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हम सुरक्षित थे...लेकिन बाहर के हालत सुनकर कांप रही थी रूह
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काबुल से लौटे लाइन बाजार थाना क्षेत्र के गोधना गांव निवासी मयंक सिंह सोमवार को अपने घर आ गए, जो काबुल में खान स्टील कंपनी में महाप्रबंधक के पद पर कार्यरत हैं। वह बताते हैं कि हम वहां सभी 27 भारतीय के साथ अपनी कंपनी में सुरक्षित थे। अंदर खाने से लेकर अस्पताल तक की सुविधा थी। लेकिन, बाहर के हालात को लेकर हम सब चिंतित थे।
मयंक सिंह ने बताया कि एक महीने से वहां स्थिति खराब है। कंधार तालिबान के लोग धीरे-धीरे काबुल की ओर बढ़ रहे थे। उनका काबुल में प्रवेश करना काफी मुश्किल था, क्योंकि इस क्षेत्र में प्रवेश करने के लिए सिर्फ सात गेट थे, जहां की सुरक्षा इतनी कड़ी थी कि जैसे भारत के पीएम की सुरक्षा होती है। लेकिन, दिन-प्रतिदिन स्थिति बिगड़ती गई और सरकार ने सरेंडर कर दिया, जिसके बाद तालिबानी काबुल में प्रवेश कर गए। 15 अगस्त पर जब तालिबान ने काबुल पर कब्जा किया, उसी के बाद से ही काबुल एयरपोर्ट पर हालात बेकाबू बने हुए हैं। रविवार को भी काबुल एयरपोर्ट पर भगदड़ की स्थिति थी। जितना मुझे पता है कि वो लोग पहले भीड़ को तितर-बितर करने के लिए विशेष गन का प्रयोग कर रहे थे, जिससे गोलियां नहीं निकलती थी, बल्कि आवाज तेज होता था। हालांकि गोलियां भी चलाई जाती थी। मयंक ने अफगानिस्तान में मची भगदड़ और आतंक का हाल बताया। साथ ही वह यह भी बताते कि वहां के लोगों को कहीं न कहीं डर सता रहा है कि यदि लोग इस तरह देश को छोड़कर जाएंगे तो व्यापार पर गहरा असर पड़ेगा। जिसके कारण वह खासकर भारतीयों के प्रति नरमी दिखा रहे हैं। लेकिन, उनकी पूरी बातों और परिवार के लोगों से हुई चर्चा से यह बात साफ हो गई कि काबुल की सड़कों पर आतंक है तो दूसरी ओर हर कोई आशंका में घिरा हुआ है। कब कहां गोलियां चलने लगें और कहां आतंक और धमाके ही कहानी बन जाए कोई नहीं जानता, जो वहां फंसा है उसका दिल ही जानता है कि उन पर क्या बीत रही है।
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मयंक सिंह ने बताया कि एक महीने से वहां स्थिति खराब है। कंधार तालिबान के लोग धीरे-धीरे काबुल की ओर बढ़ रहे थे। उनका काबुल में प्रवेश करना काफी मुश्किल था, क्योंकि इस क्षेत्र में प्रवेश करने के लिए सिर्फ सात गेट थे, जहां की सुरक्षा इतनी कड़ी थी कि जैसे भारत के पीएम की सुरक्षा होती है। लेकिन, दिन-प्रतिदिन स्थिति बिगड़ती गई और सरकार ने सरेंडर कर दिया, जिसके बाद तालिबानी काबुल में प्रवेश कर गए। 15 अगस्त पर जब तालिबान ने काबुल पर कब्जा किया, उसी के बाद से ही काबुल एयरपोर्ट पर हालात बेकाबू बने हुए हैं। रविवार को भी काबुल एयरपोर्ट पर भगदड़ की स्थिति थी। जितना मुझे पता है कि वो लोग पहले भीड़ को तितर-बितर करने के लिए विशेष गन का प्रयोग कर रहे थे, जिससे गोलियां नहीं निकलती थी, बल्कि आवाज तेज होता था। हालांकि गोलियां भी चलाई जाती थी। मयंक ने अफगानिस्तान में मची भगदड़ और आतंक का हाल बताया। साथ ही वह यह भी बताते कि वहां के लोगों को कहीं न कहीं डर सता रहा है कि यदि लोग इस तरह देश को छोड़कर जाएंगे तो व्यापार पर गहरा असर पड़ेगा। जिसके कारण वह खासकर भारतीयों के प्रति नरमी दिखा रहे हैं। लेकिन, उनकी पूरी बातों और परिवार के लोगों से हुई चर्चा से यह बात साफ हो गई कि काबुल की सड़कों पर आतंक है तो दूसरी ओर हर कोई आशंका में घिरा हुआ है। कब कहां गोलियां चलने लगें और कहां आतंक और धमाके ही कहानी बन जाए कोई नहीं जानता, जो वहां फंसा है उसका दिल ही जानता है कि उन पर क्या बीत रही है।
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