बेहद जरूरी है।
विज्ञापन
इस दौरान महिलाओं से जुड़े विभिन्न मुद्दों पर चर्चा हुई।
अपनी पसंद चुनने को हो अधिकार
पढ़ाई, कॅरियर, शादी सभी मामलों में महिलाओं को अपनी पसंद की राह चुनने का अधिकार होना चाहिए। इसके अलावा ये भी जरूरी है कि महिलाएं अपने आप को परिवार में अंतिम व्यक्ति के रूप में न देखकर प्रथम व्यक्ति के रूप में देखें। परिवार में महिला और पुरुष के लिए अलग- अलग मानक न हों, सभी को समान समझा जाना चाहिए। इसमें बड़ी भूमिका महिलाओं को ही निभानी होगी। तभी सही मायने में सशक्तीकरण होगा।
- डा. लीला कैनाल, पूर्व विभागाध्यक्ष - बुंदेलखंड महाविद्यालय
नजरिये में बदलाव है जरूरी
महिलाओं को सशक्त बनाने के लिए समाज और महिलाओं को खुद को अपने प्रति नजरिया बदलना होगा। महिलाओं को अपनी बेटियों की ठीक उसी तरह से परवरिश करनी चाहिए, जैसे कि वे अपने बेटों की करती हैं। सोच में बदलाव समाज को भी करना चाहिए। महिलाओं और पुरुषों के बीच के फर्क को खत्म करना होगा। इसके अलावा महिलाओं को खुद में निर्णय लेने की क्षमता विकसित करनी होगी।
- नीना उदैनिया, सेवानिवृत्त सहायक बेसिक शिक्षा निदेशक
अपनी सेहत का ध्यान रखें महिलाएं
महिलाएं अपने परिवार की सेहत का ख्याल तो रखती हैं, लेकिन आमतौर पर वे खुद के स्वास्थ्य के प्रति लापरवाह होती हैं। यही बात बेटियों पर भी लागू होती हैं। जबकि, पुरुषों जितनी ही अच्छे स्वास्थ्य की जरूरत महिलाओं को भी होती है। हर बेटी व्यायाम करे और सेल्फ डिफेंस का प्रशिक्षण ले। स्कूलों में ये अनिवार्य विषय के तौर पर शामिल होना चाहिए। सशक्त शरीर से ही सशक्त समाज और राष्ट्र की स्थापना हो सकती है।
- डा. अर्चना मिसुरिया, सीनियर डेंटल सर्जन
हर महिला को मालूम हों अधिकार
महिलाओं की बेहतरी के लिए संविधान ने उन्हें तमाम अधिकार दे रखे हैं, लेकिन समाज के जिस तबके की महिलाओं को इन अधिकारों की सबसे ज्यादा जरूरत है, उन्हें ही इसकी जानकारी नहीं है। ये बहुत बड़ी कमी है। भूख है और भोजन भी है, लेकिन जानकारी के अभाव में दोनों एकदूसरे तक नहीं पहुंच पा रहे हैं। इस कमी को दूर करने के लिए सरकार, समाज सभी स्तर पर तेजी से काम करने की जरूरत है।
- उपासना बब्बर, पूर्व अध्यक्ष - रोटरी क्लब रानी झांसी
महिलाएं ही बनाएं कानून
आधी आबादी का गौरव हासिल होने के बाद भी देश और प्रदेश की विधायिका में महिलाओं की संख्या पुरुषों के मुकाबले बेहद कम होती है। ये बात पंचायत स्तर पर भी देखने को मिलती है। महिलाओं के पिछड़ेपन का एक बड़ा कारण ये भी है। महिलाओं के लिए कानून बनाने वालों में महिलाओं की बड़ी भागीदारी होनी चाहिए। तभी महिलाओं की पीड़ा को समझते हुए नियम बनेंगे और उनका क्रियान्वयन भी आसान होगा।
- आसमां खान, प्रवक्ता- सूरज प्रसाद जीजीआईसी
खुद का आत्मविश्वास बढ़ाना होगा
पुराने जमाने में महिला सशक्त थी। यही वजह है कि तमाम धार्मिक गाथाओं में पुत्रों की पहचान उसके मां से की जा सकती है। लेकिन, बीच के दौर में इसमें कमी आई। ये महिलाओं के आत्मविश्वास की कमी से हुआ। महिलाओं को अपना खोया हुआ ये आत्मविश्वास वापस लाना होगा। हम सशक्त हैं, ये महसूस करना होगा, तभी सशक्त महिला समाज विकसित होगा।
- सुनीता तिवारी, पूर्व राष्ट्रीय हॉकी खिलाड़ी
आजादी मिलनी चाहिए
सभ्य समाज में भी पुरुषों की तरह महिलाओं को बराबर की आजादी नहीं है। यहां तक कि वे अपने जीवन से जुड़े फैसले भी खुद नहीं ले पाती हैं। वे क्या करें और क्या न करें, ये परिवार तय करता है। महिला सशक्तीकरण की दृष्टि से ये स्थिति ठीक नहीं है। बेटियां अपनी पसंद की राह चुनें, इसकी उन्हें आजादी होनी चाहिए। इसमें महिलाओं को ही बड़ी भूमिका अदा करनी होगी।
- ऊषा सचान, ब्यूटी एक्सपर्ट
शादी नहीं, शिक्षा की हो चिंता
बेटी के जन्म के साथ ही परिवार में उसकी शादी की चिंता की जाने लगती है। ये स्थिति ठीक नहीं है। इसमें बदलाव की आवश्यकता है। बेटियों की शादी की नहीं, बल्कि उनकी शिक्षा की चिंता करनी चाहिए। बेटियों की शादी के लिए नहीं, बल्कि उनकी बेहतर शिक्षा के लिए पैसा इकट्ठा करना चाहिए। शिक्षित बेटी के भविष्य की चिंता उसके परिजनों को नहीं करनी पड़ती है। बल्कि, वे खुद अपने फैसले लेने में सक्षम हो जाती हैं।
- डा. आकांक्षा रिछारिया, पूर्व एसोसिएट प्रोफेसर - बुंदेलखंड विश्वविद्यालय
महिलाओं को लेने चाहिए निर्णय
आमतौर पर देखा जाता है कि परिवार के महत्वपूर्ण फैसलों में महिलाओं की भूमिका पीछे रहती है। ये कोई और नहीं करता, बल्कि महिलाएं ही अपने कदम पीछे खींच लेती हैं। महिला सशक्तीकरण की दिशा में ये स्थिति बाधक है। इसमें बदलाव करना होगा। महिलाओं को महत्वपूर्ण फैसले लेने होंगे। ये संदेश परिवार से शुरू होकर समाज और देश तक जाना चाहिए।
- स्वप्निल मोदी, अध्यक्ष - गहोई जाग्रति मंच
जागरूकता पर होना चाहिए काम
महिलाओं में जागरूकता का भारी अभाव है। खासतौर पर ग्रामीण क्षेत्रों में स्थिति दयनीय है। शिक्षा, स्वास्थ्य या महिला अधिकारों के प्रति उन्हें जागरूक करने की बेहद आवश्यकता है। इसमें समाचार पत्रों और सामाजिक संगठनों को बड़ी भूमिका अदा करनी होगी। हालांकि, पहले के मुकाबले इस स्थिति में अब बदलाव हुआ है, लेकिन अभी भी बहुत काम करने की जरूरत है।
- नेहा मिश्रा, समन्वयक - समाज कार्य संकाय, बुंदेलखंड विश्वविद्यालय
विज्ञापन
ग्वालियर रोड औद्योगिक क्षेत्र स्थित अमर उजाला कार्यालय में आयोजित संवाद में महिलाओं ने कहा कि महिलाओं को सशक्त बनाने की दिशा में पिछले कुछ वर्षों के दरम्यान कानूनी स्तर पर बहुत काम हुआ है, लेकिन तमाम महिलाओं को संविधान प्रदत्त अधिकारों की जानकारी नहीं है, जिससे वे उनके इस्तेमाल से वंचित रह जाती हैं। महिलाओं को अपने अधिकार पता होंगे, तो वे बेहतरी के लिए उनका इस्तेमाल कर सकेंगे। ऐसे में सरकार और समाज की महिलाओं को उनके अधिकारों के प्रति जागरूक करने की जिम्मेदारी बनती है।
विज्ञापन
इसके अलावा ये भी निकलकर आया कि महिलाओं को सबसे पहले खुद के प्रति अपना नजरिया बदलना होगा। महिला सशक्त है, ये अहसास उन्हें खुद करना होगा। इससे महिलाओं के आत्मविश्वास में बढ़ोत्तरी होगी, जो प्रगति के लिए बेहद जरूरी है।
विज्ञापन
इस दौरान महिलाओं से जुड़े विभिन्न मुद्दों पर चर्चा हुई।
अपनी पसंद चुनने को हो अधिकार
पढ़ाई, कॅरियर, शादी सभी मामलों में महिलाओं को अपनी पसंद की राह चुनने का अधिकार होना चाहिए। इसके अलावा ये भी जरूरी है कि महिलाएं अपने आप को परिवार में अंतिम व्यक्ति के रूप में न देखकर प्रथम व्यक्ति के रूप में देखें। परिवार में महिला और पुरुष के लिए अलग- अलग मानक न हों, सभी को समान समझा जाना चाहिए। इसमें बड़ी भूमिका महिलाओं को ही निभानी होगी। तभी सही मायने में सशक्तीकरण होगा।
- डा. लीला कैनाल, पूर्व विभागाध्यक्ष - बुंदेलखंड महाविद्यालय
नजरिये में बदलाव है जरूरी
महिलाओं को सशक्त बनाने के लिए समाज और महिलाओं को खुद को अपने प्रति नजरिया बदलना होगा। महिलाओं को अपनी बेटियों की ठीक उसी तरह से परवरिश करनी चाहिए, जैसे कि वे अपने बेटों की करती हैं। सोच में बदलाव समाज को भी करना चाहिए। महिलाओं और पुरुषों के बीच के फर्क को खत्म करना होगा। इसके अलावा महिलाओं को खुद में निर्णय लेने की क्षमता विकसित करनी होगी।
- नीना उदैनिया, सेवानिवृत्त सहायक बेसिक शिक्षा निदेशक
अपनी सेहत का ध्यान रखें महिलाएं
महिलाएं अपने परिवार की सेहत का ख्याल तो रखती हैं, लेकिन आमतौर पर वे खुद के स्वास्थ्य के प्रति लापरवाह होती हैं। यही बात बेटियों पर भी लागू होती हैं। जबकि, पुरुषों जितनी ही अच्छे स्वास्थ्य की जरूरत महिलाओं को भी होती है। हर बेटी व्यायाम करे और सेल्फ डिफेंस का प्रशिक्षण ले। स्कूलों में ये अनिवार्य विषय के तौर पर शामिल होना चाहिए। सशक्त शरीर से ही सशक्त समाज और राष्ट्र की स्थापना हो सकती है।
- डा. अर्चना मिसुरिया, सीनियर डेंटल सर्जन
हर महिला को मालूम हों अधिकार
महिलाओं की बेहतरी के लिए संविधान ने उन्हें तमाम अधिकार दे रखे हैं, लेकिन समाज के जिस तबके की महिलाओं को इन अधिकारों की सबसे ज्यादा जरूरत है, उन्हें ही इसकी जानकारी नहीं है। ये बहुत बड़ी कमी है। भूख है और भोजन भी है, लेकिन जानकारी के अभाव में दोनों एकदूसरे तक नहीं पहुंच पा रहे हैं। इस कमी को दूर करने के लिए सरकार, समाज सभी स्तर पर तेजी से काम करने की जरूरत है।
- उपासना बब्बर, पूर्व अध्यक्ष - रोटरी क्लब रानी झांसी
महिलाएं ही बनाएं कानून
आधी आबादी का गौरव हासिल होने के बाद भी देश और प्रदेश की विधायिका में महिलाओं की संख्या पुरुषों के मुकाबले बेहद कम होती है। ये बात पंचायत स्तर पर भी देखने को मिलती है। महिलाओं के पिछड़ेपन का एक बड़ा कारण ये भी है। महिलाओं के लिए कानून बनाने वालों में महिलाओं की बड़ी भागीदारी होनी चाहिए। तभी महिलाओं की पीड़ा को समझते हुए नियम बनेंगे और उनका क्रियान्वयन भी आसान होगा।
- आसमां खान, प्रवक्ता- सूरज प्रसाद जीजीआईसी
खुद का आत्मविश्वास बढ़ाना होगा
पुराने जमाने में महिला सशक्त थी। यही वजह है कि तमाम धार्मिक गाथाओं में पुत्रों की पहचान उसके मां से की जा सकती है। लेकिन, बीच के दौर में इसमें कमी आई। ये महिलाओं के आत्मविश्वास की कमी से हुआ। महिलाओं को अपना खोया हुआ ये आत्मविश्वास वापस लाना होगा। हम सशक्त हैं, ये महसूस करना होगा, तभी सशक्त महिला समाज विकसित होगा।
- सुनीता तिवारी, पूर्व राष्ट्रीय हॉकी खिलाड़ी
आजादी मिलनी चाहिए
सभ्य समाज में भी पुरुषों की तरह महिलाओं को बराबर की आजादी नहीं है। यहां तक कि वे अपने जीवन से जुड़े फैसले भी खुद नहीं ले पाती हैं। वे क्या करें और क्या न करें, ये परिवार तय करता है। महिला सशक्तीकरण की दृष्टि से ये स्थिति ठीक नहीं है। बेटियां अपनी पसंद की राह चुनें, इसकी उन्हें आजादी होनी चाहिए। इसमें महिलाओं को ही बड़ी भूमिका अदा करनी होगी।
- ऊषा सचान, ब्यूटी एक्सपर्ट
शादी नहीं, शिक्षा की हो चिंता
बेटी के जन्म के साथ ही परिवार में उसकी शादी की चिंता की जाने लगती है। ये स्थिति ठीक नहीं है। इसमें बदलाव की आवश्यकता है। बेटियों की शादी की नहीं, बल्कि उनकी शिक्षा की चिंता करनी चाहिए। बेटियों की शादी के लिए नहीं, बल्कि उनकी बेहतर शिक्षा के लिए पैसा इकट्ठा करना चाहिए। शिक्षित बेटी के भविष्य की चिंता उसके परिजनों को नहीं करनी पड़ती है। बल्कि, वे खुद अपने फैसले लेने में सक्षम हो जाती हैं।
- डा. आकांक्षा रिछारिया, पूर्व एसोसिएट प्रोफेसर - बुंदेलखंड विश्वविद्यालय
महिलाओं को लेने चाहिए निर्णय
आमतौर पर देखा जाता है कि परिवार के महत्वपूर्ण फैसलों में महिलाओं की भूमिका पीछे रहती है। ये कोई और नहीं करता, बल्कि महिलाएं ही अपने कदम पीछे खींच लेती हैं। महिला सशक्तीकरण की दिशा में ये स्थिति बाधक है। इसमें बदलाव करना होगा। महिलाओं को महत्वपूर्ण फैसले लेने होंगे। ये संदेश परिवार से शुरू होकर समाज और देश तक जाना चाहिए।
- स्वप्निल मोदी, अध्यक्ष - गहोई जाग्रति मंच
जागरूकता पर होना चाहिए काम
महिलाओं में जागरूकता का भारी अभाव है। खासतौर पर ग्रामीण क्षेत्रों में स्थिति दयनीय है। शिक्षा, स्वास्थ्य या महिला अधिकारों के प्रति उन्हें जागरूक करने की बेहद आवश्यकता है। इसमें समाचार पत्रों और सामाजिक संगठनों को बड़ी भूमिका अदा करनी होगी। हालांकि, पहले के मुकाबले इस स्थिति में अब बदलाव हुआ है, लेकिन अभी भी बहुत काम करने की जरूरत है।
- नेहा मिश्रा, समन्वयक - समाज कार्य संकाय, बुंदेलखंड विश्वविद्यालय