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बढ़ रहे हैं मन ही मन बड़बड़ाने वाले
अमर उजाला ब्यूरो
Updated Wed, 25 May 2016 12:56 AM IST
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hospital, jhansi news
- फोटो : demo
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झांसी। मन ही मन बड़बड़ाते और अपनी ही काल्पनिक दुनिया में गुमसुम रहने वाले लोग यदि आपको दिख जाएं तो समझ लीजिएगा वह सीजोफ्रेनिया की बीमारी का शिकार हैं। इस बीमारी से पीड़ित मरीज आत्महत्या तक कर लेते हैं। जनपद में हर साल तीन से चार फीसदी नए लोगों को यह बीमारी अपना शिकार बना लेती है।
सीजोफ्रेनिया होने के कारण का अभी तक स्पष्ट पता नहीं चल सका है। मगर ऐसा मानना है कि यह बीमारी अनुवांशिक, जेनेटिक, अधिक तनाव लेने पर, दिमागी बीमारी, मूलभूत सुविधाएं न मिलने के कारण होती है। इस बीमारी से ग्रसित मरीज अपने आपसे बात करता है, गुमसुम रहता है, शक करने लगता है, असामान्य व्यवहार करता है। मरीज के चेहरे के भाव कम हो जाते हैं, किसी भी काम को करने की रुचि कम हो जाती है। ऐसे मरीज वास्तविकता से हटकर अपनी काल्पनिक दुनिया बना लेते हैं।
कुछ मरीज हिंसक भी हो जाते हैं। मेडिकल कॉलेज के मनोरोग विभागाध्यक्ष डॉ. ज्ञानेंद्र कुमार ने बताया कि पहले इस बीमारी के इलाज को दवा बहुत कम थी। अब इस बीमारी की प्रभावी दवाएं आ गई हैं। उन्होंने बताया कि सीजोफ्रेनिया के 25 फीसदी मरीज पूरी तरह ठीक हो जाते हैं। जबकि, 35 प्रतिशत में काफी सुधार आ जाता है। 15 फीसदी में सुधार आता है लेकिन उन्हें जिंदगी जीने में दूसरों की मदद चाहिए होती है। 10 फीसदी मरीज ठीक नहीं हो पाते हैं, जबकि 15 प्रतिशत आत्महत्या कर लेते हैं।
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यदि माता या पिता में कोई एक सीजोफ्रेनिया का शिकार है तो बच्चे को यह बीमारी होने की दस फीसदी संभावना है। वहीं, माता-पिता दोनों सीजोफ्रेनिया से पीड़ित हैं, तो बच्चे का भी बीमारी का शिकार होने की बीस फीसदी संभावना है। उन्होंने बताया कि मेडिकल कॉलेज में हर साल तीन से चार फीसदी सीजोफ्रेनिया के मरीजों की बढ़ोतरी हो जाती है।
हाल ही में ठीक हुई बीटेक छात्रा
डॉ. ज्ञानेंद्र ने बताया कि हाल ही में सीजोफ्रेनिया का शिकार झांसी के एक इंजीनियरिंग कॉलेज की छात्रा को उन्होंने ठीक किया है। बीमारी के चलते छात्रा पढ़ाई में ध्यान नहीं दे पाई और उसकी कई विषयों में बैक लग गई थी। ट्रीटमेंट के बाद जब छात्रा ठीक हुई तो उसने सभी सेमेस्टर न केवल पास किए बल्कि बैक भी क्लियर कर ली।
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सीजोफ्रेनिया होने के कारण का अभी तक स्पष्ट पता नहीं चल सका है। मगर ऐसा मानना है कि यह बीमारी अनुवांशिक, जेनेटिक, अधिक तनाव लेने पर, दिमागी बीमारी, मूलभूत सुविधाएं न मिलने के कारण होती है। इस बीमारी से ग्रसित मरीज अपने आपसे बात करता है, गुमसुम रहता है, शक करने लगता है, असामान्य व्यवहार करता है। मरीज के चेहरे के भाव कम हो जाते हैं, किसी भी काम को करने की रुचि कम हो जाती है। ऐसे मरीज वास्तविकता से हटकर अपनी काल्पनिक दुनिया बना लेते हैं।
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कुछ मरीज हिंसक भी हो जाते हैं। मेडिकल कॉलेज के मनोरोग विभागाध्यक्ष डॉ. ज्ञानेंद्र कुमार ने बताया कि पहले इस बीमारी के इलाज को दवा बहुत कम थी। अब इस बीमारी की प्रभावी दवाएं आ गई हैं। उन्होंने बताया कि सीजोफ्रेनिया के 25 फीसदी मरीज पूरी तरह ठीक हो जाते हैं। जबकि, 35 प्रतिशत में काफी सुधार आ जाता है। 15 फीसदी में सुधार आता है लेकिन उन्हें जिंदगी जीने में दूसरों की मदद चाहिए होती है। 10 फीसदी मरीज ठीक नहीं हो पाते हैं, जबकि 15 प्रतिशत आत्महत्या कर लेते हैं।
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यदि माता या पिता में कोई एक सीजोफ्रेनिया का शिकार है तो बच्चे को यह बीमारी होने की दस फीसदी संभावना है। वहीं, माता-पिता दोनों सीजोफ्रेनिया से पीड़ित हैं, तो बच्चे का भी बीमारी का शिकार होने की बीस फीसदी संभावना है। उन्होंने बताया कि मेडिकल कॉलेज में हर साल तीन से चार फीसदी सीजोफ्रेनिया के मरीजों की बढ़ोतरी हो जाती है।
हाल ही में ठीक हुई बीटेक छात्रा
डॉ. ज्ञानेंद्र ने बताया कि हाल ही में सीजोफ्रेनिया का शिकार झांसी के एक इंजीनियरिंग कॉलेज की छात्रा को उन्होंने ठीक किया है। बीमारी के चलते छात्रा पढ़ाई में ध्यान नहीं दे पाई और उसकी कई विषयों में बैक लग गई थी। ट्रीटमेंट के बाद जब छात्रा ठीक हुई तो उसने सभी सेमेस्टर न केवल पास किए बल्कि बैक भी क्लियर कर ली।