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समलैंगिक व्यवहार को लेकर एक राय नहीं हैं लोग
Updated Fri, 07 Sep 2018 12:40 AM IST
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समलैंगिक व्यवहार को लेकर एक राय नहीं हैं लोग
अमर उजाला ब्यूरो
जौनपुर। समलैंगिकता के मसले पर सुप्रीम कोर्ट के दिए गए फैसले पर समाज से जुड़े लोगों ने अपने विचार रखे। कुछ लोग इसे स्वस्थ समाज के हित में नहीं मान रहे हैं।
सुप्रीम कोर्ट ने एक फैसले में समलैंगिकता को अपराध नहीं बल्कि निजी स्वतंत्रता का मामला घोषित किया है। सुप्रीम कोर्ट ने धारा 377 के मानवीय समलैंगिक व्यवहार के प्रावधान को खत्म करने का आदेश दिया है लेकिन यह भी कहा है कि पशुओं के साथ मानवीय यौन व्यवहार अभी भी अपराध मान्य होगा। इस निर्णय से समाज के लोग सहमत नहीं हैं। इसे सही कदम नहीं बताया जा रहा है।
पूर्वांचल विश्वविद्यालय की प्रोफेसर मनोवैज्ञानिक डा. जान्हवी श्रीवास्तव का कहना है कि जिस देशकाल परिस्थिति में हम रह रहे हैं और जिस संस्कृति में हम जीते हैं। ऐसे में समलैंगिकता समाज में आने वाले समय में विष का काम करेगा। अप्राकृतिक कोई भी चीज नुकसान पहुंचाती है। ऐसे में बुद्घिजीवी वर्ग ऐसे निर्णय से सहमत नहीं है।
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वरिष्ठ अधिवक्ता डा. वीडी सिंह का कहना है कि सुप्रीम कोर्ट ने धारा 377 के मानवीय समलैंगिक व्यवहार को पूर्ण रूप से खत्म नहीं किया है। अगर कोई वयस्क व्यक्ति बिना किसी छल कपट के आपस में संबंध बनाते हैं तो अपराध नहीं है। अगर इसमें कोई वयस्क नहीं है तो अपराध माना जाएगा।
शिया धर्मगुरु मौलाना सबरद हुसैन जैदी का कहना है कि समलैंगिकता अपराध होना चाहिए। यह प्राकृतिक वसूलों के खिलाफ है। इस्लाम में भी ऐसा कहा गया है। हर आदमी की सोच जानवर जैसी हो जाए तो भला नहीं होगा। पुरुष महिला अलग-अलग बनाए गए हैं। प्राकृतिक रूप से उसी हैसियत में काम करें तो अच्छा रहेगा।
बीएचयू के प्रोफेसर और समाज शास्त्री प्रो. आरएन त्रिपाठी का कहना है कि मनुष्य के मौलिक अधिकारों के तहत व्यक्ति की स्वतंत्रता की सीमा में सर्वोच्च न्यायालय का फैसला है। यद्यपि भारतीय पारंपरिक समाज इस प्रकार के अधिकारों की अनुमति नहीं देता है। परंतु वैश्विक दृष्टिपटल पर देखेंगे तो हमें स्वतंत्रता के अधिकारों के तहत इसे मान्यता देनी ही होगी। न्यायपालिका सर्वोच्चता और व्यक्तिगत स्वतंत्रता को महत्व दिया है। इसीलिए इसका विरोध नहीं किया जाना चाहिए। जहां तक परंपरागत मूल्यों और मान्यताओं बात है। देखा जाए निश्चय ही यह निर्णय भारतीय परिवेश में आम जनमानस के मध्य उतना उपयुक्त नहीं होगा जितना अपेक्षित है।
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अमर उजाला ब्यूरो
जौनपुर। समलैंगिकता के मसले पर सुप्रीम कोर्ट के दिए गए फैसले पर समाज से जुड़े लोगों ने अपने विचार रखे। कुछ लोग इसे स्वस्थ समाज के हित में नहीं मान रहे हैं।
सुप्रीम कोर्ट ने एक फैसले में समलैंगिकता को अपराध नहीं बल्कि निजी स्वतंत्रता का मामला घोषित किया है। सुप्रीम कोर्ट ने धारा 377 के मानवीय समलैंगिक व्यवहार के प्रावधान को खत्म करने का आदेश दिया है लेकिन यह भी कहा है कि पशुओं के साथ मानवीय यौन व्यवहार अभी भी अपराध मान्य होगा। इस निर्णय से समाज के लोग सहमत नहीं हैं। इसे सही कदम नहीं बताया जा रहा है।
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पूर्वांचल विश्वविद्यालय की प्रोफेसर मनोवैज्ञानिक डा. जान्हवी श्रीवास्तव का कहना है कि जिस देशकाल परिस्थिति में हम रह रहे हैं और जिस संस्कृति में हम जीते हैं। ऐसे में समलैंगिकता समाज में आने वाले समय में विष का काम करेगा। अप्राकृतिक कोई भी चीज नुकसान पहुंचाती है। ऐसे में बुद्घिजीवी वर्ग ऐसे निर्णय से सहमत नहीं है।
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वरिष्ठ अधिवक्ता डा. वीडी सिंह का कहना है कि सुप्रीम कोर्ट ने धारा 377 के मानवीय समलैंगिक व्यवहार को पूर्ण रूप से खत्म नहीं किया है। अगर कोई वयस्क व्यक्ति बिना किसी छल कपट के आपस में संबंध बनाते हैं तो अपराध नहीं है। अगर इसमें कोई वयस्क नहीं है तो अपराध माना जाएगा।
शिया धर्मगुरु मौलाना सबरद हुसैन जैदी का कहना है कि समलैंगिकता अपराध होना चाहिए। यह प्राकृतिक वसूलों के खिलाफ है। इस्लाम में भी ऐसा कहा गया है। हर आदमी की सोच जानवर जैसी हो जाए तो भला नहीं होगा। पुरुष महिला अलग-अलग बनाए गए हैं। प्राकृतिक रूप से उसी हैसियत में काम करें तो अच्छा रहेगा।
बीएचयू के प्रोफेसर और समाज शास्त्री प्रो. आरएन त्रिपाठी का कहना है कि मनुष्य के मौलिक अधिकारों के तहत व्यक्ति की स्वतंत्रता की सीमा में सर्वोच्च न्यायालय का फैसला है। यद्यपि भारतीय पारंपरिक समाज इस प्रकार के अधिकारों की अनुमति नहीं देता है। परंतु वैश्विक दृष्टिपटल पर देखेंगे तो हमें स्वतंत्रता के अधिकारों के तहत इसे मान्यता देनी ही होगी। न्यायपालिका सर्वोच्चता और व्यक्तिगत स्वतंत्रता को महत्व दिया है। इसीलिए इसका विरोध नहीं किया जाना चाहिए। जहां तक परंपरागत मूल्यों और मान्यताओं बात है। देखा जाए निश्चय ही यह निर्णय भारतीय परिवेश में आम जनमानस के मध्य उतना उपयुक्त नहीं होगा जितना अपेक्षित है।