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सरसों का हब बनेगा बुंदेलखंड
अमर उजाला ब्यूरो
Updated Sat, 28 Jan 2017 01:25 AM IST
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aghricultur, jhansi news
- फोटो : demo
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रानी लक्ष्मीबाई केंद्रीय कृषि विश्वविद्यालय ने इस बार सरसों की पांच प्रजातियों की 40 एकड़ में बुवाई कर शोध किया है। कटाई के दो-तीन महीने पहले ही इसके सकारात्मक परिणाम सामने आने लगे हैं। इन नई किस्मों से सरसों की उपज डेढ़ गुना होने की संभावना है। कृषि विश्वविद्यालय चाहता है कि बुंदेलखंड को सरसों का हब बनाया जाए। इसी के मद्देनजर 70 अन्य प्रजातियों पर कैंपस में भी शोध शुरू कर दिया है।
कृषि विश्वविद्यालय ने बबीना ब्लॉक के कंचनपुर, ढिकौली गांव और बड़ागांव के मवई, कोटबेहटा गांव में शोध शुरू किया है।
सभी गांवों के 40 किसानों को जोड़कर चालीस एकड़ में सरसों के नई किस्मों एनआरसीएचबी-101, डीआरएमआरआईजे-31, आरएच-749, एनआरसीडीआर-2, आरएच-406 को बोया गया है। भारतीय कृषि परिषद द्वारा संचालित राई-सरसों अनुसंधान निदेशालय ने अक्तूबर में इन पांच किस्मों को कृषि विश्वविद्यालय को दिया था। इन किस्मों से किसानों की सरसों की प्रजातियों के साथ खेत में बोया गया। कृषि विश्वविद्यालय की टीम के सदस्य डॉ. अमित तोमर और डॉ. मधुलिका लगातार किसानों के संपर्क में रहकर फसलों की देखरेख करते रहे। मौजूदा समय में सकारात्मक परिणाम सामने आए हैं। किसानों की खुद की बोई किस्म की तुलना में विश्वविद्यालय द्वारा उपलब्ध कराई गई प्रजाति वनस्पति वृद्धि और फूल-फली को लेकर ज्यादा अच्छी साबित हुई है। विश्वविद्यालय का कहना है कि पौधे ज्यादा स्वस्थ हैं। मार्च-अप्रैल में कटाई के समय डेढ़ गुना पैदावार होने की उम्मीद है। इसके साथ ही 70 और किस्मों की कैंपस में बुवाई कर शोध चल रहा है। इनमें से जो बीज बुंदेलखंड के लिए माकूल साबित होंगे, अगले चरण में उनकी बुवाई की जाएगी।
लाइन विधि से करा रहे बुवाई
अधिकतर किसान छिटकवा विधि से बुवाई करते हैं। इसके तहत वह बीज का खेत में छिड़काव करते हैं। इससे बीज कहीं ज्यादा तो कहीं कम पड़ते हैं। खाद का भी सही से वितरण नहीं हो पाता है। एक जगह ज्यादा बीज पड़ने से उपज कम हो पाती है। तने भी पतले हो जाने से फूल कम आते हैं। इसलिए विश्वविद्यालय की टीम ने लाइन विधि से किसानों को सरसों की नई किस्मों की बुवाई कराई है। डॉ. अमित और डॉ. मधुलिका ने बताया कि लाइन विधि से बुवाई करने पर बीज बराबर बंटते हैं। सूरज की रोशनी, खाद, पानी बराबर मिल पाते हैं।
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सरसों को चेपा से ऐसे बचाएं
बुंदेलखंड में कोहरे व बदली के मौसम में सरसों की फसलों में चेपा अथवा माहू कीट का प्रभाव पड़ने लगता है। कृषि विश्वविद्यालय के वैज्ञानिकों ने कीट नियंत्रण व रोकथाम के सुझाव किसानों को दिए हैं। चेपा कीट छोटा, सफेद-हरे रंग का होता है। कीट पौधों के विभिन्न भागों से रस चूसते हैं। यह दिसंबर के अंतिम सप्ताह से फरवरी के अंत तक सक्रिय रहता है। इससे उपज में 25 से 40 प्रतिशत हानि हो सकती है। कीट से निजात पाने के लिए डमिडाक्लोर्पिड की एक मिलीलीटर मात्रा को एक लीटर पानी में मिलाकर फसल पर छिड़ाकाव किया जाए। इसके अलावा मिथाइल-ओ-डिमेटान और क्लोरपाइरीफास का भी इस्तेमाल किया जा सकता है।
हमारा प्रयास है कि बुंदेलखंड सरसों का हब बने। इसके लिए सरसों की पांच नई किस्मों की किसानों के बीजों के साथ एक ही खेत में बुवाई कराई गई है। किसानों के बीजों की तुलना में नई किस्म के काफी अच्छे परिणाम सामने आए हैं। कटाई के दौरान डेढ़ गुनी पैदावार होनी तय है। इसके अलावा 70 अन्य किस्मों पर विश्वविद्यालय में शोध चल रहा है। अगले चरण में इनमें से बुंदेलखंड के लिए उपयुक्त बीजों को बोया जाएगा। - प्रो. अरविंद कुमार, कुलपति, कृषि विश्वविद्यालय।
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कृषि विश्वविद्यालय ने बबीना ब्लॉक के कंचनपुर, ढिकौली गांव और बड़ागांव के मवई, कोटबेहटा गांव में शोध शुरू किया है।
सभी गांवों के 40 किसानों को जोड़कर चालीस एकड़ में सरसों के नई किस्मों एनआरसीएचबी-101, डीआरएमआरआईजे-31, आरएच-749, एनआरसीडीआर-2, आरएच-406 को बोया गया है। भारतीय कृषि परिषद द्वारा संचालित राई-सरसों अनुसंधान निदेशालय ने अक्तूबर में इन पांच किस्मों को कृषि विश्वविद्यालय को दिया था। इन किस्मों से किसानों की सरसों की प्रजातियों के साथ खेत में बोया गया। कृषि विश्वविद्यालय की टीम के सदस्य डॉ. अमित तोमर और डॉ. मधुलिका लगातार किसानों के संपर्क में रहकर फसलों की देखरेख करते रहे। मौजूदा समय में सकारात्मक परिणाम सामने आए हैं। किसानों की खुद की बोई किस्म की तुलना में विश्वविद्यालय द्वारा उपलब्ध कराई गई प्रजाति वनस्पति वृद्धि और फूल-फली को लेकर ज्यादा अच्छी साबित हुई है। विश्वविद्यालय का कहना है कि पौधे ज्यादा स्वस्थ हैं। मार्च-अप्रैल में कटाई के समय डेढ़ गुना पैदावार होने की उम्मीद है। इसके साथ ही 70 और किस्मों की कैंपस में बुवाई कर शोध चल रहा है। इनमें से जो बीज बुंदेलखंड के लिए माकूल साबित होंगे, अगले चरण में उनकी बुवाई की जाएगी।
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लाइन विधि से करा रहे बुवाई
अधिकतर किसान छिटकवा विधि से बुवाई करते हैं। इसके तहत वह बीज का खेत में छिड़काव करते हैं। इससे बीज कहीं ज्यादा तो कहीं कम पड़ते हैं। खाद का भी सही से वितरण नहीं हो पाता है। एक जगह ज्यादा बीज पड़ने से उपज कम हो पाती है। तने भी पतले हो जाने से फूल कम आते हैं। इसलिए विश्वविद्यालय की टीम ने लाइन विधि से किसानों को सरसों की नई किस्मों की बुवाई कराई है। डॉ. अमित और डॉ. मधुलिका ने बताया कि लाइन विधि से बुवाई करने पर बीज बराबर बंटते हैं। सूरज की रोशनी, खाद, पानी बराबर मिल पाते हैं।
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सरसों को चेपा से ऐसे बचाएं
बुंदेलखंड में कोहरे व बदली के मौसम में सरसों की फसलों में चेपा अथवा माहू कीट का प्रभाव पड़ने लगता है। कृषि विश्वविद्यालय के वैज्ञानिकों ने कीट नियंत्रण व रोकथाम के सुझाव किसानों को दिए हैं। चेपा कीट छोटा, सफेद-हरे रंग का होता है। कीट पौधों के विभिन्न भागों से रस चूसते हैं। यह दिसंबर के अंतिम सप्ताह से फरवरी के अंत तक सक्रिय रहता है। इससे उपज में 25 से 40 प्रतिशत हानि हो सकती है। कीट से निजात पाने के लिए डमिडाक्लोर्पिड की एक मिलीलीटर मात्रा को एक लीटर पानी में मिलाकर फसल पर छिड़ाकाव किया जाए। इसके अलावा मिथाइल-ओ-डिमेटान और क्लोरपाइरीफास का भी इस्तेमाल किया जा सकता है।
हमारा प्रयास है कि बुंदेलखंड सरसों का हब बने। इसके लिए सरसों की पांच नई किस्मों की किसानों के बीजों के साथ एक ही खेत में बुवाई कराई गई है। किसानों के बीजों की तुलना में नई किस्म के काफी अच्छे परिणाम सामने आए हैं। कटाई के दौरान डेढ़ गुनी पैदावार होनी तय है। इसके अलावा 70 अन्य किस्मों पर विश्वविद्यालय में शोध चल रहा है। अगले चरण में इनमें से बुंदेलखंड के लिए उपयुक्त बीजों को बोया जाएगा। - प्रो. अरविंद कुमार, कुलपति, कृषि विश्वविद्यालय।