{"_id":"6a3c2d20e94599e2b40d9874","slug":"the-historic-8th-muharram-procession-set-out-from-imambara-nazim-ali-jaunpur-news-c-193-1-svns1025-157749-2026-06-25","type":"story","status":"publish","title_hn":"Jaunpur News: इमामबाड़ा नाजिम अली से निकला 8वीं मुहर्रम का ऐतिहासिक जुलूस","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
Jaunpur News: इमामबाड़ा नाजिम अली से निकला 8वीं मुहर्रम का ऐतिहासिक जुलूस
विज्ञापन
नाजिम अली खां के इमामबाड़ा से निकले दुलदुल का दर्शन करते लोग
जौनपुर। शिराज-ए-हिंद जौनपुर में आठवीं मुहर्रम का ऐतिहासिक और पारंपरिक जुलूस मोहल्ला नसीब खां मंडी स्थित इमामबाड़ा नाजिम अली खान से अंजुमन हुसैनिया के नेतृत्व में पूरी अकीदत के साथ निकाला गया। इस जुलूस में शामिल 20 से अधिक मातमी अंजुमनों ने नौहाख्वानी और सीनाज़नी (मातम) कर कर्बला के शहीदों को अपना नजराने अकीदत पेश किया।
जुलूस के दौरान आयोजित मजलिस को संबोधित करते हुए दिल्ली से आए मशहूर विद्वान और प्रवक्ता डॉ. कल्बे रजा नकवी ने कर्बला के ऐतिहासिक वाकये को बयां किया। उन्होंने कहा कि आज पूरी दुनिया में इमाम हुसैन का गम मनाया जा रहा है।
इमाम हुसैन ने सन 61 हिजरी में मानवता और दीन-ए-इस्लाम को बचाने के लिए अपना पूरा परिवार कुर्बान कर दिया था। आज जो इस्लाम जिंदा है, वह उन्हीं की महान शहादत के दम पर ही है।
विज्ञापन
डॉ. नकवी ने भावुक कर देने वाले प्रसंग सुनाते हुए कहा कि कर्बला के मैदान में हजरत इमाम हुसैन अपने छह माह के मासूम बच्चे जनाबे अली असगर से लेकर अपने जवान बेटे अली अकबर और 13 साल के भतीजे जनाबे कासिम की शहादत पेश करने से भी पीछे नहीं हटे। 10वीं मोहर्रम को जब इमाम हुसैन जंग के मैदान में जाने लगे, तो उन्हें घोड़े पर सवार कराने वाला कोई पुरुष सदस्य नहीं बचा था; तब उनकी बहन जनाबे जैनब ने उन्हें रोते हुए घोड़े पर सवार कर विदा किया था।
विज्ञापन
जुलूस के दौरान आयोजित मजलिस को संबोधित करते हुए दिल्ली से आए मशहूर विद्वान और प्रवक्ता डॉ. कल्बे रजा नकवी ने कर्बला के ऐतिहासिक वाकये को बयां किया। उन्होंने कहा कि आज पूरी दुनिया में इमाम हुसैन का गम मनाया जा रहा है।
विज्ञापन
इमाम हुसैन ने सन 61 हिजरी में मानवता और दीन-ए-इस्लाम को बचाने के लिए अपना पूरा परिवार कुर्बान कर दिया था। आज जो इस्लाम जिंदा है, वह उन्हीं की महान शहादत के दम पर ही है।
विज्ञापन
डॉ. नकवी ने भावुक कर देने वाले प्रसंग सुनाते हुए कहा कि कर्बला के मैदान में हजरत इमाम हुसैन अपने छह माह के मासूम बच्चे जनाबे अली असगर से लेकर अपने जवान बेटे अली अकबर और 13 साल के भतीजे जनाबे कासिम की शहादत पेश करने से भी पीछे नहीं हटे। 10वीं मोहर्रम को जब इमाम हुसैन जंग के मैदान में जाने लगे, तो उन्हें घोड़े पर सवार कराने वाला कोई पुरुष सदस्य नहीं बचा था