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कुम्हारों के चाक ने पकड़ी गति
jaunpur
Updated Mon, 17 Oct 2016 12:53 AM IST
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दीपावली की तैयारी में मिट्टी के दीये तैयार कर रहे कुम्हार।
- फोटो : jaunpur
चीन के उत्पादों के बहिष्कार के लिए एक तरफ से उठ रहे स्वर के बीच दीपावली पर मिट्टी का दीया बनाने वाले कुम्हारों में इस बार नई उम्मीद जगी है। इसके चलते उनके चाक ने रफ्तार पकड़ ली है। उन्हें उम्मीद है कि अब उनका धंधा रफ्तार पकड़ लेगा।
चीन की झालरों ने कुम्हारों का धंधा चौपट कर दिया था। जिससे उन्होंने दीया बनाना भी बंद कर दिया था। ब्रह्मपुत्र नदी का पानी बंद करने और पाकिस्तान का साथ देने को लेकर इस साल चीन के प्रति उपजी नाराजगी ने चीनी सामान का इस्तेमाल करने से तौबा कर लिया है। करतिहां गांव निवासी बिरजू प्रजापति कहते हैं कि इस बार गांव के लोग मिट्टी के दीए से ही घरों को रोशन करेंगे। इससे लगता है कि दीपावली पर मिट्टी के दीयों की मांग बढ़ेगी।
उत्तरपट्टी गांव निवासी उमाशंकर प्रजापति कहते हैं कि एक समय था कि महीने भर पहले से ही दीया बनाने का काम शुरू कर दिया जाता था उसके बाद भी मांग पूरी नहीं हो पाती थी।
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कई स्थानों पर लगने वाले साप्ताहिक बाजारों में दीया, और मिट्टी के तमाम खिलौने बेचते थे। उससे काफी आमदनी हो जाती थी। लेकिन निरंतर मांग घटती गई और धंधा चौपट हो गया। अब अगर लोग फिर से पुरानी परंपरा की ओर लौट रहें हैं तो यह खुशी की बात है।
नगर के ओलंदगंज निवासी कपड़े के कारोबारी सुनील अग्रहरि कहते हैं कि बगल में चाय की दूकान पर कुल्हड़ लेकर आने वाले कुम्हार को दो सौ दीयों का आर्डर अभी से दे रखा है। इस बार दीपावली पर घर को मिट्टी के दीयों से ही सजाएंगे। इससे स्थानीय रोजगार में वृद्िध होगी तथा उनका जीवन स्तर में सुधार होगा।
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चीन की झालरों ने कुम्हारों का धंधा चौपट कर दिया था। जिससे उन्होंने दीया बनाना भी बंद कर दिया था। ब्रह्मपुत्र नदी का पानी बंद करने और पाकिस्तान का साथ देने को लेकर इस साल चीन के प्रति उपजी नाराजगी ने चीनी सामान का इस्तेमाल करने से तौबा कर लिया है। करतिहां गांव निवासी बिरजू प्रजापति कहते हैं कि इस बार गांव के लोग मिट्टी के दीए से ही घरों को रोशन करेंगे। इससे लगता है कि दीपावली पर मिट्टी के दीयों की मांग बढ़ेगी।
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उत्तरपट्टी गांव निवासी उमाशंकर प्रजापति कहते हैं कि एक समय था कि महीने भर पहले से ही दीया बनाने का काम शुरू कर दिया जाता था उसके बाद भी मांग पूरी नहीं हो पाती थी।
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कई स्थानों पर लगने वाले साप्ताहिक बाजारों में दीया, और मिट्टी के तमाम खिलौने बेचते थे। उससे काफी आमदनी हो जाती थी। लेकिन निरंतर मांग घटती गई और धंधा चौपट हो गया। अब अगर लोग फिर से पुरानी परंपरा की ओर लौट रहें हैं तो यह खुशी की बात है।
नगर के ओलंदगंज निवासी कपड़े के कारोबारी सुनील अग्रहरि कहते हैं कि बगल में चाय की दूकान पर कुल्हड़ लेकर आने वाले कुम्हार को दो सौ दीयों का आर्डर अभी से दे रखा है। इस बार दीपावली पर घर को मिट्टी के दीयों से ही सजाएंगे। इससे स्थानीय रोजगार में वृद्िध होगी तथा उनका जीवन स्तर में सुधार होगा।