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...और बिना दुल्हन के फिर लौटी बारात
अमर उजाला ब्यूरो, जौनपुर
Updated Fri, 04 Sep 2015 12:50 AM IST
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कचगाव-राजेपुर के कजरहवा पोखरे आयोजित मेले में गुरुवार को एक बार फिर बिना दुल्हन के ही बारात लौट गई। बारातियों को बिना दुल्हन के ही एक बार फिर लौटना पड़ा।
हाथी, घोड़े और ऊंट पर सज धज कर आए दूल्हों को दुल्हन नसीब नहीं हुई। पोखरे के चारों तरफ लगे मेले में महिलाओं ने सौंदर्य प्रसाधन व लाई रेवड़ा और बच्चों ने खिलौनों की जमकर खरीददारी की।
व्यवस्था के मद्देनजर जाफराबाद लाइन बाजार की पुलिस तैनात रही। तीज के दूसरे दिन कजरहवा पोखरे पर लगने वाले इस मेले में कचगांव की तरफ से हाथी पर सवार करिया दूल्हा, टंकी शर्मा ऊंट पर सवार रईस दूल्हा तथा घोड़े पर सवार शब्बीर
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दूल्हा के रुप मेें पोखरे पर पहुंचे। दूल्हों की शादी कराने के लिए पंडित कांति मोहन पाण्डेय तथा नाऊ विनोद शर्मा रहे। राजेपुर से दूल्हा के रूप में नाटे हाथी पर सवार होकर आए। उनकी तरफ से पंडित की भूमिका में झंझट तथा नाऊ के रूप में
पन्ना शर्मा रहे। दोनों पक्षों में दुल्हन की विदाई को लेकर घंटों वाक युद्ध होता रहा। दोनों पक्षों के बारातियों द्वारा एक दूसरे को मीठी गालियों से नवाजा गया। इस तरह धीरे-धीरे शाम हो गई।
दुल्हन की विदाई नहीं हो सकी। दोनों तरफ से दूल्हे बिना दुल्हन के ही लौट गए। इस तरह से इस परंपरा ने अपने 107 साल पूरे किए।
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हाथी, घोड़े और ऊंट पर सज धज कर आए दूल्हों को दुल्हन नसीब नहीं हुई। पोखरे के चारों तरफ लगे मेले में महिलाओं ने सौंदर्य प्रसाधन व लाई रेवड़ा और बच्चों ने खिलौनों की जमकर खरीददारी की।
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व्यवस्था के मद्देनजर जाफराबाद लाइन बाजार की पुलिस तैनात रही। तीज के दूसरे दिन कजरहवा पोखरे पर लगने वाले इस मेले में कचगांव की तरफ से हाथी पर सवार करिया दूल्हा, टंकी शर्मा ऊंट पर सवार रईस दूल्हा तथा घोड़े पर सवार शब्बीर
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दूल्हा के रुप मेें पोखरे पर पहुंचे। दूल्हों की शादी कराने के लिए पंडित कांति मोहन पाण्डेय तथा नाऊ विनोद शर्मा रहे। राजेपुर से दूल्हा के रूप में नाटे हाथी पर सवार होकर आए। उनकी तरफ से पंडित की भूमिका में झंझट तथा नाऊ के रूप में
पन्ना शर्मा रहे। दोनों पक्षों में दुल्हन की विदाई को लेकर घंटों वाक युद्ध होता रहा। दोनों पक्षों के बारातियों द्वारा एक दूसरे को मीठी गालियों से नवाजा गया। इस तरह धीरे-धीरे शाम हो गई।
दुल्हन की विदाई नहीं हो सकी। दोनों तरफ से दूल्हे बिना दुल्हन के ही लौट गए। इस तरह से इस परंपरा ने अपने 107 साल पूरे किए।