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बीयू में राष्ट्रीय संगोष्ठी-City
Updated Fri, 03 Nov 2017 08:50 PM IST
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देश में समान नागरिक संहिता की जरूरत: जितेंद्र मिश्रा
- बीयू के गांधी सभागार में हुई संगोष्ठी में विभिन्न विश्वविद्यालयों से आए विशेषज्ञों ने रखे विचार
अमर उजाला ब्यूरो
झांसी।
देश में समान नागरिक संहिता की जरूरत है। भारत में तीन तलाक और हलाला प्रथा संस्कृति का नहीं धर्म का हिस्सा है जिसे बदला जा सकता है। एक समुदाय में महिलाओं को तलाक देने का भी अधिकार नहीं है। यह बात दीनदयाल उपाध्याय विश्वविद्यालय गोरखपुर के विधि संस्थान के प्रमुख जितेंद्र मिश्रा ने कही। वह शुक्रवार को बुंदेलखंड विश्वविद्यालय में बाबू जगजीवन राम विधि संस्थान द्वारा आयोजित ‘वर्तमान भारतीय परिदृश्य में समान नागरिक संहिता का भविष्य’ एक दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी को संबोधित कर रहे थे।
उन्होंने कहा कि देश में समान नागरिक संहिता धर्म, संस्कृति, समाज और राजनीति की जकड़न में है। सभी इस विषय पर चर्चा करने से बचते हैं। हमारे यहां वेद, पुराणों को कानून का स्रोत माना जाता है। भारतीय संस्कृति सलाद के कटोरे की तरह है, जो सभी को अपने अंदर समेटे हुए है। अगर सभ्यता आंख है तो संस्कृति उसकी रोशनी। अध्यक्षता कर रहे कुलपति प्रो. सुरेंद्र दुबे ने कहा कि यह बेहद संवेदनशील विषय है, जिसकी गेंद किसके पाले में है, किसी को नहीं पता। उन्होंने सभ्यता और संस्कृति में भेद बताते हुए कहा कि जिसमें हम रहते हैं वह सभ्यता है और जो हममें रहती है वह संस्कृति। जिस दिन समान नागरिक संहिता लागू होगी, उस दिन मुस्लिम महिलाओं को भी तलाक देने का अधिकार मिलेगा।
विधि के संकाय अध्यक्ष डीपी गुप्ता ने बताया कि देश पिछले 70 सालों से समान नागरिक संहिता का इंतजार कर रहा है। संविधान के अनुसार इस पर केवल राज्य ही कानून बना सकता है, जो अभी तक बचता आ रहा है। इस मौके पर विधि संस्थान के समन्वयक सरोज कुमार, संयोजक विनोद कुमार, आयोजन सचिव ओपी सिंह, ऋतु शर्मा, अंकित श्रीवास्तव, सीपी पैन्यूली, सतीश सहानी, नीता यादव आदि मौजूद रहे। आभार परीक्षा नियंत्रक पीएन प्रसाद ने व्यक्त किया।
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क्या है समान नागरिक संहिता
समान नागरिक संहिता एक पंथनिरपेक्ष कानून होता है जो सभी धर्म के लोगों के लिए समान रूप से लागू होता है। इसके लागू होने से हर मजहब के लिए एक जैसा कानून आ जाएगा। यानी मुस्लिमों को भी चार शादियां करने और पत्नी को महज तीन बार तलाक बोल देने से रिश्ता खत्म करने वाली परंपरा खत्म हो जाएगी। वर्तमान में देश में हर धर्म के लोग इन मामलों का निपटारा अपने पर्सनल लॉ के अधीन करते हैं। हिंदू सिविल संहिता के तहत हिंदू, सिख, बौद्ध और जैन आते हैं।
हिंदू लॉ
भारत में हिंदुओं के लिए हिंदू कोड बिल लाया गया। देश में इसके विरोध के बाद तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू के कार्यकाल में इसे हिंदू मैरिज एक्ट, हिंदू सक्सेशन एक्ट, हिंदू एडॉप्शन एंड मैंटेनेंस एक्ट और हिंदू माइनोरिटी एंड गार्जियनशिप एक्ट में बांट दिया गया। इस कानून ने महिलाओं को सीधे तौर पर सशक्त बनाया। एक व्यक्ति एक पत्नी के रहते दूसरी शादी नहीं कर सकता।
मुस्लिम पर्सनल लॉ
देश के मुस्लिमों के लिए मुस्लिम पसर्नल लॉ बोर्ड है। इसके अंतर्गत शादीशुदा मुस्लिम पुरुष अपनी पत्नी को महज तीन बार तलाक कहकर तलाक दे सकता है। हालांकि इसमें तलाक के और भी तरीके दिए गए हैं। तलाक के बाद अगर दोनों फिर से शादी करना चाहते हैं तो महिला को पहले किसी और पुरुष के साथ शादी रचानी होगी, उसके साथ शारीरिक संबंध बनाने होंगे। इसे हलाला कहते हैं। उससे तलाक लेने के बाद ही अपने पहले पति से दोबारा शादी कर सकती है। इस लॉ में पत्नी को तलाक के बाद पति की संपत्ति पर कोई अधिकारी नहीं मिलता। बल्कि मेहर अदायगी का नियम है।
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देश में समान नागरिक संहिता की जरूरत: जितेंद्र मिश्रा
- बीयू के गांधी सभागार में हुई संगोष्ठी में विभिन्न विश्वविद्यालयों से आए विशेषज्ञों ने रखे विचार
अमर उजाला ब्यूरो
झांसी।
देश में समान नागरिक संहिता की जरूरत है। भारत में तीन तलाक और हलाला प्रथा संस्कृति का नहीं धर्म का हिस्सा है जिसे बदला जा सकता है। एक समुदाय में महिलाओं को तलाक देने का भी अधिकार नहीं है। यह बात दीनदयाल उपाध्याय विश्वविद्यालय गोरखपुर के विधि संस्थान के प्रमुख जितेंद्र मिश्रा ने कही। वह शुक्रवार को बुंदेलखंड विश्वविद्यालय में बाबू जगजीवन राम विधि संस्थान द्वारा आयोजित ‘वर्तमान भारतीय परिदृश्य में समान नागरिक संहिता का भविष्य’ एक दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी को संबोधित कर रहे थे।
उन्होंने कहा कि देश में समान नागरिक संहिता धर्म, संस्कृति, समाज और राजनीति की जकड़न में है। सभी इस विषय पर चर्चा करने से बचते हैं। हमारे यहां वेद, पुराणों को कानून का स्रोत माना जाता है। भारतीय संस्कृति सलाद के कटोरे की तरह है, जो सभी को अपने अंदर समेटे हुए है। अगर सभ्यता आंख है तो संस्कृति उसकी रोशनी। अध्यक्षता कर रहे कुलपति प्रो. सुरेंद्र दुबे ने कहा कि यह बेहद संवेदनशील विषय है, जिसकी गेंद किसके पाले में है, किसी को नहीं पता। उन्होंने सभ्यता और संस्कृति में भेद बताते हुए कहा कि जिसमें हम रहते हैं वह सभ्यता है और जो हममें रहती है वह संस्कृति। जिस दिन समान नागरिक संहिता लागू होगी, उस दिन मुस्लिम महिलाओं को भी तलाक देने का अधिकार मिलेगा।
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विधि के संकाय अध्यक्ष डीपी गुप्ता ने बताया कि देश पिछले 70 सालों से समान नागरिक संहिता का इंतजार कर रहा है। संविधान के अनुसार इस पर केवल राज्य ही कानून बना सकता है, जो अभी तक बचता आ रहा है। इस मौके पर विधि संस्थान के समन्वयक सरोज कुमार, संयोजक विनोद कुमार, आयोजन सचिव ओपी सिंह, ऋतु शर्मा, अंकित श्रीवास्तव, सीपी पैन्यूली, सतीश सहानी, नीता यादव आदि मौजूद रहे। आभार परीक्षा नियंत्रक पीएन प्रसाद ने व्यक्त किया।
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क्या है समान नागरिक संहिता
समान नागरिक संहिता एक पंथनिरपेक्ष कानून होता है जो सभी धर्म के लोगों के लिए समान रूप से लागू होता है। इसके लागू होने से हर मजहब के लिए एक जैसा कानून आ जाएगा। यानी मुस्लिमों को भी चार शादियां करने और पत्नी को महज तीन बार तलाक बोल देने से रिश्ता खत्म करने वाली परंपरा खत्म हो जाएगी। वर्तमान में देश में हर धर्म के लोग इन मामलों का निपटारा अपने पर्सनल लॉ के अधीन करते हैं। हिंदू सिविल संहिता के तहत हिंदू, सिख, बौद्ध और जैन आते हैं।
हिंदू लॉ
भारत में हिंदुओं के लिए हिंदू कोड बिल लाया गया। देश में इसके विरोध के बाद तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू के कार्यकाल में इसे हिंदू मैरिज एक्ट, हिंदू सक्सेशन एक्ट, हिंदू एडॉप्शन एंड मैंटेनेंस एक्ट और हिंदू माइनोरिटी एंड गार्जियनशिप एक्ट में बांट दिया गया। इस कानून ने महिलाओं को सीधे तौर पर सशक्त बनाया। एक व्यक्ति एक पत्नी के रहते दूसरी शादी नहीं कर सकता।
मुस्लिम पर्सनल लॉ
देश के मुस्लिमों के लिए मुस्लिम पसर्नल लॉ बोर्ड है। इसके अंतर्गत शादीशुदा मुस्लिम पुरुष अपनी पत्नी को महज तीन बार तलाक कहकर तलाक दे सकता है। हालांकि इसमें तलाक के और भी तरीके दिए गए हैं। तलाक के बाद अगर दोनों फिर से शादी करना चाहते हैं तो महिला को पहले किसी और पुरुष के साथ शादी रचानी होगी, उसके साथ शारीरिक संबंध बनाने होंगे। इसे हलाला कहते हैं। उससे तलाक लेने के बाद ही अपने पहले पति से दोबारा शादी कर सकती है। इस लॉ में पत्नी को तलाक के बाद पति की संपत्ति पर कोई अधिकारी नहीं मिलता। बल्कि मेहर अदायगी का नियम है।