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सरकारी अस्पतालों में भीड़
jaunpur
Updated Mon, 21 Nov 2016 01:34 AM IST
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बदलापुर सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र में इलाज के लिए बैठे मरीज।
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एक हजार और पांच स के नोट बंद होने से मरीज और तीमारदार भी परेशान हैं। निजी अस्पतालों में सन्नाटा पसर गया है। सरकारी अस्पतालों में मरीजों की संख्या अचानक बढ़ गई है। नोटबंदी के बाद सरकार ने भले ही लोगों की सहूलियत के लिए निर्देश दिए हैं कि अस्पताल और मेडिकल स्टोरों पर हजार और पांच सौ रुपये के नोट लिए जाएंगे लेकिन
मेडिकल स्टोरों और निजी अस्पतालों ने पुराने नोट लेना बंद कर दिया है। यही व जह है कि निजी अस्पतालों में अचानक मरीजों की संख्या कम हो गई है। जहां डाक्टर को दिखाने के लिए लोगों की लाइन लगती थी। घंटों इंतजार के बाद उनका नंबर आता था उन अस्पतालों में भी सन्नाटा छा गया है। इसके उलट सरकारी अस्पतालों में मरीजों की संख्या बढ़ी है।
जिला अस्पताल समेत सभी प्राथमिक और सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों पर आम दिनों की तुलना में हाल के दिनों में मरीजों की संख्या में इजाफा हुआ है। जिला अस्पताल के मुख्य चिकित्सा अधीक्षक डा. एसके पांडेय कहते हैं कि इस मौसम में वैसे भी कम लोग बीमार पड़ते हैं ।
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फिर भी नोट बंदी के चलते जो मरीज निजी अस्पतालों में जाते थे वे भी सरकारी अस्पतालों में आ रहे हैं। बदलापुर सीएचसी पर पहुंची सरोखनपुर की मुन्नी देवी कहती हैं कि वह बुखार से पीड़ित थीं। सरकारी अस्पताल में इसलिए आना पड़ा क्योंकि निजी अस्पतालों में फीस देने के लिए पैसे नहीं हैं।
जो पैसे फुटकर घर में हैं उसे दवा में खर्च कर दिया जाएगा तो घर का खर्च कैसे चलेगा। सुल्तानपुर की रुबी, मुरीदपुर की बबिता पटेल, सवंशा के हरिशंकर और बछाड़ी गांव निवासी दिनेश समेत अन्य मरीजों का भी यही कहना है कि निजी अस्पतालों में जाने की हिम्मत नहीं पड़ती।
उन्हें फीस दे दिया जाएगा तो उतने पैसे को खाते से निकालने के लिए घंटों लाइन में खड़ा होना होगा। बक्शा स्वास्थ्य केंद्र के आयुष चिकित्सक डा. जनार्दन यादव भी मानते हैं कि निजी अस्पतालों में इलाज के लिए जाने वाले लोगों का भी रुख सरकारी अस्पतालों की ओर हुआ है।
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मेडिकल स्टोरों और निजी अस्पतालों ने पुराने नोट लेना बंद कर दिया है। यही व जह है कि निजी अस्पतालों में अचानक मरीजों की संख्या कम हो गई है। जहां डाक्टर को दिखाने के लिए लोगों की लाइन लगती थी। घंटों इंतजार के बाद उनका नंबर आता था उन अस्पतालों में भी सन्नाटा छा गया है। इसके उलट सरकारी अस्पतालों में मरीजों की संख्या बढ़ी है।
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जिला अस्पताल समेत सभी प्राथमिक और सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों पर आम दिनों की तुलना में हाल के दिनों में मरीजों की संख्या में इजाफा हुआ है। जिला अस्पताल के मुख्य चिकित्सा अधीक्षक डा. एसके पांडेय कहते हैं कि इस मौसम में वैसे भी कम लोग बीमार पड़ते हैं ।
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फिर भी नोट बंदी के चलते जो मरीज निजी अस्पतालों में जाते थे वे भी सरकारी अस्पतालों में आ रहे हैं। बदलापुर सीएचसी पर पहुंची सरोखनपुर की मुन्नी देवी कहती हैं कि वह बुखार से पीड़ित थीं। सरकारी अस्पताल में इसलिए आना पड़ा क्योंकि निजी अस्पतालों में फीस देने के लिए पैसे नहीं हैं।
जो पैसे फुटकर घर में हैं उसे दवा में खर्च कर दिया जाएगा तो घर का खर्च कैसे चलेगा। सुल्तानपुर की रुबी, मुरीदपुर की बबिता पटेल, सवंशा के हरिशंकर और बछाड़ी गांव निवासी दिनेश समेत अन्य मरीजों का भी यही कहना है कि निजी अस्पतालों में जाने की हिम्मत नहीं पड़ती।
उन्हें फीस दे दिया जाएगा तो उतने पैसे को खाते से निकालने के लिए घंटों लाइन में खड़ा होना होगा। बक्शा स्वास्थ्य केंद्र के आयुष चिकित्सक डा. जनार्दन यादव भी मानते हैं कि निजी अस्पतालों में इलाज के लिए जाने वाले लोगों का भी रुख सरकारी अस्पतालों की ओर हुआ है।