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संकट में खिलाया था खाना, अब मुश्किल हुआ भुगतान पाना
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जौनपुर। कोरोना के संकट काल में प्रशासन की एक आवाज पर प्रवासियों, गरीबों, असहायों को भोजन सहित अन्य सुविधाएं मुहैया कराने वाले अब भुगतान को भटक रहे हैं। कम्यूनिटी किचन बंद होने के महीनों बाद भी उसके संचालन में सहयोग देने वालों के साढ़े तीन करोड़ रुपये अटके हैं। वह दफ्तर-दफ्तर भटक रहे हैं, जहां से बस आश्वासन की घुट्टियां पिलाई जा रही हैं।
कोरोना से बचाव के लिए लगाए गए लॉक डाउन ने लोगों के रोजगार ठप कर दिए। काम-काज बंद होने से उनके सामने पेट भरने की दिक्कत आ गई। उन्हें भोजन मुहैया कराने के लिए सभी निकायों में कम्यूनिटी किचन की व्यवस्था की गई थी। बाहर से आने वाले प्रवासियों को 14 दिन तक क्वारंटीन में रहने के लिए तहसील स्तर पर बनाए आश्रय स्थलों में भी भोजन इसी कम्यूनिटी किचन से पहुंचाया जा रहा था। आपदा काल में प्रशासन को जब इसके संचालन में विभिन्न सामानों की जरुरत थी तो आपूर्तिकर्ताओं ने एक आवाज पर आगे आकर मदद पहुंचाई। टेंट-कुर्सी, राशन, सब्जी, बर्तन सहित हर सुविधा मुहैया कराई, जिससे किचन के संचालन में दिक्कत न हो। जिले के 16 स्थानों पर करीब तीन माह तक संचालित कम्यूनिटी किचन में चार करोड़ रुपये खर्च हुए। प्रशासन का वादा था कि कोरोना काल खत्म होने से पहले ही सभी आपूर्तिकर्ताओं को भुगतान मुहैया करा दिया जाएगा, मगर महीनों बाद भी वह बकाया पैसा पाने के लिए भटक रहे हैं। सबसे ज्यादा बकाया धनराशि टेंट संचालकों की है। बकाए के लिए वह कभी नगर निकाय कार्यालय पर पहुंचते हैं तो कभी तहसील और कलेक्ट्रेट पर। हर जगह से उन्हें बजट का अभाव बताकर लौटाया जा रहा है।
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कोरोना से बचाव के लिए लगाए गए लॉक डाउन ने लोगों के रोजगार ठप कर दिए। काम-काज बंद होने से उनके सामने पेट भरने की दिक्कत आ गई। उन्हें भोजन मुहैया कराने के लिए सभी निकायों में कम्यूनिटी किचन की व्यवस्था की गई थी। बाहर से आने वाले प्रवासियों को 14 दिन तक क्वारंटीन में रहने के लिए तहसील स्तर पर बनाए आश्रय स्थलों में भी भोजन इसी कम्यूनिटी किचन से पहुंचाया जा रहा था। आपदा काल में प्रशासन को जब इसके संचालन में विभिन्न सामानों की जरुरत थी तो आपूर्तिकर्ताओं ने एक आवाज पर आगे आकर मदद पहुंचाई। टेंट-कुर्सी, राशन, सब्जी, बर्तन सहित हर सुविधा मुहैया कराई, जिससे किचन के संचालन में दिक्कत न हो। जिले के 16 स्थानों पर करीब तीन माह तक संचालित कम्यूनिटी किचन में चार करोड़ रुपये खर्च हुए। प्रशासन का वादा था कि कोरोना काल खत्म होने से पहले ही सभी आपूर्तिकर्ताओं को भुगतान मुहैया करा दिया जाएगा, मगर महीनों बाद भी वह बकाया पैसा पाने के लिए भटक रहे हैं। सबसे ज्यादा बकाया धनराशि टेंट संचालकों की है। बकाए के लिए वह कभी नगर निकाय कार्यालय पर पहुंचते हैं तो कभी तहसील और कलेक्ट्रेट पर। हर जगह से उन्हें बजट का अभाव बताकर लौटाया जा रहा है।
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