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आठ से कम सीट वाले वाहनों में नहीं ढो सकते स्कूली बच्चे
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जौनपुर। एक जुलाई से स्कूल खुलने वाले हैं। ज्यादातर अभिभावक अपने बच्चों के लिए स्कूल बसों से भेजने का मन बनाए हैं। लेकिन कुछ ऐसे भी स्कूल हैं, जो उस क्षेत्र में बच्चों की संख्या कम होने पर आठ सीट से कम वाली गाडि़यों को भेज देते हैं। ऐसा शहर समेत जनपद के कई विद्यालयों में किया भी जाता है। जबकि आठ से कम सीट वाले वाहनों में स्कूलों बच्चों को नहीं ढोए जा सकते हैं। हालांकि इस बार ऐसे वाहनों के खिलाफ प्रशासन कार्रवाई करने का मन बनाए हुए हैं।
जिले भर में सीबीएसई 90 और आईसीएसई एक, 650 यूपी बोर्ड से जुड़े स्कूल हैं। इन स्कूलों में कुल 968 बसें पंजीकृत हैं। परिवहन विभाग के नियमों के मुताबिक, किसी भी स्कूल में लगने वाली बसों की अवधि अधिकतम 15 साल तय की गई है। इस तरह देखा जाए तो 15 साल की अवधि में चलने वाली 791 बसें हैं, लेकिन इनमें 372 बसें ऐसी हैं, जिनकी फिटनेस अभी तक फेल हैं। इतना ही नहीं, 15 साल के ऊपर 177 ऐसी बसें हैं। इसका पंजीकरण तक निरस्त कर दिया गया है। यानी इस तरह के भी वाहनों से भी बसों का संचालन किया जा रहा है। हालांकि बीते कुछ माह पहले गाजियाबाद में हुई घटना के बाद इसे लेकर सरकार ने सख्ती दिखाई थी लेकिन इसके जनपद स्तर पर यह सख्ती कोई आदेश-निर्देश के पालन तक सीमित रह गई थी। ऐसे में अभियान का कोई सार्थक परिणाम सामने नहीं आया। स्थिति यह रही कि बहुत से स्कूल के संचालकों ने जिन इलाकों में आठ से कम बच्चे हैं। वहां छोटी गाडि़यां, जैसे ई-रिक्शा, ऑटो या आठ सीट से कम वाले वाहन भेज देते हैं जो नियम के विरुद्ध है, क्योंकि आठ सीट से कम वाले वाहन स्कूल में लगाए ही नहीं जा सकते हैं।
परिवहन विभाग को निभानी होगी अपनी जिम्मेदारी
जौनपुर। परिवहन विभाग की यह जिम्मेदारी है कि जो भी नियमों का उल्लंघन कर रहा हो उसके खिलाफ कार्रवाई की जाए। स्कूली वाहनों में साथ चलने वाले चालक और परिचालकों के पास भी नियमानुसार कागजात होने चाहिए। वे अपने स्तर से पत्र भेजकर स्कूलों केे अवगत करा दें कि 13 से कम सीट वाले वाहनों से बच्चे न ढोए जाएं। ऐसा करने पर स्कूल प्रबंधन के खिलाफ भी कार्रवाई की जाएगी।
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आठ सीट से कम वाले वाहनों का उपयोग स्कूलों में बच्चों को ढोने के लिए नहीं किया जा सकता है। इसके लिए स्कूल खुलते ही अभियान चलाया जाएगा। यदि ऐसे वाहन मिले तो उन्हें सीज कर दिया जाएगा। - एसपी सिंह, एआरटीओ
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जिले भर में सीबीएसई 90 और आईसीएसई एक, 650 यूपी बोर्ड से जुड़े स्कूल हैं। इन स्कूलों में कुल 968 बसें पंजीकृत हैं। परिवहन विभाग के नियमों के मुताबिक, किसी भी स्कूल में लगने वाली बसों की अवधि अधिकतम 15 साल तय की गई है। इस तरह देखा जाए तो 15 साल की अवधि में चलने वाली 791 बसें हैं, लेकिन इनमें 372 बसें ऐसी हैं, जिनकी फिटनेस अभी तक फेल हैं। इतना ही नहीं, 15 साल के ऊपर 177 ऐसी बसें हैं। इसका पंजीकरण तक निरस्त कर दिया गया है। यानी इस तरह के भी वाहनों से भी बसों का संचालन किया जा रहा है। हालांकि बीते कुछ माह पहले गाजियाबाद में हुई घटना के बाद इसे लेकर सरकार ने सख्ती दिखाई थी लेकिन इसके जनपद स्तर पर यह सख्ती कोई आदेश-निर्देश के पालन तक सीमित रह गई थी। ऐसे में अभियान का कोई सार्थक परिणाम सामने नहीं आया। स्थिति यह रही कि बहुत से स्कूल के संचालकों ने जिन इलाकों में आठ से कम बच्चे हैं। वहां छोटी गाडि़यां, जैसे ई-रिक्शा, ऑटो या आठ सीट से कम वाले वाहन भेज देते हैं जो नियम के विरुद्ध है, क्योंकि आठ सीट से कम वाले वाहन स्कूल में लगाए ही नहीं जा सकते हैं।
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परिवहन विभाग को निभानी होगी अपनी जिम्मेदारी
जौनपुर। परिवहन विभाग की यह जिम्मेदारी है कि जो भी नियमों का उल्लंघन कर रहा हो उसके खिलाफ कार्रवाई की जाए। स्कूली वाहनों में साथ चलने वाले चालक और परिचालकों के पास भी नियमानुसार कागजात होने चाहिए। वे अपने स्तर से पत्र भेजकर स्कूलों केे अवगत करा दें कि 13 से कम सीट वाले वाहनों से बच्चे न ढोए जाएं। ऐसा करने पर स्कूल प्रबंधन के खिलाफ भी कार्रवाई की जाएगी।
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आठ सीट से कम वाले वाहनों का उपयोग स्कूलों में बच्चों को ढोने के लिए नहीं किया जा सकता है। इसके लिए स्कूल खुलते ही अभियान चलाया जाएगा। यदि ऐसे वाहन मिले तो उन्हें सीज कर दिया जाएगा। - एसपी सिंह, एआरटीओ