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नियंडरथल मानव उत्पत्ति स्थल स्पष्ट नहीं
जौनपुर ब्यूराे
Updated Fri, 04 Dec 2015 12:45 AM IST
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उत्तरी यूरोप के एस्टोनिया बायोसेंटर के वैज्ञानिक डा. ज्ञानेश्वर चौबे ने कहा कि ऐसी मान्यता है कि आधुनिक मानव की उत्पत्ति अफ्रीका में हुई। यहां से मनुष्य पूरे विश्व में फैला। लेकिन नवीनतम शोध कार्यों से इसमें बड़ा फेरबदल हुआ है।
नियंडरथल मानव और डेनीसोवियन मानव प्रजातियों के जीनोम के अंश भी विभिन्न प्रजातियों में अलग-अलग अनुपातों में वितरित हुए हैं। इनके उत्पत्ति स्थल के बारे में निश्चित रूप से कुछ ज्ञात नहीं है।
यह खोज जीनोम के 2.3 अरब न्यूक्लियोटाइड्स की तुलनात्मक अध्ययन के उपरांत ही संभव हो पाया है। वह पूर्वांचल विश्वविद्यालय में जैव प्रौद्योगिकी विभाग की ओर से गुरुवार को मानव विकास एवं जैव प्रौद्योगिकी विषयक व्याख्यानमाला
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में बोल रहे थे। मानव विकास में जैव प्रौद्योगिकी की नई तकनीकें किस प्रकार से परिवर्तन ला रही है, इस पर विस्तार से प्रकाश डाला।
उन्होंने कहा कि भविष्य में यह शोध मनुष्य को विभिन्न प्रकार के रोग और आनुवांशिक लक्षण का पता लगाने में मददगार साबित होगा। उन्होंने कहा कि वर्तमान में भारत की जनसंख्या विविधता पूर्ण है।
आने वाले समय में इस पर और अधिक शोध की आवश्यकता है जो कि मानव की उत्पत्ति को और अधिक सार्थक रूप से समझने में मददगार होगी। इस शोध से मनुष्य के विभिन्न समुदायों के विभिन्न रोगों की संवेदनशीलता के विषय में पता
चलेगा। संकायाध्यक्ष प्रो. डीडी दूबे ने कहा कि भारत सहित विश्व के विभिन्न देशों में जैव प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में बहुत शोध हो रहे है। जिनका मानव, जीव जन्तुओं सहित कृषि पर सकारात्मक प्रभाव पड़ेगा। यह व्यापक पारस्परिक सहयोग से ही संभव है। विषय प्रवर्तन एवं संचालन डा. प्रदीप कुमार ने किया।
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नियंडरथल मानव और डेनीसोवियन मानव प्रजातियों के जीनोम के अंश भी विभिन्न प्रजातियों में अलग-अलग अनुपातों में वितरित हुए हैं। इनके उत्पत्ति स्थल के बारे में निश्चित रूप से कुछ ज्ञात नहीं है।
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यह खोज जीनोम के 2.3 अरब न्यूक्लियोटाइड्स की तुलनात्मक अध्ययन के उपरांत ही संभव हो पाया है। वह पूर्वांचल विश्वविद्यालय में जैव प्रौद्योगिकी विभाग की ओर से गुरुवार को मानव विकास एवं जैव प्रौद्योगिकी विषयक व्याख्यानमाला
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में बोल रहे थे। मानव विकास में जैव प्रौद्योगिकी की नई तकनीकें किस प्रकार से परिवर्तन ला रही है, इस पर विस्तार से प्रकाश डाला।
उन्होंने कहा कि भविष्य में यह शोध मनुष्य को विभिन्न प्रकार के रोग और आनुवांशिक लक्षण का पता लगाने में मददगार साबित होगा। उन्होंने कहा कि वर्तमान में भारत की जनसंख्या विविधता पूर्ण है।
आने वाले समय में इस पर और अधिक शोध की आवश्यकता है जो कि मानव की उत्पत्ति को और अधिक सार्थक रूप से समझने में मददगार होगी। इस शोध से मनुष्य के विभिन्न समुदायों के विभिन्न रोगों की संवेदनशीलता के विषय में पता
चलेगा। संकायाध्यक्ष प्रो. डीडी दूबे ने कहा कि भारत सहित विश्व के विभिन्न देशों में जैव प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में बहुत शोध हो रहे है। जिनका मानव, जीव जन्तुओं सहित कृषि पर सकारात्मक प्रभाव पड़ेगा। यह व्यापक पारस्परिक सहयोग से ही संभव है। विषय प्रवर्तन एवं संचालन डा. प्रदीप कुमार ने किया।