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सत्संग से मनुष्य में आता है विवेक
Updated Sat, 24 Nov 2018 12:56 AM IST
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सतहरिया। मुंबई का कथावाचक आचार्य मनोज पांडेय ने कहा कि मनुष्य के ऊपर संगति का बहुत बड़ा असर पड़ता है। सत्संग से मनुष्य में अच्छे संस्कार आते हैं। सत्संग से ही मनुष्य में विवेक आता है। वह शुक्रवार को मुंगराबादशाहपुर के कटरा मोहल्ला में श्रीमद्भागवत कथा के चौथे दिन भक्तों के प्रवचन कर रहे थे।
उन्होंने कहा कि विवेकशील प्राणी ही परम पिता परमेश्वर के गूढ़ रहस्य को समझ सकता है। ब्रह्म और जीवात्मा के बीच जो माया है वहीं प्राणियों में दु:ख का कारण है। उन्होंने कहा कि माया संसार को नचाती है। और ब्रह्म माया को उंगली पर नचाती है। दोनों में यही फर्क है। राम नाम का जाप व भजन भव सागर से पार करने में महामंत्र है। घोर तपस्या के उपरांत भोलेनाथ ने जब तपस्या का पारण किया था तो उनके जिह्वा से सबसे पहले राम शब्द निकला था। उन्होंने कथा को विस्तार करते हुए कहा कि माता पार्वती के साथ भगवान शिव निकले थे। उनकी दृष्टि मां सीता के वियोग में वन में भटक रहे दीन हीन अवस्था में प्रभु श्रीराम पर पड़ी। भोलेनाथ उन्हें पांचों मुंह से प्रणाम किया। तो इस पर सती को आश्चर्य हुआ। बाबा शिव मां पार्वती के मन की बात को भांप गए। जब पार्वती मइया राम की परीक्षा लेने गई तब उन्हें पता चला कि यह कोई साधारण व्यक्ति नहीं बल्कि परम पिता परमेश्वर श्री राम है। संत ने देश में बढ़ते हुए पाश्चात्य देशों की संस्कृति व सभ्यता पर गहरा क्षोभ व्यक्त किया। कहा कि खान पान व रीति रिवाज से लेकर पहनावा तक उसके बढ़ते प्रभाव ने भारतीय संस्कृति व सभ्यता को शर्मसार कर दिया है। इससे बचना चाहिए। संचालन ओमप्रकाश टैगोर ने किया। राज मिश्रा आर्गन, पप्पू सिंह ढोलक, रोहित पैड पर संगत कर रहे है। मुख्य रूप से मुख्य यजमान राजेंद्र तिवारी, चंद्रेश पांडेय, हौसला प्रसाद आदि मौजूद रहे।
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उन्होंने कहा कि विवेकशील प्राणी ही परम पिता परमेश्वर के गूढ़ रहस्य को समझ सकता है। ब्रह्म और जीवात्मा के बीच जो माया है वहीं प्राणियों में दु:ख का कारण है। उन्होंने कहा कि माया संसार को नचाती है। और ब्रह्म माया को उंगली पर नचाती है। दोनों में यही फर्क है। राम नाम का जाप व भजन भव सागर से पार करने में महामंत्र है। घोर तपस्या के उपरांत भोलेनाथ ने जब तपस्या का पारण किया था तो उनके जिह्वा से सबसे पहले राम शब्द निकला था। उन्होंने कथा को विस्तार करते हुए कहा कि माता पार्वती के साथ भगवान शिव निकले थे। उनकी दृष्टि मां सीता के वियोग में वन में भटक रहे दीन हीन अवस्था में प्रभु श्रीराम पर पड़ी। भोलेनाथ उन्हें पांचों मुंह से प्रणाम किया। तो इस पर सती को आश्चर्य हुआ। बाबा शिव मां पार्वती के मन की बात को भांप गए। जब पार्वती मइया राम की परीक्षा लेने गई तब उन्हें पता चला कि यह कोई साधारण व्यक्ति नहीं बल्कि परम पिता परमेश्वर श्री राम है। संत ने देश में बढ़ते हुए पाश्चात्य देशों की संस्कृति व सभ्यता पर गहरा क्षोभ व्यक्त किया। कहा कि खान पान व रीति रिवाज से लेकर पहनावा तक उसके बढ़ते प्रभाव ने भारतीय संस्कृति व सभ्यता को शर्मसार कर दिया है। इससे बचना चाहिए। संचालन ओमप्रकाश टैगोर ने किया। राज मिश्रा आर्गन, पप्पू सिंह ढोलक, रोहित पैड पर संगत कर रहे है। मुख्य रूप से मुख्य यजमान राजेंद्र तिवारी, चंद्रेश पांडेय, हौसला प्रसाद आदि मौजूद रहे।
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