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गुरु तेगबहादुर की तपस्थली रही है जौनपुर
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जौनपुर। सिखों के नौंवे धर्मगुरू तेग बहादुर की तपस्थली होने के कारण देश में जनपद अहम स्थान रखता है। रासमंडल स्थित गुरुद्वारे में रखे गए तीर साहिब व हस्तलिखित श्री गुरुग्रंथ साहिब आज भी सुरक्षित हैं। इसे देखने के लिए देश के कोने-कोने से श्रद्धालु, इतिहास प्रेमी और शोधार्थी आते हैं।
गुरु तेग बहादुर सिख धर्म के प्रचार-प्रसार के सिलसिले में असम से दिल्ली वापसी के समय वर्ष 1670 में यहां आए थे। वे पहले चाचकपुर में गोमती नदी के किनारे रुके थे। इसके बाद जनपद की सिख संगत उन्हें रासमंडल ले लाया। यहां तीन माह रहकर (अब गुरुद्वारा) विश्राम और तप किया था। यहां से जाते समय वे अपनी अनेक वस्तुएं यहीं बतौर यादगार छोड़ गए थे, जो मछरहट्टा रासमंडल निवासी एक माली परिवार के यहां काफी समय तक पड़ी रहीं। इसी परिवार के स्व. गोविंद माली को ये वस्तुएं अपने पूर्वजों से प्राप्त हुई दी, जो बाद में गुरुद्वारा को प्रदान कर दी गई। इनमें गुरु तेग बहादुर का तीर साहिब और गुरुग्रंथ साहिब की हस्तलिखित प्रति सम्मिलित थी। 1970 में ये दुर्लभ वस्तुएं गुरुद्वारे को प्राप्त हुईं। इस तीर की लंबाई करीब डेढ़ फीट व गोलाई कनिष्ठिका के समान है। जिसका अगला भाग छिद्रित, पतला व नुकीला होता चला गया है। इसी प्रकार 1430 पृष्ठों की गुरुग्रंथ साहिब की यहां रखी गई हस्तलिखित प्रति सफेद रंग के उत्तम कोटि के कागज पर काली रोशनाई से स्पष्टअक्षरों में लिखी गई है। सदियों बाद भी यह कहीं से धूमिल और खराब नहीं हुई। मगर रख रखाव के अभाव में बीते कुछ वर्षों में इस ग्रंथ को थोड़ी क्षति पहुंची, जिसे दिल्ली ले जाकर सही कराया गया। अधिवक्ता गुरुवीर सिंह ने बताया कि यहां दर्शन के लिए धर्मावलंबी बराबर आते रहते हैं। यहां रखी गुरु तेग बहादुर की हस्तलिखित प्रति शोध व इतिहास की दृष्टि से महत्वपूर्ण है। लोग दूर दूर से इसे देखने ही नहीं बल्कि आस्था भी प्रकट करते हैं।
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गुरु तेग बहादुर सिख धर्म के प्रचार-प्रसार के सिलसिले में असम से दिल्ली वापसी के समय वर्ष 1670 में यहां आए थे। वे पहले चाचकपुर में गोमती नदी के किनारे रुके थे। इसके बाद जनपद की सिख संगत उन्हें रासमंडल ले लाया। यहां तीन माह रहकर (अब गुरुद्वारा) विश्राम और तप किया था। यहां से जाते समय वे अपनी अनेक वस्तुएं यहीं बतौर यादगार छोड़ गए थे, जो मछरहट्टा रासमंडल निवासी एक माली परिवार के यहां काफी समय तक पड़ी रहीं। इसी परिवार के स्व. गोविंद माली को ये वस्तुएं अपने पूर्वजों से प्राप्त हुई दी, जो बाद में गुरुद्वारा को प्रदान कर दी गई। इनमें गुरु तेग बहादुर का तीर साहिब और गुरुग्रंथ साहिब की हस्तलिखित प्रति सम्मिलित थी। 1970 में ये दुर्लभ वस्तुएं गुरुद्वारे को प्राप्त हुईं। इस तीर की लंबाई करीब डेढ़ फीट व गोलाई कनिष्ठिका के समान है। जिसका अगला भाग छिद्रित, पतला व नुकीला होता चला गया है। इसी प्रकार 1430 पृष्ठों की गुरुग्रंथ साहिब की यहां रखी गई हस्तलिखित प्रति सफेद रंग के उत्तम कोटि के कागज पर काली रोशनाई से स्पष्टअक्षरों में लिखी गई है। सदियों बाद भी यह कहीं से धूमिल और खराब नहीं हुई। मगर रख रखाव के अभाव में बीते कुछ वर्षों में इस ग्रंथ को थोड़ी क्षति पहुंची, जिसे दिल्ली ले जाकर सही कराया गया। अधिवक्ता गुरुवीर सिंह ने बताया कि यहां दर्शन के लिए धर्मावलंबी बराबर आते रहते हैं। यहां रखी गुरु तेग बहादुर की हस्तलिखित प्रति शोध व इतिहास की दृष्टि से महत्वपूर्ण है। लोग दूर दूर से इसे देखने ही नहीं बल्कि आस्था भी प्रकट करते हैं।
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