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Jaunpur News: जीवित्पुत्रिका व्रत आज, संतान की दीर्घायु के लिए होगी पूजा
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आश्विन मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी को पुत्रवती महिलाएं अपने पुत्र के दीर्घायु के लिए शुक्रवारको जीवित्पुत्रिका व्रत रखेंगी। इसे लेकर बाजारों में बृहस्पतिवार को महिलाओं ने खरीदारी की।
ज्योतिषाचार्य डॉ.शैलेश मोदनवाल के बताया कि यह व्रत संतान को बला एवं कष्टों से बचाता है और उनको दीर्घायु प्रदान करता है। ऐसी कथा है कि इस व्रत के प्रभाव से अमोघ अस्त्र से उत्तरा के गर्भ में पल रहे अश्वत्थामा की रक्षा हुई थी और परीक्षित को जीवनदान मिला था। तभी से यह व्रत जीवित्पुत्रिका के नाम से विख्यात हुआ।
व्रत का विधान बताते हुए डॉ.टीपी त्रिपाठी कहते हैं कि व्रत के दिन स्नान आदि से निवृत होकर भगवान सूर्यनारायण की प्रतिमा को स्नान कराकर गंध, पुष्प, अक्षत, धूप, दीप आदि से उनकी पूजा की जाती है। बाजरे व चने से बना भोग अर्पित किया जाता है। इस दिन स्त्रियां उड़द के कुछ साबूत दाने ग्रहण करती हैं जिसका प्रयोजन भगवान श्री कृष्ण के सूक्ष्म रूप को उदर में प्रवेश माना जाता है।
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कर्मकांड के विद्वान पंडित मुरारी श्याम पांडेय ने बताया कि इस दिन गेहूं व उड़द के दान का विशेष महत्व है। ब्राह्मण को भोजन भी कराया जाता है और उन्हें दान दक्षिणा भी देते है। व्रती महिलाएं अपने पुत्रों के गले में काले अथवा लाल रंग के रक्षा सूत्र या धागे को पहनाती है। 24 घंटे के उपवास के बाद दूसरे दिन ब्रह्म बेला में दही चूड़े का भोग लगाकर उसका कुछ भाग पशु पक्षियों को देने के बाद प्रसाद के रूप में ग्रहण करती हैं।
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ज्योतिषाचार्य डॉ.शैलेश मोदनवाल के बताया कि यह व्रत संतान को बला एवं कष्टों से बचाता है और उनको दीर्घायु प्रदान करता है। ऐसी कथा है कि इस व्रत के प्रभाव से अमोघ अस्त्र से उत्तरा के गर्भ में पल रहे अश्वत्थामा की रक्षा हुई थी और परीक्षित को जीवनदान मिला था। तभी से यह व्रत जीवित्पुत्रिका के नाम से विख्यात हुआ।
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व्रत का विधान बताते हुए डॉ.टीपी त्रिपाठी कहते हैं कि व्रत के दिन स्नान आदि से निवृत होकर भगवान सूर्यनारायण की प्रतिमा को स्नान कराकर गंध, पुष्प, अक्षत, धूप, दीप आदि से उनकी पूजा की जाती है। बाजरे व चने से बना भोग अर्पित किया जाता है। इस दिन स्त्रियां उड़द के कुछ साबूत दाने ग्रहण करती हैं जिसका प्रयोजन भगवान श्री कृष्ण के सूक्ष्म रूप को उदर में प्रवेश माना जाता है।
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कर्मकांड के विद्वान पंडित मुरारी श्याम पांडेय ने बताया कि इस दिन गेहूं व उड़द के दान का विशेष महत्व है। ब्राह्मण को भोजन भी कराया जाता है और उन्हें दान दक्षिणा भी देते है। व्रती महिलाएं अपने पुत्रों के गले में काले अथवा लाल रंग के रक्षा सूत्र या धागे को पहनाती है। 24 घंटे के उपवास के बाद दूसरे दिन ब्रह्म बेला में दही चूड़े का भोग लगाकर उसका कुछ भाग पशु पक्षियों को देने के बाद प्रसाद के रूप में ग्रहण करती हैं।