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अब सेहरी में रोजेदारों को नही उठाते मुनादी

Fri, 17 May 2019 01:27 AM IST
Jhansi Bureau झांसी ब्यूरो
Updated Fri, 17 May 2019 01:27 AM IST
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अब सेहरी में रोजेदारों को नही उठाते मुनादी
सहरी में जगाने के लिए अब नहीं होती ‘मुनादी’
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झांसी। मोबाइल का चलन बढ़ने के साथ ही सहरी में उठाने वालों (मुनादी) का सिलसिला थम गया। अब लोग एक दूसरे को मोबाइल से कॉल कर ही उठा देते हैं। इसलिए अब कोई घर-घर नात और कव्वाली सुनाकर जगाने नहीं आता है। यह लोग ईद का चांद दिखने के बाद घर-घर अपनी बख्शीश लेने जाते थे। वक्त के साथ सब कुछ बदल गया है। हालांकि सहरी के वक्त अभी मस्जिदों से एलान किया जाता है।
रमजान में सवाब का दर्जा सत्तर गुना अधिक होने के कारण हर कोई लोगों की मदद कर सवाब हासिल करना चाहता है। जिस तरह रोजेदारों को इफ्तार कराना सवाब होता है। उसी तरह सहरी के वक्त रोजा रखने वालों को जगाना भी एक बड़ा सवाब माना जाता है। लगभग दो दशक पहले शहर भर में मुनादियों की कई टोलियां थीं जो मुस्लिम बस्तियों में जाकर रोजा रखने वालों को सहरी के वक्त जगाते थे। ये लोग ढोल व मजीरा लेकर नातें व कव्वालियां सुनाकर उठाते थे। इनकी इस परंपरा से मुस्लिम बस्तियों में काफी रौनक रहती थी। लेकिन बदलते वक्त के साथ ही मुनादियों की सदाएं खत्म हो गईं। पुरानी तहजीब की पहचान मानी जाने वाली सहरी में जगाने की यह परंपरा दिलों और हाथों की तंगी के कारण पूरी तरह से दम तोड़ चुकी है। अब सहरी में मुनादी रोजेदारों को जगाने नहीं आते हैं।
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जानकारों के अनुसार पहले जमाने में खासकर फकीर बिरादरी के लोग सहरी के लिए रोजा रखने वालों को जगाने का काम बड़ी मुस्तैदी के साथ करते थे। बदले में इन लोगों को ईद में इनाम व बख्शीश मिलती थी जिससे इनकी ईद का इंतजाम होता था। इस परंपरा में गरीब की मदद का जज्बा भी छुपा रहता था। इस तरह से फेरी की रवायत समाज के ताने-बाने को मजबूत करती थी, लेकिन अब मोबाइल फोन, अलार्म घड़ी और लाउडस्पीकर ने मुनादियों के जगाने की परंपरा को पूरी तरह से अंकुश लगा दिया है।
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