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इमरती और इत्र उद्योग में जगी आस, ब्रांडिंग से होगा पूरा विकास

Sun, 27 Sep 2020 11:48 PM IST
Varanasi Bureau वाराणसी ब्यूरो
Updated Sun, 27 Sep 2020 11:48 PM IST
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Aroused hope in Emrati and perfume industry, branding will lead to full development
बेनी राम देवी प्रसाद की दूकान पर इमरती तैयार करते कारीगर। - फोटो : JAUNPUR
जौनपुर। मल्हनी विधानसभा के लिए उपचुनाव का शंखनाद करने आए मुख्यमंत्री ने दम तोड़ रहे जौनपुर के इत्र उद्योग व इमरती कारोबारियों को उम्मीदों से भर दिया है। दोनों उत्पादों की ब्रांडिंग करने के उनके आश्वासन के बाद कारोबारी उत्साहित हैं। उनको लग रहा है कि वह दिन दूर नहीं जब जौनपुर फिर से स्वाद और सुगंध के लिए जाना जाने लगेगा। साथ ही रोजगार के अवसर भी बढ़ेंगे।
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जौनपुर का अतीत गौरवशाली रहा है। शर्की शासनकाल में कला, साहित्य और संगीत का यह प्रमुख केंद्र हुआ करता था। मुगल काल में भी इसकी समृद्धि बढ़ी। ब्रिटिश काल में इसे व्यावसायिक केंद्र के रूप में पहचान मिली। 19वीं शताब्दी में यहां इत्र के कारोबार की भी शुरुआत हुई। चमेली, बेला, गुलाब, हरसिंगार के फूलों से बनने वाले इत्र राजा-महाराजाओं की तो पसंद थे ही, विदेशों में भी उनकी मांग थी। लोग बताते हैं कि इत्र बनाने और बेचने वालों की बड़ी संख्या के कारण शहर बलुआ घाट, मधारे टोला, नखास, कोतवाली चौराहा आदि मोहल्लों में हमेशा सुगंधित वातावरण रहता था। समय के थपेड़ों और सरकारी प्रोत्साहन के अभाव में यह उद्योग अब अंतिम सांस ले रहा है। इत्र बनाने वाले एक-दो परिवार ही रह गए हैं। हालांकि कई लोग बाहर से इत्र लाकर बिक्री के पुश्तैनी धंधे से अब भी जुड़े हुए हैं। यादों के रूप में इनके घरों में इत्र बनाने के उपकरण आदि हैं। सीएम की घोषणा से यह वर्ग उत्साहित है। उनका मानना है कि इत्र बनाने वाले हुनरमंद अब भी हैं। सरकार के प्रोत्साहन के साथ इसे बढ़ावा मिला तो हजारों लोगों को रोजगार मिल सकेगा।
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दो सौ साल पुराना है इमरती का इतिहास
जौनपुर। जिस इमरती को सीएम ने ब्रांड बनाने की बात कही है, उसका इतिहास सवा दो सौ साल से भी अधिक पुराना है। देश और प्रदेश में ही नहीं इसके स्वाद के शौकीन सात समंदर पार तक हैं। जायकेदार इमरती की खासियत ही है कि एक बार इसका सेवन करने वाले इसके मुरीद हो जाते हैं। हर दिन एक क्विंटल से अधिक बिक्री वाली इस इमरती को जौनपुर आने वाले लोग अपने साथ ले जाना नहीं भूलते।
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शहर के नखास इलाके से इस इमरती की शुरुआत हुई थी, मगर अब इसी नाम से शहर में दो दुकानें संचालित हो रही हैं। मूल रुप से फैजाबाद निवासी बेनीराम पोस्टमास्टर के रूप में कार्यरत थे। एक बार अपने अंग्रेज अधिकारी को उन्होंने इमरती बनाकर परोसा तो खूब तारीफ मिली। इसके बाद उन्होंने दुकान खोलने की ठान ली। शाही पुल के पास उन्होंने दुकान खोल ली। तब गोमती नदी के रास्ते ही व्यापार होता था। लिहाजा यहां आने-जाने वाले लोगों की भीड़ रहती थी। एक मड़हे में खुली दुकान धीरे-धीरे विस्तार लेती गई। 1855 में इसका रजिस्ट्रेशन हुआ। उड़द की धोई, देसी चीनी व देसी घी से बनने वाली इमरती का पुराना स्वाद आज भी बरकरार है। मुंह में रखते ही इमरती घुल जाती है। कई दिनों तक इसे रखा जा सकता है। कई राजनेता, मंत्री, अफसर इसके मुरीद रहे हैं।
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