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अनुष्ठान का फल प्राप्त करने के लिए करें कलश स्थापना
Updated Tue, 09 Oct 2018 12:12 AM IST
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मछलीशहर। कलश स्थापना से यज्ञ अनुष्ठान का पूर्ण फल प्राप्त होता है। कलश पर स्थित नारियल सुख समृद्धि का प्रतीक माना जाता है। कलश स्थापना मुहूर्त के विषय में पं. रवि पांडेय का कहना है कि 10 अक्तूबर दिन बुधवार को शारदीय नवरात्र का प्रथम दिन है। चूंकि प्रतिपदा तिथि सुबह सात बजकर 56 मिनट तक है। अत: कलश स्थापना सुबह सात बजकर 56 मिनट से पूर्व ही होगी। दूसरा अभिजित मुहूर्त दोपहर में 11बजकर 37 मिनट से 12 बजकर 23 के बीच होगा। उस समय कलश स्थापना का पूर्ण योग है। इसे ही सर्वाधिक पुण्य काल माना गया है।
बताया कि 17 अक्तूबर को अष्टमी व्रत है एवं उसी दिन दोपहर में 12 बजकर 27 मिनट के बाद नवमी तिथि लग जाएगी। चूंकि नवमी 18 अक्तूबर को दोपहर में 2 बजकर 32 मिनट तक ही रहेगी। इसी समय के बीच हवन का कार्यक्रम संपन्न होगा। उसके बाद नवरात्र व्रत का व्रत का पारण यानी अन्न ग्रहण करना है। जबकि विजय दशमी पर्व 19 अक्तूबर को होगा। 24 अक्तूबर को व्रत व स्नान दान की शरद पूर्णिमा है।
वहीं कलश पूजन महात्म्य के विषय में पं. मुरारी श्याम पांडेय बताते हैं कि कोई भी देवी या देवता की षोडशोपचार पूजन हो, अनुष्ठान या यज्ञादि सभी में कलश की स्थापना एवं पूजन का विधान शास्त्रों में मिलता है। कलश में ब्रह्मा, विष्णु, महेश सहित चारों वेद, सभी तीर्थों, समुद्रों एवं देवी -देवताओं का वास होता है। इसमें उक्त सभी देवी-देवताओं एवं तीर्थों का आह्वान कर पूजन किया जाता है। कलश स्थापना कर की गयी उपासना का पूर्ण फल प्राप्त होता है। यज्ञ और अनुष्ठान बिना कलश स्थापना एवं पूजन के पूर्ण नहीं होते हैं।
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कलश पूजन के महत्व को बताते हुए डॉ. शैलेश मोदनवाल कहते है कि कलश पूजन से सभी देव प्रसन्न होकर साधक को अभीष्ट लाभ देते है। कलश पर स्थित नारियल जिसे जिसे सुख, समृद्धि एवं ऐश्वर्य के रूप में जाना जाता है। यज्ञादि-अनुष्ठान को पूर्ण फल प्रदान करता है। सभी धन-धान्यादि की प्राप्ति, आरोग्यता, सुख-समृद्धि एवं पुरूषार्थों की प्राप्ति महज कलश पूजन से ही प्राप्त हो जाते हैं। इसमें संशय नहीं है।
बताया कि 17 अक्तूबर को अष्टमी व्रत है एवं उसी दिन दोपहर में 12 बजकर 27 मिनट के बाद नवमी तिथि लग जाएगी। चूंकि नवमी 18 अक्तूबर को दोपहर में 2 बजकर 32 मिनट तक ही रहेगी। इसी समय के बीच हवन का कार्यक्रम संपन्न होगा। उसके बाद नवरात्र व्रत का व्रत का पारण यानी अन्न ग्रहण करना है। जबकि विजय दशमी पर्व 19 अक्तूबर को होगा। 24 अक्तूबर को व्रत व स्नान दान की शरद पूर्णिमा है।
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वहीं कलश पूजन महात्म्य के विषय में पं. मुरारी श्याम पांडेय बताते हैं कि कोई भी देवी या देवता की षोडशोपचार पूजन हो, अनुष्ठान या यज्ञादि सभी में कलश की स्थापना एवं पूजन का विधान शास्त्रों में मिलता है। कलश में ब्रह्मा, विष्णु, महेश सहित चारों वेद, सभी तीर्थों, समुद्रों एवं देवी -देवताओं का वास होता है। इसमें उक्त सभी देवी-देवताओं एवं तीर्थों का आह्वान कर पूजन किया जाता है। कलश स्थापना कर की गयी उपासना का पूर्ण फल प्राप्त होता है। यज्ञ और अनुष्ठान बिना कलश स्थापना एवं पूजन के पूर्ण नहीं होते हैं।
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कलश पूजन के महत्व को बताते हुए डॉ. शैलेश मोदनवाल कहते है कि कलश पूजन से सभी देव प्रसन्न होकर साधक को अभीष्ट लाभ देते है। कलश पर स्थित नारियल जिसे जिसे सुख, समृद्धि एवं ऐश्वर्य के रूप में जाना जाता है। यज्ञादि-अनुष्ठान को पूर्ण फल प्रदान करता है। सभी धन-धान्यादि की प्राप्ति, आरोग्यता, सुख-समृद्धि एवं पुरूषार्थों की प्राप्ति महज कलश पूजन से ही प्राप्त हो जाते हैं। इसमें संशय नहीं है।