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Jaunpur News: 27 साल बाद भी मां प्रतापी को रुलाती है रामसमुझ की आखिरी चिठ्ठी
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कारगिल शहीद रामसमुझ यादव की आज भी सहेज कर रखी गई वर्दी और अन्य सामान। संवाद
कारगिल युद्ध के बलिदानी रामसमुझ यादव के बलिदान को आज भी उनकी मां प्रतापी देवी भुला नहीं पाई हैं। 27 वर्ष बीत जाने के बाद भी उनकी मां की आंखों में आंसू हैं। घर में शहीद रामसमुझ की तस्वीर नहीं है। परिजनों का कहना है कि रामसमुझ की तस्वीर देखकर मां विचलित हो जाती हैं।
बलिदानी रामसमुझ के भाई प्रमोद यादव बताते हैं कि आज भी उनके सामान को सहेज कर रखा गया है, ताकि उनकी मां की नज़र उन पर न पड़े। वे कहते हैं कि मां उन्हें देखते ही रोने लगती हैं।
आज भी रामसमुझ की वर्दी, उनका भेजा हुआ आखिरी पत्र, और उनकी लिखी हुई डायरी, जिसमें उन्होंने अपने हिसाब-किताब का ब्योरा लिखा है सुरक्षित रखी गई है। यह सब उनके परिवार के लिए अनमोल धरोहर हैं। इनमें एक वीर सैनिक की यादें जीवित हैं।
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सगड़ी तहसील के नत्थूपुर गांव के निवासी रामसमुझ यादव ने 30 अगस्त 1999 को कारगिल युद्ध के दौरान तेज बुखार के बावजूद देश के लिए अपने प्राणों की आहुति दे दी थी।
नत्थूपुर में उनके नाम पर एक शहीद पार्क भी बनाया गया है, जहां उनकी मूर्ति स्थापित है। परिवार को शासन की ओर से एक गैस एजेंसी भी प्रदान की गई है। इसके संचालन से परिवार का भरण पोषण होता है।
आज भी परिवार के लोग उनकी स्मृतियों को सहेजकर रखे हैं। उनके नाम पर स्थापित शहीद पार्क में प्रतिवर्ष 30 जुलाई को शहीद मेले का आयोजन किया जाता है। इस दौरान यहां पर रक्तदान शिविर का आयोजन भी किया जाता है। सबसे बड़े संयोग की बात तो यह है कि जिस दिन रामसमुझ का जन्म हुआ था उसी दिन वह देश के लिए बलिदान हो गए थे।
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बलिदानी रामसमुझ के भाई प्रमोद यादव बताते हैं कि आज भी उनके सामान को सहेज कर रखा गया है, ताकि उनकी मां की नज़र उन पर न पड़े। वे कहते हैं कि मां उन्हें देखते ही रोने लगती हैं।
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आज भी रामसमुझ की वर्दी, उनका भेजा हुआ आखिरी पत्र, और उनकी लिखी हुई डायरी, जिसमें उन्होंने अपने हिसाब-किताब का ब्योरा लिखा है सुरक्षित रखी गई है। यह सब उनके परिवार के लिए अनमोल धरोहर हैं। इनमें एक वीर सैनिक की यादें जीवित हैं।
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सगड़ी तहसील के नत्थूपुर गांव के निवासी रामसमुझ यादव ने 30 अगस्त 1999 को कारगिल युद्ध के दौरान तेज बुखार के बावजूद देश के लिए अपने प्राणों की आहुति दे दी थी।
नत्थूपुर में उनके नाम पर एक शहीद पार्क भी बनाया गया है, जहां उनकी मूर्ति स्थापित है। परिवार को शासन की ओर से एक गैस एजेंसी भी प्रदान की गई है। इसके संचालन से परिवार का भरण पोषण होता है।
आज भी परिवार के लोग उनकी स्मृतियों को सहेजकर रखे हैं। उनके नाम पर स्थापित शहीद पार्क में प्रतिवर्ष 30 जुलाई को शहीद मेले का आयोजन किया जाता है। इस दौरान यहां पर रक्तदान शिविर का आयोजन भी किया जाता है। सबसे बड़े संयोग की बात तो यह है कि जिस दिन रामसमुझ का जन्म हुआ था उसी दिन वह देश के लिए बलिदान हो गए थे।